मलेरिया क्या है? जानें इसके लक्षण, कारण और उपचार

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Apr 23, 2018
Quick Bites

  • मलेरिया एक ऐसा रोग है जो मादा 'एनोफिलीज' मच्छर के काटने से होता है।
  • मलेरिया होने का मुख्य कारण परजीवी मादा मच्छर एनॉफिलीज ही है।
  • समय रहते काबू पा लिया जाए तो मलेरिया का इलाज ज्यादा मुश्किल नहीं है।

मलेरिया एक ऐसा रोग है जो मादा 'एनोफिलीज' मच्छर के काटने से होता है। यह मच्छर गंदे और दूषित पानी में पनपते हैं जो उड़कर हम तक पहुंचते हैं। डेंगू के मच्छर का काटने का समय जहां सूर्यास्त से पहले होता है वहीं, मलेरिया फैलाने वाले मच्छर सूर्यास्त के बाद काटते हैं। इन्हीं सब चीजों के प्रति सचेत रहने और खुद को इस रोग से बचाने के लिए हर साल 25 अप्रैल को विश्वभर में मलेरिया दिवस मनाया जाता है। यूनिसेफ द्वारा इस दिन को मनाने का उद्देश्य मलेरिया जैसे रोग पर जनता का ध्यान केंद्रित करना था, जिससे हर साल लाखों लोग मरते हैं। इस मुद्दे पर विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि मलेरिया नियंत्रण कार्यक्रम चलाने से बहुत सी जानें बचाई जा सकती हैं। आमतौर पर मलेरिया का रोग अप्रैल से शुरू हो जाता है लेकिन जुलाई से नवंबर के बीच में यह रोग अपने चरम पर होता है। यानि कि इसी दौरान लाखों लोग इसकी चपेट में आते हैं।

क्या हैं मलेरिया होने के कारण?

मलेरिया होने का मुख्य कारण परजीवी मादा मच्छर एनॉफिलीज ही है। दरअसल प्लाज्मोडियम नामक परजीवी मादा मच्छर एनॉफिलीज के शरीर के अंदर पलता है। यह परजीवी मादा मच्छर एनॉफिलीज के काटने से फैलता है। जब यह मच्छर किसी व्यक्ति को काटता है, तब रोग का परजीवी रक्तप्रवाह के जरिये यकृत में पहुंचकर अपनी संख्या को बढ़ाने लगता है। यह स्थिति लाल रक्त कोशिकाओं पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालती है। चूंकि मलेरिया के परजीवी लाल रक्त कोशिकाओं में पाये जाते हैं, इसलिए ये मलेरिया से संक्रमित व्यक्ति द्वारा ब्लड ट्रासफ्यूजन के जरिये दूसरे व्यक्ति में भी संप्रेषित हो सकते हैं। इसके अलावा अंग प्रत्यारोपण और एक ही सीरिंज का दो व्यक्तियों में इस्तेमाल करने से भी यह रोग फैल सकता है। मलेलिया होने पर हर व्यक्ति में एक जैसे लक्षण नजर आते हैं क्योंकि यह काफी हद तक इस चीज पर निर्भर करता है कि आपको इंफेक्शन कितना हुआ है। 

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मलेरिया के लक्षण

  • सिर में तेज दर्द होना
  • उल्टी होना या जी मचलना
  • हाथ पैरों खासकर जोड़ों में दर्द होना
  • कमजोरी और थकान महसून होना 
  • शरीर में खून की कमी होना
  • आंखों की पुतलियों का रंग पीला होना
  • पसीना निकलने पर बुखार कम होना
  • तेज बुखार सहित फ्लू जैसे कई लक्षण सामने आना
  • ठंड के साथ जोर की कंपकंपी होना, और कुछ देर बाद नॉर्मल हो जाना

Quiz of the Week

16 मई को राष्ट्रीय डेंगू दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसका उद्देश्य डेंगू के बारे में लोगों में जागरूकता फैलाना है क्योंकि हर साल करोड़ों लोग जानकारी के अभाव में इस रोग के कारण जान गंवाते हैं।

डेंगू का बुखार कैसे फैलता है?

 

मधुमक्खी के काटने से

,

 

डेंगू के मरीज को छूने से

,

 

मच्छर के काटने से

,

इनमें से कौन सा डेंगू का लक्षण नहीं है?

 

मुंह से बदबू आना

,

 

ठंड लगने के बाद अचानक तेज बुखार चढ़ना

,

 

सिर, मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द

,

डेंगू का पता किस टेस्ट द्वारा चलता है?

 

पेशाब की जांच द्वारा

,

 

खून की जांच द्वारा

,

 

शारीरिक लक्षणों द्वारा

,

डेंगू होने पर मरीज को कब अस्पताल में भर्ती करना चाहिए?

 

प्लेटलेट्स 5 होने पर

,

 

प्लेटलेट्स 200 से ज्यादा होने पर

,

 

प्लेटलेट्स 1 लाख से कम होने पर

,

डेंगू से बचाव के लिए क्या करना चाहिए?

 

आसपास की साफ-सफाई करना

,

 

पौष्टिक आहार खाना

,

 

दोनों

,

क्या डेंगू को घर पर इलाज द्वारा ठीक किया जा सकता है?

 

हां

,

 

नहीं

,

 

कुछ मामलों में

,

क्या डेंगू जानलेवा होता है?

 

हां

,

 

नहीं

,

 

कभी-कभी

मलेरिया के लिए जरूरी टेस्ट

किसी भी बीमारी का पता लगाने के लिए डॉक्टर की सलाह लेना बहुत जरूरी होता है और अगर बीमारी गंभीर है तो उसके लिए डॉक्टर की सलाह पर कुछ जांच भी करवाई जाती है। मलेरिया की जांच के लिए डॉक्टर ब्लड टेस्ट, एक्स-रे आदि कराने की सलाह देते हैं। हालांकि मलेरिया को जांचने के लिए मुख्य रूप से ब्लड टेस्ट करवाए जाते हैं। मलेरिया परजीवी के कौन से कण रोगी में मौजूद है इसका पता भी मलेरिया सूक्ष्मदर्शी परीक्षण से लगता है। मुख्य रूप से मलेरिया की जांच करने के 3 तरीके हैं-

सूक्ष्मदर्शी जांच : मलेरिया की पहचान करने के लिए ब्लड प्लेटलेट्स का सूक्ष्मदर्शी से परीक्षण करना सबसे बेहतर, भरोसेमंद और अच्छा तरीका है। इससे मलेरिया के सभी परजीवियों की पहचान कर उसकी रोकथाम अलग-अलग रूपों में की जा सकती है। ब्लड प्लेटलेट्स मुख्य रूप से दो तरह की बनती है। इनमें पतली प्लेटलेट्स में परजीवी की बनावट को सही ढंग से पहचाना जा सकता है। वहीं मोटी प्लेटलेट्स में रक्त‍ की कम समय में अधिक जांच की जा सकती है। मोटी प्लेटलेट्स के जरिए कम माञा के संक्रमण को भी जांचा जा सकता है। इतना ही नहीं, मलेरिया जांच के दौरान परजीवियों के कई चरणों की जांच के लिए भी इन दोनों ब्लड प्लेसटलेट्स की जरूरत पड़ती है।

रैपिड एंटीजन टेस्ट : मलेरिया की जांच के लिए कई मलेरिया रैपिड एंटीजन टेस्ट भी उपलब्ध हैं। इन परीक्षणों में रक्त की एक बूंद लेकर 15-20 मिनट में ही परिणाम सामने आ जाते है। जहां लैब का प्रबंध नहीं होता वहां मलेरिया परीक्षण के लिए एंटीजन टेस्ट कारगार साबित होते है। इस टेस्ट के माध्यम से मलेरिया का सवरूप क्या है इसका भी आसानी से पता लगाया जा सकता है।

मलेरिया आरटीएस : मलेरिया आरटीएस (एस वैक्सीन) भी मलेरिया को जांचने का एक सफल तरीका है। 

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मलेरिया का इलाज 

अगर समय रहते काबू पा लिया जाए तो मलेरिया का इलाज ज्यादा मुश्किल नहीं है। मलेरिया के इलाज में ऐंटिमलेरियल ड्रग्स और लक्षणों को नियंत्रण में लाने के लिए दवाएं, जरूरी टेस्ट, घरेलू नुस्खे और तरल पदार्थ व इलेक्ट्रोलाइट्स शामिल होते हैं। मलेरिया के इलाज के लिए हर मरीज के लिए एक सी दवा नहीं होती है। बल्कि डॉक्टर इंफेक्शन के स्तर और क्लोरोक्वाइन प्रतिरोध की संभावना को देखते हुए दवा बताते हैं। मलेरिया में दी जाने वाली दवाओं में क्विनीन, मेफ्लोक्विन व डॉक्सीसाइक्लिन शामिल होता है। फाल्सीपेरम मलेरिया से ग्रस्त लोगों के लक्षण सबसे गंभीर होते हैं। इससे ग्रस्त लोगों को इलाज के शुरुआती दिनों में ICU में भर्ती होना पड़ सकता है। इस रोग में श्वास की विफलता, कोमा और किडनी की विफलता भी हो सकती है। गर्भवती महिलाओं में, क्लोरोक्विन का इस्तेमाल मलेरिया के लिए उपर्युक्त इलाज माना जाता है।

आसान है मलेरिया से बचाव

  • यदि मलेरिया बुखार में शरीर का तापमान बहुत जल्दी –जल्दी बढ़ या घट रहा है और ऐसा लगातार हो रहा है, तो आपको दोबारा से रक्त जांच करवानी चाहिए।
  • ध्यान रहे जब आप दोबारा या जितनी बार भी रक्त जांच करवा रहे हैं, तो मलेरिया की क्लोंरोक्वीनिन दवाई ना लें।
  • मलेरिया में तबियत बिगड़ने पर अपनी आप अपनी मर्जी से किसी भी प्रकार की दर्द निवारक दवाईयों को न लें।
  • मलेरिया ज्वर के गंभीर होने पर भी संतरे के जूस जैसे तरल पदार्थों का सेवन लगातार करते रहें।
  • शरीर का तापमान बढ़ने और पसीना आने पर ठंडा टॉवल लपेट लें। थोड़े समय के अंतराल के बाद माथे पर ठंडी पट्टियां रखते रहे।
  • दवाईयों के सेवन के बाद भी तेज़ बुखार हो रहा है, तो कोई लापरवा‍ही न बरतें नहीं तो आप किसी घातक बीमारी का भी शिकार हो सकते हैं। 

मलेरिया के अन्य हानिकारक प्रभाव

मलेरियाग्रस्त व्यक्ति यदि इलाज को लेकर जरा सी भी चूक करता है तो वह कई तरह अन्य तरह से हानिकारक साबित हो सकती है। जिसमें से एक है मस्तिष्काघात। मलेरिया के दौरान मस्तिष्क‍ पर प्रभाव पड़ना या दिमागी रूप से विकार पैदा होना भी एक समस्या है। मलेरिया का प्लाज्मोडियम फाल्सीपेरम रूप सबसे खतरनाक होता है। यदि मलेरिया प्लामज्मोडियम के परजीवी दिमाग में पहुंच जाते है तो मलेरियाग्रस्त व्‍यक्ति को ब्रेन हैमरेज हो सकता है। मलेरिया के कीटाणु प्लाज्मोडियम फाल्सीपेरम का शरीर पर इतना प्रभाव पड़ता है कि इससे मनुष्य न सिर्फ अपनी याददाश्त खो सकता है बल्कि चक्कर आने और बेहोशी की हालात का भी शिकार हो सकता है। दरअसल, मस्तिष्क मलेरिया एक ऐसी गंभीर बीमारी है जिसमें परजीवी मस्तिष्क के ऊतकों के जरिए रक्त पहुंचाने वाली कोशिकाओं को प्रभावित करते हैं। इसकी जांच करना काफी मुश्किल होता है क्योंकि मरीज या तो बेहोश हो सकता है या वह गंभीर रूप से बीमार हो सकता है।

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मलेरिया के इलाज के लिए घरेलू नुस्खे

अंग्रेजी दवाओं के अलावा घरेलू नुस्खों से भी मलेरिया का इलाज संभव है। किसी भी घरेलू इलाज का सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि इसके कोई साइड इफेक्ट नहीं होते हैं। खास बात यह है कि अब बहुत से डॉक्टर भी मलेरिया जैसी गंभीर बीमारियों के लिए भी एंटीबायोटिक के अलावा प्राकृतिक उपचार लेने की सलाह देने लगे हैं। आइए जानते हैं कुछ घरेलू नुस्खे-

  • गिलोय के काढ़े या रस में शहद मिलाकर 40 से 70 मिलीलीटर की मात्रा में नियमित सेवन करने से मलेरिया में लाभ होता है। इस प्रकार के बुखार के लिए लगभग 40 ग्राम गिलोय को कुचलकर मिट्टी के बर्तन में पानी मिलाकर रात भर ढक कर रख दें। सुबह इसे मसल कर छानकर रोगी को अस्सी ग्राम मात्रा दिन में तीन बार पीने से बुखार दूर हो जाता है।
  • अमरुद का सेवन मलेरिया में लाभप्रद होता है। यदि किसी को मलेरिया हो जाए तो उसे रोज दिन में तीन बार उसे अमरूद अवश्य खिलाएं। बहुत प्रभावी रहेगा। अमरूद के मुकाबले इसके छिलके में विटामिन ‘सी’ बहुत अधिक होता है। इसलिए अमरूद को छिलका हटाकर कभी न खाएं।
  • मलेरिया के उपचार के लिए 10 ग्राम तुलसी के पत्ते और 7-8 मिर्च को पानी में पीसकर सुबह और शा‍म लेने से बुखार ठीक हो जाता है। इसमें आप शहद भी मिला सकते हैं। अनेक गुणों के साथ ही तुलसी मच्छरों को भगाने में भी मददगार साबित होती है।
  • अदरक का सेवन भोजन का स्वाद बढ़ाने के साथ-साथ मलेरिया के इलाज के लिए भी काफी लाभदायक होता है। थोड़ी सी अदरक लेकर उसमें 2-3 चम्‍मच किशमिश डालकर पानी के साथ उबालें। जब तक पानी आधा नहीं रह जाता इसे उबालते रहें। थोड़ा ठंडा होने पर इसे दिन में दो बार लें। काफी लाभ मिलेगा।
  • इस रोग में नीम के तने की छाल का काढ़ा दिन में तीन बार पिलाने से लाभ होता है। इससे बुखार में आराम मिलता है। थोड़े से नीम के हरे पत्ते और चार काली मिर्च एक साथ पीस लें। फिर इसे थोड़े से पानी में मिलाकर उबाल लें। इस पानी को छानकर पीने से लाभ होता है। 

मलेरिया में क्या खांए?

  • नीबू को काटकर उस पर काली मिर्च का चूर्ण व सेंधा नमक डालकर चूसें, स्वाद ठीक होगा और फायदा भी पहुंचेगा। 
  • मलेरिया ज्वर में अमरूद खाने से रोगी को लाभ होता है।
  • तुलसी के पत्ते व काली मिर्च को पानी में उबालकर, छानकर पिएं।
  • चाय, कॉफी व दूध लें। चाय में तूलसी के पत्तें काली मिर्च, दालचीनी या अदरक डाल कर पियें।
  • मलेरिया के रोगी को सेब खिलाएं, यह मलेरिया में फायदा करता है।
  • पीपल का चूर्ण बनाकर शहद मिलाकर सेवन करने से मलेरिया के बुखार में लाभ होता है।
  • दाल-चावल की खिचड़ी, दलिया, साबूदाना का सेवन करें। ये पचने में आसान होते हैं और पोष्टिक भी होते हैं।

मलेरिया में क्या न खांए?

  • दही, शिकंजी, गाजर, मूली आदि न खाएं।
  • मिर्च-मसाले व अम्ल रस से बने खाद्य पदार्थों का सेवन न करें।
  • ठंडा पानी बिल्कुल न पियें और ना ही ठंडे पानी से नहाएं।
  • रोगी को आम, अनार, लीची, अनन्नास, संतरा आदि नहीं खाने चाहिए।
  • ठंडी तासीर के फल व पदार्थ न खाएं। 
  • एसी में ज्यादा न रहें और न ही रात को एसी में सोएं। 

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