नींद में बात करना या असामान्य व्यवहार हो सकता है पैरासोम्निया, जानें लक्षण

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Aug 13, 2018
Quick Bites

  • पैरासोम्निया नींद का एक तरह का डिसआर्डर है।
  • पैरासोम्निया में व्यक्ति नींद में बड़बड़ाता है और खुद से बात करता है।
  • पैरासोम्निया डिसआर्डर को आसानी से ठीक किया जा सकता है।

कई लोग सोने के दौरान बात करते हैं या असामान्य व्यवहार करते हैं। हममें से ज्यादातर लोग ये समझते हैं कि नींद में बड़बड़ाने की आदत किसी सपने की वजह से होती है मगर आपको बता दें कि ये दिमाग का एक तरह का डिसआर्डर है, जिसे पैरासोम्निया डिसआर्डर कहते हैं। अगर आपको भी नींद में बड़बड़ाने या बात करने की आदत है, तो घबराएं नहीं। पैरासोम्निया डिसआर्डर को आसानी से ठीक किया जा सकता है। आइए आपको बताते हैं क्या है ये डिसआर्डर और क्या हैं इसके लक्षण।

क्या है पैरासोम्निया डिसआर्डर

पैरासोम्निया नींद का एक तरह का डिसआर्डर है, जिसमें व्यक्ति नींद में बड़बड़ाता है, खुद से बात करता है या असामान्य व्यवहार करता है। आमतौर पर पैरासोम्निया डिसआर्डर को लोग बीमारी नहीं मानते हैं क्योंकि इससे कोई शारीरिक पीड़ा या समस्या नहीं होती है। मगर कई बार इस डिसआर्डर की वजह से आपको शर्मिन्दा होना पड़ता है। एक अध्ययन के मुताबिक नींद में बात करने वाले लोग 30 सेकंड से ज्यादा नहीं बोलते हैं।

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कितना सामान्य है ये डिसआर्डर

अगर आप कभी-कभार नींद में बात करते हैं तो इसके कुछ अन्य कारण हो सकते हैं जैसे- थकान, तनाव, कोई बात जो आप कह नहीं पाए या कोई चीज जो आप सोने से पहले सोच रहे थे आदि। मगर यदि आपको ये समस्या अक्सर ही होती है, तो इसका कारण पैरासोम्निया डिसआर्डर होता है। इस डिसआर्डर के दौरान व्यक्ति नींद में सोते हुए फुसफुसाता है या अपने आप से बातें करने लगता है।

बच्चों में ज्यादा होती है नींद में बात करने की समस्या

कई तरह के लोग नींद में बाते करते है। 3 से 10 साल के तकरीबन आधे से ज्यादा बच्चे नींद में अक्सर बात करते हैं। वहीं 5 फीसदी बड़े में नींद में बात करने की आदत होती है। कई बार बच्चे जो बात सोने से पहले सोच रहे होते हैं, उसी से जुड़ी बातें नींद में बड़बड़ाते हैं। ऐसा कभी-कभी होता है या हर रात भी हो सकता है। एक शोध में पता चला है कि हर 10 में से 1 बच्चा सप्ताह में कई बार नींद में बात करता है। ये समस्या लड़कियों और लड़कों में समान होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसा अनुवाशिंक भी हो सकता है।

सोने के होते हैं कई चरण

पहला चरण सोने का शुरूआती चरण होता है। इसमें नींद आने की लगभग वाली स्थिति होती है। इस स्थिति में कोई भी व्‍यक्ति 5 से 10 मिनट तक रहता है और इसके बाद वह नींद के अगले चरण में चला जाता है। दूसरे चरण में व्‍यक्ति कम से कम 20 मिनट तक रहता है। इस चरण में ब्रेन, काफी सक्रिय होता है। ब्रेन के द्वारा की जाने क्रियाओं को स्लिप स्पिंडल कहा जाता है। तीसरे चरण में व्‍यक्ति गहरी नींद में चला जाता है। इस दौरान ब्रेन ज्‍यादा कार्य नहीं करता है और आराम की स्थिति में शरीर रहता है। इस चरण में आसपास होने वाले शोर आदि का प्रभाव भी सोने वाले व्‍यक्ति पर नहीं पड़ता है। चौथा चरण आरईएम के समान ही होता है। इसमें ब्रेन सक्रिय रहता है। इसमें डेल्‍टा स्‍लीप आती है।

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स्लीप डिसआर्डर के लक्षण

सोते हुए चीखने-चिल्लाने या हाथ-पैर चलाने की आदत डिमेंशिया (निद्रारोग) अथवा पार्किंसन जैसी बीमारियों के लक्षण हो सकते हैं। इस बीमारी को ‘आरईएम स्लीप बिहैवियर डिसआर्डर’ कहा जाता है। आरईएम नींद वो नींद है जिस दौरान इंसान सपने देखता है। इस बात के कई अहम सबूत हैं कि आरईएम नींद की ताज़ा यादों को प्रोसेस करने में भूमिका होती है। ऐसे लोग नींद में चीखने-चिल्लाने अथवा हाथ-पैर चलाने की जो हरकत करते हैं वह दरअसल उनकी नींद की गतिविधियां होती हैं। आरईएम के अलावा, दवाओं का रिएक्शन, तनाव,मानसिक स्वास्थ्य समस्या से भी लोग नींद में बात करने लग जाते है।

क्या है पैरासोम्निया का इलाज

सामान्य तौर पर, कोई इलाज जरूरी है। अगर आपको आरईएम या नींद में बहुत ज्यादा बात करने की समस्या हो तो आप किसी साइकोथैरेपिस्ट से मिल सकते है। नींद में बात करने का कारण नींद विकार, दुर्बल चिंता या तनाव हो सकता है। कुछ उपायों से नींद में बात करने की संभावना को कम कर लिया जा सकता है। अगर आप किसी के साथ अपना कमरा शेयर करते है तो उसे बोलें कि वो आपकें बड़बड़ाने पर आपको जगा दें, इससे आप ठीक ढंग से सो सकेंगे।

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