विश्व आॅटिज्म दिवस : भारत में 10 लाख लोग हैं इसके रोगी, जानें कारण और लक्षण

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Apr 02, 2018

आज यानि कि 2 अप्रेल को विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस मनाया जाता है। ऑटिज्म एक ऐसा रोग है जिसकी चपेट में आने वाले व्यक्ति के व्यवहार में कई तरह के बदलाव देखने को मिलते हैं। जन्म के समय बच्चे में ऑटिज्म स्पेकट्रम डिसआर्डर का पता लगा पाना मुश्किल होता है। ऑटिज्म के शुरुआती लक्षण 1-3 साल के बच्चों में नजर आ जाते हैं। एक साल की उम्र से पहले बच्चों में इसके लक्षणों को पहचान पाना काफी मुश्किल हो जाता है। इस समस्या के लिए आनुवांशिक और पर्यावरण संबंधी कई कारण जिम्मेदार होते हैं।

ऑटिज्म से ग्रसत बच्चे छूने पर असामान्य बर्ताव करते हैं। जब उन्हें उठाया जाता है तो वे लिपटने के जगह लचीले पड़ जाते हैं या तन जाते हैं। जीवन के पहले साल में वे सामान्य ढंग से विकसित नही हो पाते जैसे मां की आवाज पर मुस्कुराना ,दूसरो का ध्यान खिंचने के लिए किसी वस्तु की तरफ इशारा करना, एक शब्द से बातचीत करना। बच्चा आंख से आंख नही मिला पाता है, माता-पिता को अजनबियों से अलग नहीं पहचान पाता है और दूसरों में काफी कम रूचि लेता है। इस तरह का व्यवहार काफी असमान्यताओं की ओर इशारा करता है। विशेषज्ञ कहते हैं कि शोर शराबे के बीच रहने वाले बच्चों में इस रोग के पनपने का ज्यादा खतरा रहता है।

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आखिर है क्या आॅटिज्म

ऑटिज्म एक तरह का न्यूरोलॉजिकल डिस्ऑर्डर है, जो बातचीत (लिखित और मौखिक) और दूसरे लोगों से व्यवहार करने की क्षमता को सीमित कर देता है। इसे ऑटिस्टिक स्पैक्ट्रम डिस्ऑर्डर कहा जाता है, क्योंकि प्रत्येक बच्चे में इसके लक्षण अलग-अलग देखने को मिलते हैं। ऐसे कुछ बच्चे बहुत जीनियस होते हैं या उनका आईक्यू सामान्य बच्चों की तरह होता है, पर उन्हें बोलने और सामाजिक व्यवहार में परेशानी होती है। कुछ ऐसे भी होते हैं, जिन्हें सीखने-समझने में परेशानी होती है और वे एक ही तरह का व्यवहार बार-बार करते हैं। चूंकि ऑटिस्टिक बच्चों में समानुभूति का अभाव होता है, इसलिए वे दूसरों तक अपनी भावनाएं नहीं पहुंचा पाते या उनके हाव-भाव व संकेतों को समझ नहीं पाते। कुछ बच्चे एक ही तरह का व्यवहार बार-बार करने के कारण थोड़े से बदलाव से ही हाइपर हो जाते हैं।

भारत में ऑटिज्म 

  • भारत में करीब 10 लाख लोग ऑटिज्म से प्रभावित थे। 
  • हमारे देश में 68 में से 1 बच्चा ऑटिज्म से प्रभावित है। 
  • 20 फीसदी लोगों को ये रोग आनुवांशिक कारण के चलते होता है।
  • 80 फीसदी मामलों के लिए पर्यावरण वंशानुगत कारण जिम्मेदार होते हैं। 
  • 12 से 13 माह के बच्चों में ऑटिज्म के लक्षण दिखने लगते हैं। 

जेनेटिक समस्या हो सकती है आॅटिज्म

ऑटिज्म के वास्तविक कारण के बारे में फिलहाल जानकारी नहीं है। पर्यावरण या जेनेटिक प्रभाव, कोई भी इसका कारण हो सकता है। वैज्ञानिक इस संबंध में जन्म से पहले पर्यावरण में मौजूद रसायनों और किसी संक्रमण के प्रभाव में आने के प्रभावों का भी अध्ययन कर रहे हैं। शोधों के अनुसार बच्चे के सेंट्रल नर्वस सिस्टम को नुकसान पहुंचाने वाली कोई भी चीज ऑटिज्म का कारण बन सकती है। कुछ शोध प्रेग्नेंसी के दौरान मां में थायरॉएड हॉरमोन की कमी को भी कारण मानते हैं। इसके अतिरिक्त समय से पहले डिलीवरी होना। डिलीवरी के दौरान बच्चे को पूरी तरह से आक्सीजन न मिल पाना। गर्भावस्था में किसी बीमारी व पोषक तत्वों की कमी प्रमुख कारण है।

बच्चे के जन्म के छह माह से एक वर्ष के भीतर ही इस बीमारी का पता लग जाता है कि बच्चा सामान्य व्यवहार कर रहा है या नहीं। शुरुआती दौर में अभिभावकों को बच्चे के कुछ लक्षणों पर गौर करना चाहिए। जैसे बच्चा छह महीने का हो जाने पर भी किलकारी भर रहा है या नहीं। एक वर्ष के बीच मुस्कुरा रहा है या नहीं या किसी बात पर विपरीत प्रतिक्रिया दे रहा है या नहीं। ऐसा कोई भी लक्षण नजर आने पर अभिभावक को तुरंत किसी अच्छे मनोचिकित्सक से संपर्क करना चाहिए।

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