IIT Hyderabad: आईआईटी हैदराबाद ने खोजा डीएनए को स्वस्थ रखने का तरीका, कैंसर का खतरा भी होगा कम

IIT Hyderabad: आईआईटी हैदराबाद ने पता किया डैमेज डीएनए के खतरे को कम करने का तरीका 

Vishal Singh
लेटेस्टWritten by: Vishal SinghPublished at: Dec 26, 2019
IIT Hyderabad: आईआईटी हैदराबाद ने खोजा डीएनए को स्वस्थ रखने का तरीका, कैंसर का खतरा भी होगा कम

भारत में स्वास्थ्य समस्या हमेशा से ही चिंता का विषय रहा है। भारत की आबादी को स्वास्थ्य सुविधा और स्वास्थ्य लाभ पहुंचाना काफी मुश्किल भरा होता है। ऐसे में आईआईटी हैदराबाद हमेशा कुछ ना कुछ रिसर्च कर भारत के लिए काम करती है। 

आईआईटी हैदराबाद(IIT Hyderabad) अब प्रोटीन पर काम किया है। आईआईटी हैदराबाद के मुताबिक, प्रोटीन हमारे डीएनए को सुरक्षित तो रखता ही है लेकिन साथ ही हमारे डीएनए को रिपेयर भी करता है। 

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डीएनए खराब होने के साथ ही कई तरह की बीमारियों का बढ़ना भी शुरू हो जाता है। यहीं पूरी दुनिया समझना चाहती है कि कैसे रिपेयर प्रोटीन काम करता है। 

डॉ. अरुण गोयल के साथ किया गया जो कि प्रोफेसर हैं डिपार्टमेंट ऑफ बॉयोसाइंस, आईआईटी गुवाहाटी में। अध्ययन न्यूक्लिक एसिड अनुसंधान में प्रकाशित हुआ था। अध्ययन में ये था कि डीएनए जिंदगी का एक ब्लूप्रिंट है। अध्ययन में पाया गया कि शरीर में मौजूद सभी सेल्स का जीना बहुत जरूरी होता है साथ ही वो सेल्स अच्छी तरह सुरक्षित भी होने चाहिए। 

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अगर हमारे शरीर में अगर डीएनए डैमेज होते हैं तो वो तुरंत हमारे शरीर में असर करने लगते है। कई बार ज्यादा डीएनए डैमेज होने की वजह से कैंसर का खतरा भी बढ़ जाता है। अगर आप चाहते हैं कि आपकी बॉडी सही तरीके से काम करें बिना किसी परेशानी के तो इसके लिए बहुत जरूरी है कि आपके सेल्स भी पूरी तरह से सुरक्षित होने चाहिए। 

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आईआईटी हैदराबाद में बॉयो टैक्नोलॉजी के प्रोफेसर डॉ. अनिध्या रॉय के मुताबिक, शोध में पाया गया कि प्रोटीन किस तरह डैमेज डीएनए को रिपेयर करने का काम करता है। कई बार शरीर में से अपने आप ही प्राकृतिक तरीके से केमिकल निकलता है जो डीएनए को डैमेज करने का काम करता है। डॉ. मोनीशा मोहन ने एक मैकेनिज्म बनाया है जो डीएनए के खतरे को रिपेयर करने का काम करता है। अध्ययन में प्रोटीन के इस काम को ALKBH3 से जाना गया है। 

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डॉ. अनिध्या रॉय के मुताबिक, अध्ययन में पाया गया कि ALKBH3 सीधा प्रोटीन के संपर्क में रहकर दूसरे प्रोटीन तक पहुंचता है जिसे RAD51C से जाना गया है। इसके साथ ही इस अध्ययन से कैंसर के मरीजों के लिए काफी हद तक फायदा मिल सकेगा। 

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