इन कारणों से खिसक जाता है कंधा, लक्षणों को पहचानकर जल्द इलाज जरूरी है

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Feb 16, 2018
Quick Bites

  • कंधे अपनी जगह से खिसक जाते हैं जिसे आम भाषा में लोग कंधा उतरना कहते हैं।
  • कंधा बॉल और सॉकेट का बना एक जोड़ है।
  • डिसलोकेशन एक बार से अधिक होता है तो इसे रिकरेंट डिसलोकेशन कहते हैं।

कई बार जब खेल-कूद, एक्सीडेंट या किसी चोट के दौरान हमारे कंधों को बड़ा नुकसान पहुंचता है। इसके कारण हमारे कंधे अपनी जगह से खिसक भी सकते हैं जिसे आम भाषा में लोग कंधा उतरना कहते हैं जबकि मेडिकल की भाषा में इसे कंधे का डिसलोकेशन कहते हैं। कंधा बॉल और सॉकेट का बना एक जोड़ है। कंधे का खिसकना या डिसलोकेशन वह स्थिति है जिसमें हमारे बांह की हड्डी का उपरी हिस्सा अर्थात बॉल, साकेट या कप के बाहर आ जाता है। ज्यादातर मामलों में यह जोड़ के आगे के भाग (एंटेरियर में) होता है। कुछ गिने-चुने मामलों में, डिसलोकेशन तब होता है जब बॉल, कंधे के पिछले हिस्से में चला जाता है। बहुत ही सीमित मामले में डिसलोकेशन कंधे के निचले हिस्से में होता है। हर बार जब डिसलोकेशन होता है तब लिंगामेंट खिंचता है और कई बार फट जाता है।

किनको होती है ज्यादा संभावना

अगर आपको कम उम्र में ही यानि 20 साल की उम्र से पहले ही पहला डिसलोकेशन हो गया है तो इसके दोबारा होने की संभावना 80 प्रतिशत तक बढ़ जाती है। इसके अलावा ऐसे लोग जिन्हें अपना हाथ बार बार सर के उपर ले जाने की जरुरत होती है, उनमें इस रोग की संभावना बढ़ जाती है। जब डिसलोकेशन एक बार से अधिक बार होता है तो इसे रिकरेंट डिसलोकेशन कहा जाता है। कंधे के खिसकने की परिणति आम तौर पर बहुत कष्टदायक होती है। यह एक बड़ा आघात हो सकता है या छोटे-छोटे कई आघात हो सकते हैं। कई बार कुछ लोग अपने कंधे को अपनी इच्छा के अनुसार डिसलोकेट कर सकते हैं और उस डिसलोकेशन को अपने आप दूर करने में सक्षम होते है। ऐसे लोगों को अभ्यस्त डिसलोकेटर कहा कहा जाता है।

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कैसे होता है कंधे का डिस्लोकेशन

इस समस्या के लिए हमें कंधे के जोड़ की चोट को समझने की जरूरत होती है। कंधे में फाइब्रस कार्टिलेज (लैब्रम) का एक मोटा छल्ला होता है जो कंधे की जोड़ के सॉकेट (ग्लेनॉयड) की रिम को घेरता है। सॉकेट को मजबूती से स्थिर रखने में मदद करने वाला लैब्रम कंधे की जोड़ को स्थिर रखने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। करीब 90 प्रतिशत से अधिक मरीजों में एक बार डिसलोकेशन होने के बाद लैब्रम क्षतिग्रस्त हो जाता है। आम तौर पर यह आगे और सॉकेट के निचले हिस्से के पास से फट जाता है। यह कंधे की जोड़ की चारदीवारी की तरह से काम करता है जो सॉकेट से बॉल को बाहर निकलने से रोकता है। लिगामेंट की भीतरी क्षति को बैंकार्ट लिजन कहा जाता है। कई बार साकेट की तरफ हड्डी की क्षति होती है जिसके कारण डिसलोकेशन दोबारा हो सकता है। बार-बार डिसलोकेशन होने की समस्या का समाधान इस बात पर निर्भर करता है कि केवल लिगामेंट फटा है अर्थात बैंककार्ट लेसियन हुआ है या हड्डी को भी क्षति पहुंची है। कंधे के बार-बार होने वाले डिसलोकेशन के सभी मामलों के उपचार के लिए किसी न किसी किस्म की सर्जरी की जरूरत पड़ती है।

पहचान और लक्षण

  • मरीज अपने हाथ को हिला नहीं सकता है और हाथ का हिलाना बहुत कष्टदायक होता है।
  • रोगी का कंधा गोलाकार दिखने के बजाय अचानक चैकोर दिखने लगता है। यानि कंधे की बनावट गड़बड़ हो जाती है।
  • मरीज कंधे के सामने की त्वचा के नीचे एक गांठ या उभार दिखता है। इसका कारण बांह की हड्डी का ऊपर होना है।

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क्या है इसका इलाज

मरीज की स्थिति के अनुसार कंधे के डिसलोकेशन का इलाज किया जाता है। अगर जोड़ अपनी जगह से अभी तुरंत हटा है यानि एक्युट डिसलोकेशन हुआ है तो ये मेडिकल इमरजेंसी है और इसका तत्काल इलाज होना जरूरी है। चिकित्सकीय परीक्षण के साथ-साथ जांच की जाती है और इमरजेंसी में एक्स रे किया जाता है। मरीज को ट्रैक्सन पर रखा जाता है नींद वाली दवाई देकर कंधे के डिसलोकेशन को खींचकर अपनी जगह पर लाया जाता है । तीन सप्ताह के लिए शोल्जर इमोबलाइजर या आर्म स्लिंग में कंधे को स्थिर रखा जाता है। इसके बाद, रिहैबिलिटेशन प्रोग्राम किया जाता है।

सर्जिकल समाधान

अगर कंधे का डिस्लोकेशन बार-बार होता है तो इसे ठीक करने के लिए सर्जरी की जरूरत पड़ती है। कंघे की जोड़ को दुरूस्त करने के लिए की जाने वाली सर्जरी मरीज को बेहोश करके की जाती है। 5 मिलीमीटर के दो छोटे-छोटे चीरे लगाकर कीहोल सर्जरी की मदद से फटे हुए लिगामेंट को ठीक किया जाता है। सभी शल्य क्रियाएं एक नियंत्रित कैमरे की मदद से की जाती है। सर्जरी के बाद किसी तरह का निशान  नहीं रहता है। एंकर टांके की मदद से लिगामेंट को जोड़ा जाता है। हाल में ऐसे एंकर टांके का उपयोग किया जाने लगा है जो एक्स रे में भी नहीं दिखता है। अब गांठ रहित टांके भी उपलब्ध हो गए है जिनका उपयोग करना आसान है और इससे सर्जरी भी कम समय में हो जाती है।  मरीजों को  सर्जरी के उपरांत फिजियोथिरेपी करानी होती है और सर्जरी के तीन माह बाद मरीज खेल में वापस जाने के लिए प्रशिक्षण शुरू कर सकता है।

डॉ.राकेश कुमार, दिल्ली

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