Mon Sep 28, 2026 | 04:08 PM IST

Medically Reviewed by Dr Avani Tiwari , Senior Consultant – Psychiatry Metro Hospital and Heart Institute, Noida, Uttar Pradesh

मानसिक बीमारी के इलाज में क्यों दिया जाता है इलेक्ट्रिक शॉक? जानें ECT थेरेपी की जरूरत

इलेक्ट्रोकन्वल्सिव थेरेपी या ECT मानस‍िक स्‍वास्‍थ्‍य से जुड़ी एक मेड‍िकल प्रक्र‍िया है ज‍िसमें इलेक्‍ट्र‍िक करंट की मदद से मानस‍िक समस्‍या का इलाज क‍िया जाता है। जानें इसकी जरूरत कब पड़ती है?
मानसिक बीमारी के इलाज में क्यों दिया जाता है इलेक्ट्रिक शॉक? जानें ECT थेरेपी की जरूरतमानसिक बीमारी के इलाज में क्यों दिया जाता है इलेक्ट्रिक शॉक? जानें ECT थेरेपी की जरूरत

ECT थेरेपी (Electroconvulsive Therapy) का संबंध एक तरह के इलेक्‍ट्रि‍क शॉक से है और करंट का नाम सुनकर लोगों के मन में डर पैदा होता है। इंटरनेट पर मौजूद कई वीड‍ियोज में मरीज शॉक थेरेपी लेते हुए द‍िखते हैं ज‍िसे देखकर लोगों को लगता है क‍ि यह एक दर्दनाक प्रक्र‍िया है। जब दवा या कोई अन्‍य थेरेपी असर न करें, तब ECT की मदद ली जाती है। हालांक‍ि, कुछ लोगों को यह भी लगता है क‍ि हर ड‍िप्रेशन के मरीज को ECT थेरेपी की जरूरत होती है, जबक‍ि ऐसा नहीं है। ड‍िप्रेशन होने का मतलब यह नहीं है क‍ि मरीज को ECT की जरूरत होगी। ज्‍यादातर मरीजों में ड‍िप्रेशन का इलाल सीबीटी थेरेपी, लाइफस्‍टाइल में बदलाव, दवाओं से क‍िया जाता है। ज‍िन मरीजों पर दवाएं असर नहीं करतीं या ज‍िनके केस में ड‍िप्रेशन के साथ सुसाइडल टेंडेंसी देखी जाती है, उनमें ECT का प्रयोग क‍िया जा सकता है। आइए ECT थेरेपी के बारे में व‍िस्‍तार से समझते हैं। बेहतर जानकारी के ल‍िए हमने Dr. Avani Tiwari, Senior Consultant- Psychiatry At Metro Hospital And Heart Institute, Noida से बात की।

Mayo Clinic के मुताब‍िक, ECT के दौरान दिमाग में रसायन‍िक बदलाव होते हैं। ये बदलाव धीरे-धीरे मिलकर गंभीर डिप्रेशन या अन्‍य मानस‍िक रोग के लक्षणों को कम करने में मदद कर सकते हैं। इसी वजह से ECT का असर आमतौर पर एक से ज्यादा सत्रों का पूरा कोर्स लेने पर बेहतर असर द‍िखाता है।

ECT की जरूरत कब पड़ती है?

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  • अगर व्‍यक्‍त‍ि गंभीर ड‍िप्रेशन का श‍िकार है, तो उसे ECT थेरेपी दी जाती है।
  • ऐसे मरीज ज‍िनमें सुसाइडल टेंडेंसी यानी आत्‍महत्‍या करने की प्रवृत्ति हो, उन्‍हें भी यह थेरेपी दी जाती है।
  • ज‍िन गंभीर मामलों में डॉक्‍टर दवाओं के असर का इंतजार करना उच‍ित नहीं समझते, उन्‍हें ECT थेरेपी दी जाती है।
  • बाइपोलर डिसऑर्डर के मरीजों में बहुत ज्‍यादा उतार-चढ़ाव हो सकता है और ड‍िप्रेशन के एप‍िसोड देखने को म‍िल सकते हैं। ऐसे मरीजों में भी ECT की मदद ली जा सकती है।
  • ज‍िन मरीजों का खाना-पीना बंद हो गया हो या ज‍िनकी उम्र ज्‍यादा हो और दवा असर न करें, उन्‍हें भी डॉक्‍टर ECT कराने की सलाह दे सकते हैं।
  • गंभीर मानस‍िक स्‍थ‍िति‍ कैटेटोनिया में भी इसकी मदद ली जाती है।

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क्‍या ECT के दौरान दर्द होता है?

नहीं। ECT के बहुत से वीड‍ियोज इंटरनेट पर हैं ज‍िसमें यह देखने को म‍िलता है क‍ि मरीज को शॉक द‍िया जाता है और उसके चेहरे पर इसकी प्रत‍िक्र‍िया द‍िखती है। हालांक‍ि, इस थेरेपी में मरीज को एनेस्‍थीस‍िया द‍िया जाता है इसल‍िए थेरेपी के दौरान मरीज को दर्द नहीं होता है। मांसपेश‍ियों पर शॉक के असर से मरीज के चेहरे पर प्रत‍िक्र‍िया नजर आती है।

ECT की प्रक्रिया कैसी होती है?

  • ECT प्रक्र‍िया के दौरान मरीज को हॉस्‍प‍िटल में एनेस्‍थीस‍िया द‍िया जाता है।
  • इसके बाद मरीज के चेहरे पर इलेक्‍ट्रोड लगाए जाते हैं।
  • इलेक्‍ट्रोड के जर‍िए कंट्रोल तरीके से एक सीम‍ित समय के ल‍िए इलेक्‍ट्र‍िक करंट द‍िया जाता है।
  • पूरी प्रक्र‍िया के दौरान मरीज की सांस, हार्ट रेट, बीपी और ऑक्‍सीजन लेवल पर डॉक्‍टर नजर रखते हैं।
  • इस प्रक्र‍िया में 5 से 10 म‍िनट का समय लग सकता है।
  • इसके बाद मरीज को र‍िकवरी एर‍िया में रखा जाता है।
  • जैसे-जैसे एनेस्‍थीस‍िया का असर कम होता है, मरीज को धीरे-धीरे होश आ जाता है।

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ECT के क्‍या नुकसान हो सकते हैं?

ECT के बाद कुछ मरीजों को अस्‍थायी नुकसान हो सकते हैं जैसे सिरदर्द, मतली, मांसपेश‍ियों में दर्द, थकान, भ्रम वगैरह। कुछ मरीजों को जॉलाइन पेन भी हो सकता है।

ECT थेरेपी द‍िमाग को नुकसान पहुंचाती है?

ECT थेरेपी को प्रश‍िक्ष‍ित मेड‍िकल टीम की न‍िगरानी में क‍िया जाता है। इस प्रक्र‍िया के साथ कुछ नुकसान भी जुड़े होते हैं, लेक‍िन इसे द‍िमाग के ल‍िए इस तरह से ड‍िजाइन क‍िया गया है ताक‍ि इसके खतरे कम हों और फायदे ज्‍यादा म‍िलें।

ECT के बाद क‍िन सावधान‍ियों की जरूरत होती है?

  • ECT थेरेपी के बाद डॉक्‍टर आराम करने की सलाह देते हैं क्‍योंक‍ि एनेस्‍थीस‍िया के तुरंत बाद सामान्‍य होने में समय लगता है और कुछ मरीजों को थेरेपी के बाद स‍िरदर्द भी महसूस हो सकता है।
  • अगर बार-बार थेरेपी सेशन चल रहे हों, तो डॉक्‍टर की दी हुई दवाएं और न‍ियम‍ित उपचार लेना होता है।
  • ECT थेरेपी के बाद डॉक्‍टर वाहन चलाने या ज्‍यादा एकाग्रता वाले काम करने से बचने की सलाह देते हैं।

न‍िष्‍कर्ष:

ECT, मानस‍िक स्‍वास्‍थ्‍य से संबंध‍ित एक मेड‍िकल प्रक्र‍िया है ज‍िसमें मरीज को इलेक्‍ट्र‍िक शॉक देकर मानस‍िक समस्‍या का इलाज क‍िया जाता है। हालांंक‍ि, प्रक्र‍िया के दौरान मरीज को दर्द नहीं होता है क्‍योंक‍ि उसे एनेस्‍थीस‍िया द‍िया जाता है। ECT थेरेपी को हर डि‍प्रेशन के मरीज पर इस्‍तेमाल नहीं क‍िया जाता है। यह केवल उन्‍हीं मरीजों को दी जाती है ज‍िन पर दवाओं का असर नहीं होता या ज‍ो दवाओं के असर तक रुक नहीं सकते, जैसे गंभीर सुसाइडल टेंडेंसी वाले मरीज या अन्‍य गंभीर स्‍थ‍ित‍ि वाले मरीज। ECT थेरेपी के बाद मरीज को स‍िरदर्द, थकान, अस्‍थायी याददाश्त संबंध‍ित समस्‍याएं हो सकती हैं। इस थेरेपी को केवल डॉक्‍टर की सलाह पर द‍िया जाता है इसल‍िए मरीज इसे खुद नहीं चुन सकता।

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FAQ

  • क्या ECT से याददाश्त जा सकती है?

    थेरेपी से कुछ मरीजों में अस्‍थायी मेमोरी प्रॉब्‍लम हो सकती है। कुछ मरीजों को इलाज के कर‍ीब होने वाली घटनाओं को याद रखने में परेशानी हो सकती है। हालांक‍ि, ज्‍यादातर मामलों में कुछ समय बाद स्‍थि‍त‍ि में सुधार हो जाता है।
  • ECT के कितने सेशन दिए जाते हैं?

    ECT सेशन की संख्‍या हर मरीज के ल‍िए अलग हो सकती है। डॉक्‍टर हर सत्र के बाद मरीज की स्‍थि‍त‍ि की जांच करके आगे होने वाले सत्र की जानकारी देते हैं।

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Yashaswi Mathur

Senior Sub Editor

यशस्वी माथुर पिछले 10 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं, जिनमें से करीब 8 साल उन्होंने हेल्थ जर्नलिज्म को दिए हैं। फिलहाल वह OnlyMyHealth में सीनियर सब एडिटर के तौर पर काम कर रही हैं। यहां वह स्वास्थ्य, महिला स्वास्थ्य, पोषण और लाइफस्टाइल से जुड़े विषयों पर लिखती हैं। यशस्वी की खासियत है जटिल मेडिकल विषयों और रिसर्च को आसान भाषा में समझाना, ताकि आम पाठक भी उन्हें आसानी से समझ सके। लेख तैयार करते समय वह विशेषज्ञ डॉक्टरों की राय, मेडिकल रिसर्च और भरोसेमंद स्रोतों का ध्यान रखती हैं। जिन विषयों में मेडिकल वैरिफिकेशन जरूरी होता है, उन्हें प्रकाशित होने से पहले डॉक्टरों द्वारा रिव्यू किया जाता है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत हिंदुस्तान अखबार से की थी। उस दौरान स्वास्थ्य से जुड़ी उनकी एक खोजी रिपोर्ट के बाद लखनऊ के KGMU स्थित क्वीन मेरी अस्पताल के गायनेकोलॉजी विभाग में व्यवस्थाओं को लेकर स्वास्थ्य विभाग को सुधारात्मक कदम उठाने पड़े। Editorial Policy: यशस्वी द्वारा लिखे गए सभी लेखों की हमारी संपादकीय टीम द्वारा तथ्य-जांच की जाती है और आवश्यकता पड़ने पर संबंधित विषय विशेषज्ञों द्वारा समीक्षा की जाती है।

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    Sep 28, 2026 14:19 IST

    Published By : Yashaswi Mathur
    Reviewed By : Dr Avani Tiwari