गंभीर रोग है पैरों में पड़ने वाले काले निशान, जानें कारण और उपचार

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
May 08, 2018
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Quick Bites

  • अगर आपके पैरों के निचले हिस्से पर काले रंग के चकत्तेदार निशान हैं
  • पैरों की त्वचा का रंग बाकी शरीर की त्वचा के रंग से ज्य़ादा गहरा है
  • आपको एक घंटे से ज्य़ादा देर तक खड़े रहने में परेशानी होती है

पैरों पर पडऩे वाले काले निशान को अकसर लोग त्वचा संबंधी मामूली समस्या समझकर नज़रअंदाज कर देते हैं, पर ऐसा करना उचित नहीं है। यह वेन्स संबंधी गंभीर समस्या भी हो सकती है। इसे क्रॉनिक वेनस इन्सफीसियंसी या सीवीआइ कहा जाता है। क्यों होती है यह समस्या और इससे कैसे बचाव किया जाए। 

अगर आपके पैरों के निचले हिस्से पर काले रंग के चकत्तेदार निशान हैं, पैरों की त्वचा का रंग बाकी शरीर की त्वचा के रंग से ज्य़ादा गहरा है, आपको एक घंटे से ज्य़ादा देर तक खड़े रहने में परेशानी होती है, चलने से पैरों में सूजन आ जाती है, थोड़ा चलने के बाद खिंचाव या बहुत ज्य़ादा थकान महसूस होती है तो ऐसे निशान को अनदेखा न करें, क्योंकि यह वेन्स से जुड़ी गंभीर समस्या हो सकती है। जिसे मेडिकल भाषा में क्रोनिक वेनस इन्सफीसियंसी यानी सी.वी.आइ. कहते हैं।

 

स्त्रियों को हो सकती है समस्या

वैसे तो यह बीमारी किसी को भी हो सकती है, लेकिन 30 वर्ष से अधिक उम्र वाली स्त्रियों में ज्य़ादातर सी.वी.आइ. की समस्या देखने को मिलती है। ज्य़ादातर स्त्रियों में गर्भावस्था के दौरान या डिलिवरी के बाद इसके लक्षण दिखाई देते हैं। इसे दूर करने के लिए वे मालिश और अन्य घरेलू उपचारों का सहारा लेती हैं। इससे उन्हें थोड़ी देर के लिए दर्द से राहत ज़रूर मिल जाती है, लेकिन समस्या का कोई स्थायी हल नहीं मिल पाता।

जीवनशैली है जि़म्मेदार

आधुनिक जीवनशैली की वजह से सीवीसी की समस्या तेज़ी से बढ़ रही है। टेक्नोलॉजी पर बढ़ती निर्भरता की वजह से लोगों की शारीरिक गतिविधियां दिनोंदिन कम होती जा रही हैं। डेस्क जॉब करने वाले लोगों में इस बीमारी की आशंका बढ़ जाती है। इसके अलावा ट्रैफिक पुलिस, शेफ और ब्यूटी सलून में कार्यरत लोगों को भी यह समस्या हो सकती है क्योंकि इन्हें लगातार खड़े होकर काम करना पड़ता है, इससे अशुद्ध रक्त फेफड़ों तक ऊपर पहुंचने के बजाय पैरों की रक्तवाहिका नलियों में ही जमा होने लगता है। इसी वजह से काले निशान या दर्द की समस्या होती है।

क्यों होता है ऐसा

शरीर के अन्य अंगों की तरह पैरों को भी आक्सीजन की ज़रूरत पड़ती है। यह आक्सीजन हार्ट की आर्टरीज़ में प्रवाहित शुद्ध रक्त के ज़रिये पहुंचाई जाती है। पैरों को आक्सीजन देने के बाद यह आक्सीजन रहित अशुद्ध खून वेन्स के ज़रिये वापस पैरों से ऊपर फेफड़े की तरफ शुद्धीकरण के लिए पहुंचाया जाता है। इसका मतलब यह हुआ कि ये नसें पैरों का ड्रेनेज सिस्टम बनाती हैं। किसी कारण से अगर इनकी कार्यप्रणाली शिथिल हो जाती है तो पैरों का ड्रेनेज सिस्टम चरमरा जाता है। जिसका परिणाम यह होता है कि ऑक्सीजन रहित अशुद्ध खून ऊपर चढ़कर फेफड़े की ओर जाने की बजाय पैरों के निचले हिस्से में जमा होना शुरू हो जाता है। इसी वजह से पैरों में सूजन और काले निशानों की समस्या शुरू हो जाती है। अगर समय रहते इनका समुचित इलाज नहीं कराया गया तो ये काले निशान गहरे होकर धीरे-धीरे ज़ख़्म में परिवर्तित हो जाते हैं। 

जिन लोगों को डीप वेन थ्रोम्बोसिस यानी डीवीटी की समस्या होती है, उनके पैरों की नसों में खून के कतरे जमा हो जाते हैं और वे उसकी दीवारों को नष्ट कर देते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि शिराओं के जरिये अशुद्ध रक्त के ऊपर चढऩे की प्रक्रिया बुरी तरह से बाधित हो जाती है, जो अंतत: सीवीआइ को जन्म देती है। एक्सरसाइज़ की कमी भी इस बीमारी की प्रमुख वजह है। शारीरिक निष्क्रियता की स्थिति में पैरों की मांसपेशियों द्वारा निर्मित पंप, जो अशुद्ध रक्त को ऊपर चढ़ाने में मदद करता है, वह कमज़ोर पड़ जाता है। कुछ लोगों की नसों में स्थित वाल्व जन्मजात रूप से ही ठीक से विकसित नहीं हो पाते, ऐसे मरीज़ों में सी.वी.आइ. के लक्षण कम उम्र में ही नज़र आने लगते हैं।

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क्या है उपचार

अगर पैरों में काले चकत्तेदार निशान दिखाई दें तो इसे त्वचा रोग समझने की भूल न करें। ऐसी स्थिति में बिना देर किए किसी वैस्क्युलर सर्जन से सलाह लें। उपचार के दौरान सबसे पहले इन निशानों का असली कारण जानने की कोशिश की जाती है। इसके लिए वेन डॉप्लर स्टडी, एम.आर. वेनोग्राम व कभी-कभी एंजियोग्राफी का सहारा लिया जाता है। ख़्ाून की विशेष जांच कर यह पता लगाना पड़ता है कि  खून जमने की प्रक्रिया दोषपूर्ण तो नहीं है। इन विशेष जांचों के आधार पर ही सीवीआइ के इलाज की सही दिशा निर्धारण होता है।

ज्य़ादातर मरीज़ों में दवा और विशेष व्यायाम की ही ज़रूरत होती है, गंभीर स्थिति होने पर सर्जरी भी करानी पड़ सकती है। वेन वाल्वुलोप्लास्टी, एग्ज़ेलरी वेन ट्रांस्फर या वेन्स बाइपास सर्जरी जैसी आधुनिकतम तकनीक की मदद से इस बीमारी का उपचार संभव है। वेन बाइपास सर्जरी आजकल काफी लोकप्रिय हो रही है। इसके लिए कभी-कभी विदेशों से आयातित कृत्रिम वेन्स का इस्तेमाल किया जाता है। कभी-कभी इन्डोस्कोपिक वेन सर्जरी या फिर लेज़र सर्जरी का भी सहारा लेना पड़ता है।

अगर सजगता बरती जाए तो इस समस्या को आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है। थोड़ा आराम मिल जाने के बाद बीच में इलाज अधूरा छोडऩा भी नुकसानदेह साबित होता है। अगर किसी व्यक्ति को एक बार ऐसी समस्या हो चुकी हो तो ठीक हो जाने के बाद भी साल में एक बार रुटीन चेकअप ज़रूर करवा लेना चाहिए।

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इन बातों का रखें ध्यान

-अपने पैरों और कमर के चारों ओर कसे हुए कपड़े न पहनें। इससे अशुद्ध खून की वापसी में रुकावट पैदा होती है।

-ऊंची एड़ी के जूते व सैंडल का प्रयोग कतई न करें। फ्लैट फुटवेयर पैरों की मांसपेशियों को हमेशा क्रियाशील रखते हैं। इससे शुद्ध और अशुद्ध रक्त का आवागमन बना रहता है।

-सी.वी.सी. की समस्या से ग्रस्त लोग स्किपिंग, एरोबिक्स या ऐसी कोई भी उछल-कूद वाली एक्सरसाइज़, जिसमें घुटने पर बार-बार झटके लगें, कतई न करें। इस तरह के व्यायाम, उनकी वेन्स को फायदा पहुंचाने के बजाय नुकसान पहुंचाते हैं।

-बगैर झटका दिए पैर उठाने व मोडऩे वाले व्यायाम नसों के लिए फायदेमंद हैं।

-ऑफिस में या घर पर ज्य़ादा समय तक लगातार पैर लटका कर न बैठें। अगर संभव हो तो पैरों को किसी छोटे स्टूल के सहारे पर टिका कर रखें। काम के बीच में हर दो घंटे के अंतराल पर पांच मिनट का ब्रेक लेकर सीट से उठकर टहलें।

-खाने में तेल व घी का प्रयोग बहुत कम मात्रा में करें। कम कैलरी वाले रेशेदार खाद्य पदार्थ, वेन्स के लिए $फायदेमंद हैं। अपने वज़न पर नियंत्रण रखें। इससे वेन्स पर पडऩे वाला अनावश्यक दबाव कम हो जाता है। किसी भी हालात में मोटापे को न पनपने दें।

-गर्भ निरोधक गोलियों या एस्ट्रोजन हॉर्मोन से बनी दवाओं का प्रयोग न करें क्योंकि ये नसों की दीवारों को नुकसान पहुंचाती हैं।

-नियमित मॉर्निंग वॉक करें। यह सबसे आसान और फायदेमंद एक्सरसाइज़ है। इससे पैरों से ऊपर की ओर वापस जाने वाले रक्त का प्रवाह तेज़ हो जाता है, जो व्यक्ति को सीवीआइ से बचाता है।

-कोई भी व्यायाम, जिसमें पैरों को कुछ मिनट के लिए ऊपर रखना पड़े, अत्यंत लाभकारी होता है। अगर आपको ऐसी समस्या हो तो अपने चिकित्सक की सलाह के बाद ही एक्सरसाइज़ करें। सर्वाइकल स्पॉण्डिलाइटिस, रीढ़ की हड्डी से जुड़ी बीमारियों के मरीज़ या अन्य किसी न्यूरोलॉजिकल समस्या से पीडि़त लोगों को इस तरह का व्यायाम नहीं करना चाहिए।

-रात में सोते समय पैरों के नीचे दो तकिये लगाएं, जिससे पैर छाती से दस या बारह इंच ऊपर रहें। ऐसा करने से पैरों में ऑक्सीजन रहित खून के जमा होने की प्रक्रिया शिथिल पड़ जाती है, जो सीवीआइ से ग्रस्त पैरों के लिए अत्यंत लाभकारी है।

-दिन के समय विशेष तकनीक से बनी स्टॉकिंस पहनें। ये विशेष जुरार्बें पैरों में रक्त का प्रवाह बढ़ाती हैं और गुरुत्वाकर्षण से नीचे की तरफ होने वाले खून के दबाव को कम करती है और सीवीआइ को बढऩे से रोकती है।

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