गर्भावस्था में हर महिला को अपने स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखना चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि इन दिनों एक महिला पर दोहरी जिम्मेदारी होती है यानी खुद की और गर्भ में पल रहे शिशु की भी। बहरहाल, मानसून चल रहा है। अलग-अलग क्षेत्रों में तेज बारिश हो रही है, जिससे मच्छर बढ़ते हैं और मलेरिया जैसी घातक बीमारी हो सकती है। आइए, इस बारे में जानते हैं वृंदावन स्थित Mumma's Blessing IVF और Birthing Paradise की मेडिकल डायरेक्टर, गायनेकोलॉजिस्ट और IVF स्पेशलिस्ट डॉ. शोभा गुप्ता से।
क्या आप जानती हैं कि प्रेग्नेंट महिलाओं के लिए मलेरिया और भी चिंताजनक हो सकता है? इसकी वजह से उनकी प्रतिरक्षा प्रणाली प्रभावित होती है, जिससे शिशु के विकास पर बुरा असर पड़ सकता है। यहां हम आपको बता रहे हैं मलेरिया का गर्भवती महिला और गर्भस्थ शिशु पर क्या असर पड़ता है?
प्रेग्नेंट महिला पर मलेरिया का असर
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1. गंभीर एनीमिया का जोखिम
प्रेग्नेंसी में एनीमिया होना बिल्कुल सही नहीं है। इसका मतलब है कि शरीर में खून की कमी हो रही है और शिशु तक पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन तथा पोषक तत्व नहीं पहुंच रहे हैं, जिससे उसका विकास बाधित होता है। बहरहाल, मलेरिया के पैरासाइट रेड ब्लड सेल्स में घुसकर उसे नष्ट कर देते हैं। ऐसे में ऑक्सीजन सप्लाई कम हो जाती है, जिससे महिला में थकान बढ़ जाती है और उनके दिल पर भी दबाव बढ़ता है।
साल 2018 में Malaria Journal में प्रकाशित रिसर्च के अनुसार, किसी भी प्रकार (Species) का मलेरिया हो, गर्भवती महिला के लिए यह हर स्थिति में खतरनाक होता है। यह महिला के शरीर में खून की भारी कमी (एनीमिया) पैदा करता है और गर्भस्थ शिशु पर इसका बहुत बुरा असर पड़ता है।
2. हाइपोग्लाइसीमिया का खतरा
मलेरिया होने पर प्रेग्नेंट महिला के ब्लड शुगर का स्तर कम हो जाता है। हालांकि, मलेरिया होने की स्थिति में महिलाओं को कुछ दवाएं दी जाती हैं, ताकि रिकवरी की गति तेज हो सके। इन दवाओं के साइड इफेक्ट के रूप में उन्हें हाइपोग्लाइसीमिया हो सकता है। जानकारी के लिए बता दें कि मलेरिया पैरासाइट स्वयं ग्लूकोज की अत्यधिक खपत करता है वहीं, मलेरिया के इलाज के लिए जो दवाएं दी जाती हैं, वे शरीर में इंसुलिन नाम के हार्मोन को बढ़ा देती हैं।
3. पल्मोनरी एडिमा का रिस्क
Severe Malaria Observatory के अनुसार, प्रेग्नेंसी में मलेरिया पल्मोनरी एडिमा से भी संबंधित होता है। मलेरिया के कारण प्रेग्नेंट महिला के फेफड़ों यानी लंग्स में तरल पदार्थ भर सकता है। यह स्थिति प्रेग्नेंसी में बिल्कुल सही नहीं होती है। ऐसा इसलिए क्योंकि इस वजह से फेफड़े सही तरह से काम नहीं कर पाते हैं, जिससे महिला को सांस लेने में तकलीफ होती है। कई बार महिला को ऐसा महसूस होता है, जैसे उनका दम घुट रहा है। यह एक इमरजेंसी स्थिति होती है, जिसमें मरीज को तुरंत अस्पताल ले जाना चाहिए।
4. सेरेब्रल मलेरिया का संकट
जब मलेरिया का संक्रमण दिमाग में पहुंच जाता है, तो उसे सेरेब्रल मलेरिया कहा जाता है। इस तरह की स्थिति को कभी भी हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। इसकी वजह से संक्रमित लाल रक्त कोशिकाएं दिमाग की सूक्ष्म खून की नलियों में जाकर चिपक जाती हैं और उन्हें ब्लॉक कर देती हैं। इससे दिमाग तक ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाता है, जिससे महिला को मिर्गी के दौरे तक पड़ सकते हैं। गंभीर मामलों में प्रेग्नेंट महिला कोमा में भी जा सकती है।
गर्भ में पल रहे शिशु पर मलेरिया का प्रभाव
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गर्भपात या मृत शिशु का जन्म
मलेरिया का प्रभाव सिर्फ गर्भवती महिला तक ही सीमित नहीं रहता है। इसका असर गर्भस्थ शिशु पर भी पड़ता है। अगर मलेरिया के कारण महिला को तेज बुखार आ जाता है और प्लेसेंटा में ब्लड फ्लो बाधित होता है। प्रसिद्ध मेडिकल जर्नल BMC Medicine में प्रकाशित एक वैज्ञानिक शोध पत्र के अनुसार, यदि गर्भवती महिला को मलेरिया होता है, तो मृत शिशु के जन्म (Stillbirth) या जन्म के तुरंत बाद नवजात की मृत्यु (Neonatal Death) का खतरा बढ़ जाता है।
समयपूर्व डिलीवरी का खतरा
मलेरिया की वजह से महिला का शरीर बहुत ज्यादा कमजोर हो जाता है और शरीर में सूजन बढ़ जाती है। ऐसे में लेबर पेन समय से पहले शुरू हो सकता है, जिससे कई बार बच्चा समय से पहले जन्म ले लेता है। यह कंडीशन सही नहीं क्योंकि समयपूर्व जन्म लेने का मतलब है कि शिशु का पूरा विकास नहीं हुआ है। ऐसे बच्चे लंबे समय तक कमजोर रहते हैं और इनकी इम्यूनिटी भी बहुत कमजोर होती है।
गर्भ में बच्चे का सही विकास न होना
मलेरिया के दौरान महिला के शरीर में ब्लड फ्लो सही तरह से नहीं होता है। ऐसे में प्लेसेंटा में भी ब्लड फ्लो बाधित हो सकता है, जिससे शिशु तक पर्याप्त मात्रा में पोषक तत्व और ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाते, जिससे शिशु का सामान्य विकास नहीं हो पता है।
शिशु का वजन कम होना
आमतौर पर, जन्म के समय शिशु का वजन 2.5 किलोग्राम या इससे अधिक होना चाहिए। इससे कम होने पर शिशु को अंडरवेट माना जाता है। मलेरिया के कारण पर्याप्त पोषण न मिलने से शिशु का विकास रुक जाता है, जिससे उनका वजन भी नहीं बढ़ता है। ऐसे बच्चे जन्म के समय अंडरवेट हो सकते हैं। इस तरह के बच्चों को जन्म के बाद स्वास्थ्य से जुड़ी कई समस्याएं होने का खतरा बना रहता है।
प्रेग्नेंसी में मलेरिया के गंभीर लक्षण
- तेज बुखार के साथ ठंड लगना और कंपकंपी छूटना
- सिर और बदन में तीव्र दर्द होना
- कुछ भी खाने-पीने के तुरंत बाद उल्टी होना
- आंखों या त्वचा का पीला पड़ना
- बहुत ज्यादा कमजोरी और सुस्ती महसूस करना
- भ्रम होना (कुछ समझ न आना) और दौरे पड़ना
- सांस लेने में तकलीफ होना या छाती में दर्द होना
निष्कर्ष
प्रेग्नेंसी के दौरान मलेरिया होना किसी जोखिम से कम नहीं है। ऐसी स्थिति में गर्भवती महिला और गर्भवस्थ शिशु दोनों पर बुरा असर पड़ता है। यहां तक कि स्टिल बर्थ (मृत जन्म) का रिस्क भी बना रहता है। ऐसा किसी भी प्रेग्नेंट महिला के साथ न हो, इसके लिए जरूरी है कि वे समय रहते मलेरिया के लक्षणों को पहचानें और अपना इलाज करवाएं। वैसे बेहतर होगा कि अगर बुखार बार-बार आ-जा रहा हो या दो-तीन दिन से ज्यादा का समय हो गया है, तो डाॅक्टर के पास जाने में जरा भी देरी न करें।
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FAQ
गर्भावस्था के दौरान मलेरिया से बचाव के लिए किस तरह की सावधानियां बरतें?
गर्भावस्था में मलेरिया से बचने के लिए मच्छरदानी का उपयोग करें, शाम के समय पूरे शरीर को ढकने वाले कपड़े पहनें, घर में मॉस्किटो रेपेलेंट का इस्तेमाल करें और घर के आस-पास पानी जमा न होने दें।क्या मलेरिया होने पर गर्भवती महिला को अल्ट्रासाउंड कराना जरूरी होता है?
मलेरिया होने पर डॉक्टर शिशु के विकास (Fetal Growth), प्लेसेंटा के फंक्शन और एम्नियोटिक फ्लूइड के स्तर पर नजर रखने के लिए और शिशु के ग्रोथ के लिए अल्ट्रासाउंड और डॉपलर स्कैन कराने की सलाह देते हैं।
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Current Version
Aug 12, 2026 13:07 IST
Modified By : Meera Tagore Aug 12, 2026 13:07 IST
Published By : Meera Tagore
Reviewed By : Dr Shobha Gupta