डायबिटीज या मधुमेह एक वैश्विक समस्या के रूप में उभर रहा है। लगभग हर दूसरे घर में डायबिटीज का कोई न कोई मरीज नजर आ जाता है। यही कारण है कि हाल के सालों में डायबिटीज के प्रति लोगों में सजगता बढ़ती है। विशेषकर, जब किसी परिवार में माता-पिता या दोनों में से किसी एक को डायबिटीज होती है, तो बच्चों में भी यह समस्या होने का डर बढ़ जाता है। ऐसे में यह सवाल हर पेरेंट्स के मन में उठता है कि बच्चों को डायबिटिक होने से कैसे बचाया जा सकता है? इस लेख में हम जानेंगे कि पेरेंट्स के जरिए बच्चों को डायबिटीज कैसे होता है और इसे रोकने के लिए क्या प्रभावी तरीके हो सकते हैं। इस लेख में दिए गए सभी तथ्यों की पुष्टि नई दिल्ली के पंजाबी बाग स्थित Cloudnine Hospital में Pediatrician & Neonatologist डॉ. अभिषेक चोपड़ा ने की है।
क्या डायबिटीज माता-पिता से बच्चों में आ सकती है?
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पेरेंट्स को डायबिटीज हो, तो बच्चों को भी यह समस्या होने का खतरा बना रहता है। इसे ही हम जेनेटिक डायबिटीज कहते हैं। डॉ. अभिषेक चोपड़ा के अनुसार आमतौर पर जीन माता-पिता से बच्चों में ट्रांसफर होते हैं। अगर माता-पिता के डीएनए में कुछ ऐसे ’ससेप्टिबिलिटी जीन्स’ हैं, जो इंसुलिन के प्रति शरीर की प्रतिक्रिया को प्रभावित करते हैं, तो बच्चों को यह विरासत में मिल सकते हैं। ध्यान रखें कि ससेप्टिबिलिटी जीन्स उन जीन को कहते हैं, जो किसी व्यक्ति में विशेष बीमारी, जैसे डायबिटीज, होने की संभावना या जोखिम को बढ़ा देते हैं। हालांकि, बीमारी की गारंटी नहीं देते।
किस प्रकार की डायबिटीज में बच्चों को कितना खतरा होता है?
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- टाइप 1 डायबिटीजः यह एक ऑटोइम्यून कंडीशन है। American Diabetes Association की मानें, तो अगर पुरुष को टाइप 1 डायबिटीज है, तो बच्चे को डायबिटीज होने की संभावना 17 में से 1 होती है। वहीं, अगर मां टाइप 1 डायबिटीज से पीड़ित हैं और बच्चे का जन्म उनकी 25 वर्ष की आयु से पहले हुआ है, तो उन बच्चों में टाइप 1 डायबिटीज का रिस्क 25 में से 1 है। जबकि, बच्चे का जन्म 25 साल की उम्र के बाद हुआ है, तो उनके बच्चों में इसका जोखिम 100 में से 1 है।
- टाइप 2 डायबिटीजः यह जीन और जीवनशैली के मिश्रण से होने वाली समस्या है। अगर परिवार में पहले से ही किसी को टाइप 2 डायबिटीज है, तो यह पता लगाना मुश्किल हो जाएगा कि आपकी डायबिटीज जीवनशैली के कारण है या जेनेटिक्स (अनुवांशिकता) के कारण।
जेनेटिक डायबिटीज के कारण
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डॉ. अभिषेक चोपड़ा बताते हैं कि सिर्फ जीन का होना डायबिटीज का रिस्क पैदा नहीं करता है। कुछ ट्रिगर प्वाइंट्स भी हैं, जो इसके लिए जिम्मेदार होते हैं-
- इंसुलिन रेजिस्टेंसः जब माता-पिता से ऐसे जीन मिलते हैं जो शरीर को इंसुलिन का सही तरीके से इस्तेमाल नहीं करने देते, तो टाइप 2 डायबिटीज का खतरा बढ़ जाता है। वास्तव में, हमारे सेल्स इंसुलिन की बात मानना बंद कर देते हैं, जिसे हम इंसुलिन रेजिस्टेंस कहते हैं। इससे खून में शुगर का लेवल बढ़ने लगता है।
- बीटा सेल डिस्फंक्शनः 2023 में World Journal Diabetes में प्रकाशित जर्नल की मानें, पैनक्रियाज वह अंग है, जिसमें बीटा सेल्स होती हैं। इनका काम इंसुलिन हार्मोन प्रोड्यूस करना होता है। इंसुलिन का काम खून से शुगर यानी ग्लूकोज को निकालकर शरीर की सेल्स तक पहुंचाना है, जिससे हमें एनर्जी मिल सके। इंसुलिन रेजिस्टेंस की वजह से पैनक्रियाज बीटा सेल्स नहीं बना पाती हैं। ऐसे में डायबिटीज होने का रिस्क बढ़ जाता है।
- अन्य कारकः अगर किसी के परिवार में पहले से डायबिटीज है और उनकी जीवनशैली भी खराब है, तो डायबिटीज का जोखिम और भी ज्यादा बढ़ जाता है। जैसे डॉ. अभिषेक चोपड़ा बताते हैं कि जो बचपन से ही अधिक कैलोरी वाला भोजन खाते हैं, जिनका वजन अधिक है और अक्सर तनाव में रहते हैं, तो डायबिटीज होने का खतरा बढ़ जाता है।
बच्चों में डायबिटीज के शुरुआती लक्षण

बच्चों में डायबिटीज के लक्षण अक्सर वयस्कों की तुलना में तेजी से उभरते हैं। पेरेंट्स को इन संकेतों पर नजर रखनी चाहिए-
- बहुत ज्यादा प्यास लगना।
- बार-बार पेशाब आना।
- बिना कारण वजन घटना
- थकान और कमजोरी
- आंखों की रोशनी में अचानक बदलाव होना।
- घाव भरने में अधिक समय लगना।
- त्वचा का काला पड़ना
बच्चे टेस्ट कब कराएं?
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डॉ. अभिषेक चोपड़ा बताते हैं कि बच्चों का टेस्ट तब शुरू करना चाहिए जब-
- बच्चे की उम्र 10 वर्ष हो गई हो या वह प्यूबर्टी की उम्र में प्रवेश कर चुका हो।
- अगर बच्चा ओवरवेट है यानी उसका वजन उसकी लंबाई के हिसाब से सामान्य से अधिक है।
- बच्चे में डायबिटीज के लक्षण, जैसे बार-बार प्यास लगना, थकान, गर्दन का काला पड़ना नजर आने लगें।
- बच्चा स्वस्थ है, फिर भी हर तीन में इसका चेकअप करवाना चाहिए।
कौन से टेस्ट कराएं?
डॉक्टर आमतौर पर बच्चों में डायबिटीज का पता लगाने के लिए निम्नलिखित टेस्ट की सलाह देते हैं-
टाइप 2 और प्री-डायबिटीज के लिए
- एचबीए1सी टेस्टः इस टेस्ट के जरिए पिछले 2-3 महीनों का औसत शुगर लेवल का पता लगाया जा सकता है। बच्चों में डायबिटीज का पता लगाने के लिए यह सबसे आसान टेस्ट है, क्योंकि इसमें बच्चों को भूखे रहने की जरूरत नहीं होती।
- फास्टिंग प्लाज्मा ग्लूकोजः यह टेस्ट सुबह खाली पेट किया जाता है। आमतौर पर इस टेस्ट से पहले बच्चे को कम से कम 8-10 घंटे तक भूखे रहना होता है। केवल पानी पी सकता है। यह प्री-डायबिटीज और डायबिटीज का पता लगाने का सबसे आसान तरीका है।
- ओरल ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्टः इसमें बच्चे को ग्लूकोज वाला पानी पिलाया जाता है और 2 घंटे बाद शुगर लेवल की जांच की जाती है। इस टेस्ट से पता चलता है कि शरीर शुगर को किस तरह हैंडल कर रहा है।
बच्चों को डायबिटीज से बचाने के लिए पेरेंट्स क्या करें?

पेरेंट्स अपने बच्चों को डायबिटीज के जोखिम से बचा सकते हैं। इसके लिए यहां बताए गए टिप्स को फॉलो करें-
हेल्दी डाइट दें
अगर पेरेंट्स को डायबिटीज है, तो उन्हें अपने बच्चे की डाइट का विशेष ध्यान रखना चाहिए। अपने बच्चों को चीनी और प्रोसेस्ड फूड, जैसे कोल्ड ड्रिंक्स, पैकेट बंद जूस, बिस्किट और चॉकलेट्स बहुत कम मात्रा में दें। 2020 में Frontiers in Nutrition में प्रकाशित रिव्यू से पता चलता है कि बच्चों में डाइट मुख्य रूप से जेनेटिक डायबिटीज को ट्रिगर करने का काम करती है, जो आनुवंशिक रूप से संवेदनशील बच्चों में ऑटोइम्यूनिटी (टाइप 1) के लिए एक एन्वायरमेंट फैक्टर्स के रूप में कार्य करती है या इंसुलिन रेजिस्टेंस (टाइप 2) को बढ़ावा देती है। बहरहाल, डॉ. अभिषेक चोपड़ा सलाह देते हैं कि पेरेंट्स बच्चों की डाइट में फाइबर की मात्रा बढ़ाएं, हरी पत्तेदार सब्जियां और सलाद को उनके भोजन का हिस्सा बनाएं।
स्क्रीन टाइम कम करें
मौजूद समय में बच्चों का स्क्रीन टाइम बहुत ज्यादा बढ़ चुका है। कई बच्चे तो घंटों मोबाइल पर ही समय बिताते हैं। Archives of Disease in Childhood में प्रकाशित रिव्यू के अनुसार जितना ज्यादा स्क्रीन टाइम होता है, टाइप 2 डायबिटीज का जोखिम उतना ज्यादा बढ़ता है। दरअसल, स्क्रीन टाइम के दौरान बच्चे निष्क्रिय बैठते हैं, जिससे मांसपेशियां ग्लूकोज का इस्तेमाल कम करती हैं, जिससे इंसुलिन रेजिस्टेंस बढ़ने लगता है। इसके अलावा, बच्चे अक्सर स्क्रीन देखते हुए अनहेल्दी स्नैक्स का भी सेवन कर बैठते हैं, जिससे मोटापे का रिस्क भी बढ़ जाता है। पेरेंट्स को चाहिए कि बच्चे का स्क्रीन टाइम कम करें।
रोजाना खेलकूद करने को कहें
बच्चों को कम से कम 60 मिनट तक पसीने वाली फिजिकल एक्टिविटी जैसे फुटबॉल, बैडमिंटन, रनिंग या स्विमिंग करने के लिए मोटिवेट करें। इससे बच्चा फिजिकली एक्टिव होता है, मोटापा नहीं बढ़ता है और मेटाबॉलिज्म भी सही तरह से काम करता है। इस तरह डायबिटीज के जोखिम को भी कम किया जा सकता है।
वजन कंट्रोल करें
पेरेंट्स के लिए यह बहुत जरूरी है कि वे अपने बच्चे का वजन कंट्रोल में रखने की कोशिश करें। 2014 में करेंट डायबिटीज में प्रकाशित Current Diabetes Reports के अनुसार मोटापा बच्चों में इंसुलिन रेजिस्टेंस पैदा करके टाइप 2 डायबिटीज का कारण बनता है। ऐसे में बॉडी सेल्स इंसुलिन के प्रति किसी तरह की प्रतिक्रिया नहीं कर पाती है, जिससे पैनक्रियाज को अधिक काम करना पड़ता है और ब्लड शुगर का स्तर बढ़ जाता है। बहरहाल, बच्चों में वजन को कंट्रोल करके इंसुलिन रेजिस्टेंस की समस्या को नियंत्रित किया जा सकता है।
पर्याप्त नींद लेने को कहें
नींद की कमी से शरीर में हार्मोन असंतुलित हो जाते हैं, जिससे शुगर बढ़ने का खतरा रहता है। पेरेंट्स को चाहिए कि वे सुनिश्चित करें कि उनका बच्चा 8-9 घंटे की गहरी नींद रोजाना ले। 2021 में Childhood diabetes and sleep में प्रकाशित रिव्यू के अनुसार नींद स्वस्थ रहने के लिए बहुत जरूरी है। अच्छी और गहरी नींद ग्लूकोज मेटाबॉलिज्म को नियंत्रित करती है।’ रिव्यू से पता चलता है कि बच्चों में नींद में बदलाव का ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया, मोटापा, इंसुलिन रेजिस्टेंस और टाइप 2 डायबिटीज के साथ गहरा संबंध हो सकता है। इसका मतलब है कि पेरेंट्स को बच्चों की नींद पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
नियमित चेकअप करें
जिन परिवारों में डायबिटीज की समस्या है, उन्हें अपने बच्चे का का साल में एक बार फास्टिंग ब्लड शुगर या HbA1c test जरूर करवाना चाहिए। 2020 में Journal of the Formosan Medical Association के अनुसार टाइप 2 डायबिटीज वाले ज्यादातर बच्चों में किसी तरह के लक्षण नजर नहीं आते हैं, इसलिए उनका स्क्रीनिंग किया जाना जरूरी हो जाता है। हालांकि, इसके लिए प्रोफेशनल की मदद ली जानी जरूरी है।
निष्कर्ष
जिन पेरेंट्स को डायबिटीज है, उनके बच्चों में इस समस्या के होने का जोखिम बना रहता है। हालांकि, पेरेंट्स सही जीवनशैली, खानपान की आदतों में सुधार करके इस जोखिम को कुछ हद तक कम कर सकते हैं। इसके साथ-साथ जरूरी है कि बच्चे फिजिकली एक्टिव रहें ताकि उनका मेटाबॉलिज्म सही रहे और शरीर के सभी अंग सही तरह से फंक्शन कर सकें ताकि इंसुलिन रेजिस्टेंस की समस्या पैदा न हो।
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FAQ
क्या पेरेंट्स को डायबिटीज होने पर बच्चों को यह बीमारी होना तय है?
नहीं, ऐसा नहीं है। अगर बच्चे शुरू से ही सही जीवनशैली और खानपान की अच्छी आदतें अपनाते हैं, तो इसके जोखिम को कम कर सकते हैं।बच्चों में टाइप 2 डायबिटीज का सबसे बड़ा रिस्क फैक्टर क्या है?
अगर बच्चे फिजिकली इनएक्टिव होते हैं और खानपान की बुरी आदतें अपनाते हैं, तो उनमें इस बीमारी का रिस्क बढ़ जाता है।बच्चों का शुगर टेस्ट किस उम्र में शुरू करवाना चाहिए?
अगर परिवार में पहले से ही डायबिटीज है, तो आमतौर पर 10 वर्ष की उम्र या प्यूबर्टी शुरू होने पर टेस्ट कराना सही रहता है।क्या केवल मीठा खाने से बच्चों को डायबिटीज हो सकती है?
सिर्फ मीठा खाने से डायबिटीज नहीं होता है। अगर बच्चों की डाइट में अधिक कैलोरी, प्रोसेस्ड फूड और कम फाइबर है, तो इसकी वजह से इंसुलिन रेजिस्टेंस की समस्या हो सकती है, जो कि डायबिटीज का खतरा बढ़ाता है।
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Apr 26, 2026 14:35 IST
Modified By : Meera Tagore Apr 26, 2026 14:35 IST
Modified By : Meera TagoreApr 26, 2026 14:35 IST
Published By : Meera Tagore
Reviewed By : Dr Abhishek Chopra