विज्ञान ने भी माना कि एक गोत्र में शादी के हैं कई नुकसान

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Feb 07, 2018
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Quick Bites

  • गौत्र का उद्देश्य किसी व्यक्ति को उसके मूल प्राचीनतम व्यक्ति से जोड़ना है।
  • गोत्र मिलने पर दो लोग भाई-बहन के रिश्ते के बंध जाते हैं।
  • एक ही गौत्र या एक ही कुल में विवाह करना पूरी तरह प्रतिबंधित है।

शायद आपने भी कभी ना कभी अपने जीवन में जरूर सुना होगा कि समान गोत्र में शादी नहीं करनी चाहिए। आज की जनरेशन के बच्चे समझते हैं कि माता-पिता सिर्फ ये चीज मर्यादा को कायम रखने के लिए कर रहे हैं। जबकि सच कुछ और ही है। हालांकि कई चीजें हमारे समाज में ऐसी होती हैं जिनका कोई साइंटिफिक रीजन नहीं होता है। जबकि कुछ चीजें ऐसी होती हैं जिनका भले ही हमारे माता-पिता और बड़े बुजुर्गों के पास कोई साइंटिफिक रीजन ना हो उसके पीछे विज्ञान का हाथ जरूर होता है। ऐसा ही एक रिवाज है समान गोत्र में शादी ना करना।

क्या होता है गोत्र

गौत्र शब्द को अगर आप विस्तार से पढ़ेंगे तो जानेंगे कि इसका अर्थ होता है वंश या कुल। गौत्र प्रणाली का मुख्य उद्देश्य किसी व्यक्ति को उसके मूल प्राचीनतम व्यक्ति से जोड़ना है। विश्वामित्र, जमदग्नि, भारद्वाज, गौतम, अत्रि, वशिष्ठ, कश्यप- इन सप्तऋषियों और आठवें ऋषि अगस्ति की संतान 'गौत्र' कहलाती है। ब्राह्मणों के विवाह में गौत्र-प्रवर का बड़ा महत्व है। पुराणों व स्मृति ग्रंथों में बताया गया है कि यदि कोई कन्या संगौत्र हो किंतु सप्रवर न हो अथवा सप्रवर हो किंतु संगौत्र न हो, तो ऐसी कन्या के विवाह को अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। अगर इसी चीज को हम विज्ञान की नजर से देखेंगे तो पाएंगे कि ये कारण वाकई में जायज है।

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तीन पीढ़ियों का गोत्र होना चाहिए अलग 

हिंदू समाज में यह रिवाज है कि शादी के वक्त लड़का और लड़की का गोत्र एक दूसरे के साथ और मां के गोत्र के साथ तो मिलना ही नहीं चाहिए। साथ ही लड़के-लड़की का गोत्र नानी और दादी के गोत्र से भी नहीं मिलना चाहिए। कहने का तात्पर्य यह है कि शादी के लिए तीन पीढ़ियों का गोत्र अलग होना चाहिए। जब ऐसा होता है तभी शादी की जाती है। गोत्र मिलने पर दो लोग भाई-बहन के रिश्ते के बंध जाते हैं। अगर देखा जाए तो जाति का महत्व गोत्र के सामने कुछ नहीं है। यानि कि अगर लड़का और लड़की का गोत्र अलग है और जाति समान है तो भी वो शादी के बंधन में बंध सकते हैं।

क्या कहता है विज्ञान

हमारी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार एक ही गौत्र या एक ही कुल में विवाह करना पूरी तरह प्रतिबंधित किया गया है। विज्ञान मानता है कि एक ही गोत्र में शादी करने का सीधा असर संतान पर पड़ता है। एक ही गौत्र या कुल में विवाह होने पर दंपत्ति की संतान अनुवांशिक दोष के साथ उत्पन्न होती है। ऐसे दंपत्तियों की संतान में एक सी विचारधारा, पसंद, व्यवहार आदि में कोई नयापन नहीं होता। साथ ही ऐसे बच्चों में रचनात्मकता का अभाव होता है। कई शोध में भी इस बात का खुलासा हो चुका है कि एक ही गोत्र में शादी करने पर अधिकांश दंपत्तियों की संतान मानसिक रूप से विकलांग, नकरात्मक सोच वाले, अपंगता और अन्य गंभीर रोगों के साथ जन्म लेती है। इसलिए एक ही गोत्र में शादी करने से बचना चाहिए।

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गोत्र जितना दूर होगा संतान उतनी ही अच्छी होगी

विज्ञान कहता है कि स्त्री-पुरुष के गोत्र में जितनी अधिक दूरी होगी संतान उतनी ही स्वस्थ, प्रतिभाशाली और गुणी पैदा होगी। उनमें आनुवंशिक रोग होने की संभावनाएं कम से कम होती हैं। उनके गुणसूत्र बहुत मजबूत होते हैं और वे जीवन-संघर्ष में सपरिस्थितियों का दृढ़ता के साथ मुकाबला करते हैं। इन कारणों से शास्‍त्रों में एक ही गोत्र में विवाह करने की मनाही है। कहा जाता है कि वर और कन्‍या के एक ही गोत्र में विवाह करने से उनकी संतान स्‍वस्‍थ नहीं होती है एवं उसे कोई ना कोई कष्‍ट झेलना ही पड़ता है। इसके अलावा विवाह में गण मिलान भी किया जाता है। ज्‍योतिष के अनुसार गण मिलान के आधार पर ही वर कन्‍या का वैवाहिक जीवन निर्भर करता है। अगर यह मिलान उचित होता है तो दंपत्ति भी खुश रहता है।

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