प्लास्टिक सर्जरी सबसे पुरानी शल्य चिकित्सा विधाओं में से एक मानी जाती है। प्लास्टिक का मतलब सिंथेटिक पदार्थ प्लास्टिक नहीं है। यह शब्द ग्रीक भाषा के शब्द Plastikos से आया है, जिसका मतलब है आकार देना। प्लास्टिक सर्जरी शब्द को सबसे पहले 1818 में जर्मन सर्जन Carl Ferdinand von Graefe ने अपनी पुस्तक Rhinoplastik में इस्तेमाल किया था। Harold Gillies ने प्रथम विश्व युद्ध में सैनिकों के चेहरे को दोबारा बनाने के लिए नई सर्जिकल तकनीकों का विकास किया। इसलिए उन्हें फादर ऑफ मॉर्डन प्लास्टिक सर्जरी कहा जाता है। हालांकि प्लास्टिक सर्जरी के प्रथम तार भारत से भी जुड़े हैं। लगभग 600 ईसा पूर्व सुश्रुत ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'सुश्रुत संहिता' में नाक को दोबारा बनाने के लिए त्वचा के फ्लैप (Skin Flap) जैसी कई अन्य तकनीकों का जिक्र किया है। आइए जानते हैं प्लास्टिक सर्जरी की शुरुआत कब और कैसे हुई? आधुनिक सर्जरी प्रक्रियाओं को समझने के लिए हमने Dr. Chandni Jain Gupta, Dermatologist, Cosmetologist And Hair Transplant Surgeon At Elantis Healthcare, New Delhi से बात की।

600 ईसा पूर्व भारत में हुई प्लास्टिक सर्जरी की शुरुआत
क्या आपको पता है आज के समय में मॉर्डन कहलाई जाने वाले प्लास्टिक सर्जरी की खोज आज से करीब ढाई हजार साल पहले भारत में ही हुई थी। यह लगभग 600 ईसा पूर्व का समय था। कई धार्मिक ग्रंथों और सुश्रुत संहिता में इसका जिक्र है कि उस जमाने के चिकित्सक कहलाए जाने वाले व्यक्ति सुश्रुत ने नाक की सर्जरी (Rhinoplasty) का आविष्कार किया। सुश्रुत को फॉदर ऑफ प्लास्टिक सर्जरी भी कहा जाता है।
स्किन फ्लैप तकनीक का प्रयोग
सुश्रुत संहिता में बताया गया है उस जमाने के राजा-महाराजा दंड के तौर पर आरोपी की नाक काट देते थे। नाक को चेहरे और इज्जत की पहचान माना जाता है। ऐसे में सुश्रुत ने इसे दोबारा बनाने के लिए स्किन फ्लैप तकनीक को विकसित किया। इस प्रक्रिया में वे किसी अन्य भाग की त्वचा को कटे हुए हिस्से पर लगाकर इलाज करते थे।
1794 में भारतीय राइनोप्लास्टी तकनीक यूरोप तक पहुंची
साल 1794 में ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में भारतीय पद्धति से नाक की सर्जरी (Rhinoplasty) की रिपोर्ट प्रकाशित हुई, जिससे आधुनिक राइनोप्लास्टी के विकास को बढ़ावा मिला। साल 1860 से 1900 के बीच एनेस्थीसिया और एंटीसेप्टिक तकनीकों के आने से प्लास्टिक सर्जरी ज्यादा सुरक्षित मानी जाने लगी।
1914 से 1918 के बीच पहले विश्व युद्ध से बढ़ा विकास

साल 1914 से 1918 के बीच पहला विश्व युद्ध हुआ जिसमें घायल सैनिकों के इलाज के लिए रिकंस्ट्रक्टिव प्लास्टिक सर्जरी की मदद ली गई। घायल सैनिकों को ज्यादातर चेहरे और जबड़े पर चोट लगती थी। इस दौर में ब्रिटिश सर्जन Harold Gillies को प्रशंसा मिली क्योंकि उन्होंने ब्रिटेन के Queen Mary's हॉस्पिटल में एक विशेष यूनिट बनाया जहां युद्ध में घायल सैनिकों के चेहरे की सर्जरी की जाती थी।
1930 से 1940 के बीच हुआ कॉस्मेटिक सर्जरी का विस्तार

प्रथम विश्व युद्ध के बाद जब लोगों ने देखा कि प्लास्टिक सर्जरी से चोट और चेहरा ठीक हो जाता है, तो उसे सौंदर्य सुधार के लिए इस्तेमाल किए जाने लगा। उस दशक में एजिंग को कम करने पर जोर अधिक था, ऐसे में डॉक्टर झुर्रियां, ढीली त्वचा और चेहरे के आकार में बदलाव के लिए तकनीकों को विकसित करना शुरू कर दिया। इस दौरान फेसलिफ्ट तकनीक बहुत प्रचलित हुई।
1960 में हुआ सिलिकॉन इम्प्लांट का विकास
जैसे-जैसे प्लास्टिक सर्जरी कॉस्मेटिक सर्जरी में बदल रही था, लोगों ने इसे अलग-अलग अंगों को खूबसूरत बनाने की चाह में एक आधुनिक तकनीक की तरह देखा। 1960 में सिलिकॉन ब्रेस्ट इम्प्लांट का उपयोग शुरू हुआ। इसका उद्देश्य स्तनों के आकार में बदलाव करना और स्तन कैंसर के बाद पुनर्निर्माण करना था। इससे कॉस्मेटिक ब्रेस्ट सर्जरी के क्षेत्र में तेजी आई।
1980 से 1990 के बीच लिपोसक्शन और लेजर तकनीक आई
साल 1980 से 1990 के बीच जब कॉस्मेटिक सर्जरी आम लोगों के बीच लोकप्रिय होने लगी, तब लिपोसक्शन और फेसलिफ्ट तकनीक का विकास बढ़ा। लिपोसक्शन शरीर के कुछ हिस्सों से चर्बी हटाने की तकनीक थी और फेसलिफ्ट तकनीक की मदद से एजिंग के कारण लूज स्किन को बेहतर बनाने में मदद मिली। इस दौरान दाग-धब्बों, झुर्रियों के लिए लेजर तकनीक की शुरुआत भी हुई।
साल 2000 के बाद हुआ 3D इमेजिंग का उपयोग
साल 2000 के बाद प्लास्टिक सर्जरी में डिजिटल तकनीक जुड़ी। इस दौरान 3D इमेजिंग यानी सर्जरी से पहले मरीज के चेहरे या शरीर का डिजिटल मॉडल बनाने की तकनीक विकसित हुई। साथ ही जटिल सर्जरी में रोबोटिक तकनीक का प्रयोग हुआ।
साल 2026 में AI आधारित सर्जिकल तकनीक

Dermatologist, Cosmetologist And Hair Transplant Surgeon Dr. Chandni Jain Gupta ने बताया कि आज के समय में प्लास्टिक सर्जरी इतनी एडवांस हो चुकी है कि AI की मदद से मरीज के चेहरे और शरीर की डिजिटल तस्वीरों का विश्लेषण कर लिया जाता है। AI की मदद से डॉक्टर को डेंटल, कॉस्मेटिक या सर्जरी प्रक्रिया के दौरान यह समझने में मदद मिलती है कि चेहरे की बनावट, त्वचा का प्रकार कैसा है ताकि इलाज में सुविधा हो।
3D प्रिंटेड इम्प्लांट
- 3D प्रिंटिंग से मरीज की जरूरत के अनुसार इम्प्लांट या सर्जिकल मॉडल तैयार किए जा रहे हैं।
- चेहरे की हड्डियों, जबड़े और खोपड़ी को सर्जरी के बाद फिर से पहले जैसा किया जा सकता है।
फायदा:
- मरीज के शरीर के अनुसार फिट होने वाले इम्प्लांट मिलते हैं।
- जटिल सर्जरी में अधिक सटीकता मिलती है।
एडवांस्ड फैट ग्राफ्टिंग तकनीक
Dr. Chandni Jain Gupta ने बताया कि अब फैट को शरीर से निकालकर अधिक सावधानी से प्रोसेस किया जाता है और फिर चेहरे या शरीर के अन्य हिस्सों में लगाया जाता है। इसका इस्तेमाल एजिंग साइन्स को कम करने और शरीर के आकार को बेहतर बनाने में किया जाता है।
साल 2035 तक 3D बायोप्रिंटिंग का संभावना
वैज्ञानिक ऐसी तकनीक पर काम कर रहे हैं जिसमें मरीज की अपनी कोशिकाओं से त्वचा या अन्य टिशूज बनाए जा सकेंगे। भविष्य में दुर्घटना या जलने की चोट के बाद कृत्रिम रूप से बनाए गए टिशूज इस्तेमाल किए जा सकते हैं। यह तकनीक साल 2035 तक विकसित होने की उम्मीद है।
निष्कर्ष:
600 ईसा पूर्व भारत में सुश्रुत संहिता में प्लास्टिक सर्जरी का जिक्र मिलता है। नाक की सर्जरी (Rhinoplasty) के आविष्कार के बाद इसे नया रूप मिला। प्रथम विश्व युद्ध में घायल सैनिकों के इलाज में इसका इस्तेमाल हुआ, इसके बाद प्लास्टिक सर्जरी से कॉस्मेटिक सर्जरी का भी रूप लिया। सिलिकॉन इम्प्लांट, लिपोसक्शन, लेजर, 3D इमेजिंग, AI आधारित तकनीक वगैरह प्लास्टिक सर्जरी के ही आधुनिक रूप हैं। लेजर, AI, रोबोटिक तकनीक की मदद से अब भविष्य में कम दर्द और तेज रिकवरी वाली प्रक्रियाएं बढ़ने की उम्मीद है जिससे मरीजों की परेशानी कम होगी।
image sources: magnific, aestheticplasticsurgeons.org, wikipedia, reddit
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Aug 05, 2026 16:57 IST
Modified By : Yashaswi Mathur Aug 05, 2026 16:57 IST
Modified By : Yashaswi MathurAug 05, 2026 16:57 IST
Published By : Yashaswi Mathur
Reviewed By : Dr Chandni Jain Gupta