अमिताभ क्‍यों हुए बीमार? 75 की उम्र में इन 6 बीमारियों का होता है खतरा

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Mar 13, 2018
Quick Bites

  • अकसर लोग यह सोचकर अपनी सेहत पर ध्यान नहीं देते
  • कि अभी से बुढ़ापे की चिंता क्यों की जाए?
  • बेशक ज्य़ादा चिंतित होना व्यर्थ है

अकसर लोग यह सोचकर अपनी सेहत पर ध्यान नहीं देते कि अभी से बुढ़ापे की चिंता क्यों की जाए? बेशक ज्य़ादा चिंतित होना व्यर्थ है लेकिन अपने पचासवें जन्मदिन के बाद से ही सभी को अपनी सेहत के प्रति विशेष रूप से सजग हो जाना चाहिए। महानायक अमिताभ बच्‍चन भी इन दिनों अपनी बीमारी को लेकर चर्चा में। विशेषज्ञों की मानें तो 75 के पड़ाव में इस प्रकार की बीमारी होना लाजमी है। इस उम्र शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता काफी कम हो जाती है। इसके लिए सबसे पहले यह जानना बहुत ज़रूरी है कि इस उम्र में व्यक्ति को कौन सी स्वास्थ्य समस्याएं परेशान कर सकती हैं और उनसे बचाव कैसे किया जाए। दिल्ली स्थित सर गंगाराम हॉस्पिटल के इंटर्नल मेडिसिन डिपार्टमेंट के एचओडी डॉ. एस. पी. बयोत्रा बता रहे हैं, कुछ ऐसी ही स्वास्थ्य समस्याओं के बारे में, जो बढ़ती उम्र में अकसर लोगों को परेशान करती हैं।

अर्थराइटिस का दर्द

बढ़ती उम्र के साथ हड्डियों के बीच मौज़ूद ल्यूब्रिकेंट सूखने लगते हैं। इससे लोगों को जोड़ों में जकडऩ, दर्द और जलन जैसे लक्षण नज़र आते हैं। खास तौर पर सर्दियों के मौसम में यह समस्या बढ़ जाती है।

बचाव : किसी कुशल योग विशेषज्ञ की देखरेख में नियमित रूप से एक्सरसाइज़ करें। जोड़ों पर किसी दर्द निवारक क्रीम या जेल की मालिश करें। सर्दियों के मौसम में घुटनों को ठंड से बचाने के लिए नी कैप पहनें। ज्य़ादा दर्द होने पर डॉक्टर की सलाह पर दवाओं का भी सेवन कर सकते हैं।

कैटरेक्ट की आशंका

समय के साथ बुज़ुर्गों की आंखों की दृष्टि कमज़ोर पडऩे लगती है। इसके अलावा लगभग 80 प्रतिशत लोगों को इस उम्र में कैटरेक्ट की समस्या का सामना करना पड़ता है। आम बोलचाल की भाषा में इसे मोतियाबिंद कहा जाता है। दरअसल आंखों की रेटिना में एक लेंस होता है, जो अलग-अलग दूरियों पर स्थित वस्तुओं पर ध्यान केंद्रित करने में हमारी मदद करता है। इस लेंस की बाहरी परत पर कुछ नई कोशिकाएं बनती रहती हैं। उम्र बढऩे के बाद इनके दबाव की वजह से लेस के भीतर ज़्यादा फ्लूइड बनने लगता है। इससे आंखों की लेंस पर धुंधलापन आने लगता है और कुछ समय बाद यही समस्या कैटरेक्ट का रूप धारण कर लेती है। उम्र बढऩे के साथ रेटिना की नव्र्स भी कमज़ोर होकर नष्ट होने लगती हैं। इसे एज रिलेटेड मैक्युलरडिजेनरेशन कहा जाता है। ऐसी स्थिति में भी दृष्टि कमज़ोर हो जाती है।

बचाव : अगर कोई तकलीफ न हो तब भी साल में एक बार आई चेकअप ज़रूर करवाएं। अगर कैटरेक्ट की समस्या हो तो सर्जरी करवाने में देर न करें।

बीपीएच की समस्या

बिनाइन प्रोस्टैटिक हाइपरप्लैजिया यानी बीपीएच बुज़ुर्ग पुरुषों की सेहत से जुड़ी आम समस्या है, जिसमें उनके प्रोस्टेट ग्लैंड का आकार बढऩे लगता है। ऐसी स्थिति में उनके यूरिनरी ट्रैक पर दबाव बढ़ जाता है और उन्हें बार-बार टॉयलेट जाने की ज़रूरत महसूस होती है। गंभीर स्थिति में दर्द और यूरिन के साथ ब्लड डिस्चार्ज जैसे लक्षण भी नज़र आते हैं।

बचाव : अगर शुरुआती दौर में ही डॉक्टर से सलाह ली जाए तो दवाओं की मदद से इस समस्या का समाधान किया जा सकता है। अगर ज़्यादा तकलीफ हो तो होल्यिम लेज़र पद्धति द्वारा सर्जरी भी की जा सकती है। इसके बाद मरीज़ पूर्णत: स्वस्थ हो जाता है।

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दिल का रखें ख्याल

खानपान की गलत आदतों और एक्सरसाइज़ की कमी के कारण उम्र बढऩे के साथ लोगों का ब्लडप्रेशर और शुगर लेवल भी बढऩे लगता है, जो अंतत: हृदय रोग का कारण बन जाता है। इन आदतों की वजह से लोगों की हृदय की धमनियों की भीतरी दीवारों पर कोलेस्ट्रॉल का जमाव शुरू हो जाता है। ऐसी स्थिति में ब्लड पंपिंग के लिए दिल को बहुत ज्य़ादा मेहनत करनी पड़ती है। इससे हार्ट कमज़ोर हो जाता है और अटैक की आशंका बढ़ जाती है।

बचाव : अगर कोई लक्षण न हो तो भी छह महीने के अंतराल पर शुगर और बीपी की जांच करवाएं। संयमित खानपान और जीवनशैली अपनाएं। अपनी डाइट में घी-तेल, मिर्च-मसालों और चीनी-नमक का इस्तेमाल सीमित मात्रा में करें क्योंकि ये चीज़ें ब्लडप्रेशर और शुगर लेवल बढ़ाने के लिए जि़म्मेदार होती हैं। अगर हार्ट प्रॉब्लम की फैमिली हिस्ट्री रही हो तो साल में एक बार ईसीजी ज़रूर करवाएं।

पाचन-तंत्र संबंधी परेशानियां  

बुज़ुर्गों के दांत और जबड़े कमज़ोर हो जाते हैं। इससे वे भोजन को सही ढंग से चबाकर नहीं खा पाते। साथ ही उनके सलाइवा में इलेक्ट्रोलाइट्स नहीं बन पाते, जो भोजन को पचाने में सहायक होते हैं। इसके अलावा खाते समय कुछ बुज़ुर्गों का मुंह ज्य़ादा देर तक खुला रह जाता है। इससे भोजन के साथ उनके पेट में हवा चली जाती है। वृद्धावस्था में आंतें धीमी गति से काम करती हैं। भोजन की नली और आंतों के बीच एक वन-वे वॉल्व होता है, जो एक ही तरफ खुलता है। बढ़ती उम्र में यह वॉल्व ढीला पड़ जाता है और दोनों तरफ खुलने लगता है। इससे थोड़ा खाना आंतों के भीतर जाता है और थोड़ा बाहर वापस आ जाता है। इन्हीं कारणों से बुज़ुर्गों को गैस, कब्ज़ और बदहजमी जैसी समस्याएं परेशान करने लगती हैं।

बचाव : अपने भोजन में फाइबरयुक्त चीज़ों जैसे-सूजी, दलिया, ओट्स, पपीता, सेब, अनार, अमरूद और संतरा आदि को प्रमुखता से शामिल करें। नियमित डेंटल ट्रीटमेंट लें क्योंकि कमज़ोर दांत पाचन संबंधी समस्याओं के लिए जि़म्मेदार होते हैं। 

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साइको-जेरिएटिक डिसॉर्डर

बढ़ती उम्र में व्यक्ति को कुछ न्यूरोलॉजिकल समस्याओं का भी सामना करना पड़ सकता है, जिन्हें साइको-जेरिएटिक डिसॉर्डर कहा जाता है। ब्रेन के न्यूरोट्रांस्मीटर्स से निकलने वाले केमिकल्स के असंतुलन की वजह से वरिष्ठ नागरिकों को डिप्रेशन हो जाता है। उम्र बढऩे के साथ ब्रेन की कोशिकाएं सूखकर नष्ट होने लगती हैं। इससे बुज़ुर्गों को शॉर्ट टर्म मेमरी लॉस की समस्या होती है। अगर समय पर उपचार नहीं कराया जाए तो यही समस्या डिमेंशिया या अल्ज़ाइमर्स का रूप धारण कर लेती है।

बचाव : न्यूरोलॉजिस्ट से सलाह लें। अपने खानपान में बादाम और अखरोट ड्राई फ्रूट्स को प्रमुखता से शामिल करें। ग्रीन टी का नियमित सेवन करें। शतरंज और सुडोकू जैसे गेम्स खेलें, इससे ब्रेन की अच्छी एक्सरसाइज़ होती है।

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