पंचकर्म से स्‍वास्‍थ्‍य लाभ

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Jun 13, 2011
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पंचकर्मा आयुर्वेद के अनुसार पंचकर्मा थेरेपी से शरीर में मौजूद टाक्सिन निकल जाते हैं। पंचकर्मा के तीन चरण हैं।


शुरूवाती थेरेपी को पूर्वकर्म कहते हैं। पंचकर्म की 5 मुख्य थेरेपी होती हैं वामन, नास्या  , विरेचन, रक्तमोक्षासना और वास्ति और इस विकित्सा के अंत में होने वाली प्रक्रिया को पाश्चातकर्मा कहते हैं।


पंचकर्मा के अधिक प्रभाव के लिए प्री पंचकर्म और पोस्ट पंचकर्म दोनों ही महत्वपूर्ण हंल।


पूर्वकर्मा थेरेपी से हमारे शरीर को टाक्सिन से आराम मिलता है। पूर्वकर्मा का पहला चरण है ओलेशन। इससे शरीर को हर्बल आयल और औषधीय आयल से सैचुरेट किया जाता है।


घी या औषधीय तेल से अभ्यांतर स्नेहाना या आंतरिक ओलेशन की मदद से गहरे टिश्यु से टाक्सिन को शरीर के गैस्ट्रो इन्टेस्टाइनल भाग में पंहुचाया जाता है और फिर पंचकर्मा थेरेपी से इसे निकाल दिया जाता है।


वाह्य रूप से तेल लगाने की प्रक्रीया को अभ्यांग कहते हैं। इसमें पूरे शरीर में औषधीय तेल से तेज़ी से मसाज करना  होता है। किस प्रकार का तेल लेना है यह आप पर निर्भर करता है।


पूर्वकर्म थेरेपी की अनुरूपता को समझने का सबसे आसान तरीका है। मान लीजिए कि आपने एक कटोरी में तेल लगाने के बाद उसमें शहद डाल दिया ऐसे में शहद फिसलने की वजह से कटोरी से नहीं चिपकेगा।


टाक्सिन में शहद जैसे ही गुण होते हैं और यह पूर्वकर्मा थेरेपी से शरीर से आसानी से निकल कर शरीर को आराम पहुंचाता है।


पूर्वकर्मा थेरेपी के बाद टाक्सिन फिरसे गैस्ट्रोइन्टेस्टाइनल ट्रैक में आ जाते हैं और उन्हें निकालने के लिए पंचकर्मा थेरेपी करनी पड़ती है जैसे वामन, नास्या, विरेचन, रक्तमोक्षासना और वास्ति। इनमें से हर एक थेरेपी की मदद से शरीर से टाक्सिन को निकाला जाता है। टाक्सिन या तो उपर से या नीचे से या शरीर के पेरीफरी या स्किन से निकलते हैं।


आयुर्वेद क्लीनिशियन यह निर्धारित करते हैं कि व्यक्ति को किस प्रकार की प्रकीया करनी चाहिए। डीटाक्सिफिकेशन प्रक्रिया के बाद डाक्टर हर्बल रेमेडीज़ के इस्तेमाल से शरीर की प्रक्रीयाओं को संतुलित करने की कोशिश करता है जो कि पाश्चातकर्म का एक भाग हैं।


हर्बल रेमेडीज़ में औषधीय लक्षण होते हैं जिससे कि अग्नि की पुर्नस्थापना करके संतुलन स्थापित किया जा सके।  ऐसी प्रक्रियाओं को किसी बीमारी के लिए नहीं इस्तेमाल किया जाता है। एक बार जब शरीर से टाक्सिन निकल जाते हैं तो यह संतुलित हो जाता है। इस थेरेपी के फायदे उसी समय से दिखने लगते हैं जब आप पाश्चातकर्म शुरू कर देते हैं। फिर प्रतिदिन आप इसके फायदों को अनुभव करने लगेंगे।

 

 

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