मां-बाप के बीच तलाक बच्चों को कर सकता है बीमार, जानें क्रोनिक पेरेंटल डिस्कॉर्ड का बच्चों पर होने वाले असर

बच्चों को माता-पिता दोनों से प्यार और सुरक्षा की भावना की आवश्यकता होती है, चाहे वे एक साथ हों या अलग हों।

Pallavi Kumari
Written by: Pallavi KumariPublished at: Jan 14, 2020Updated at: Jan 14, 2020
मां-बाप के बीच तलाक बच्चों को कर सकता है बीमार, जानें क्रोनिक पेरेंटल डिस्कॉर्ड का बच्चों पर होने वाले असर

माता-पिता के हर एक कदम का बच्चों पर अक्सर असर पड़ता ही है। माता-पिता का खुश होना और साथ में प्यार से रहना उनके मानसिक स्वास्थ्य पर असर डालता है। इसी तरह माता-पिता के झगड़े उन्हें मानसिक रूप से कमजोर और बीमार कर सकता है। मां-बाप के बीच तलाक का भी बच्चों पर बहुत प्रभाव पड़ता है। वहीं ऐसे किसी भी कदम को उठाने से पहले माता-पिता को बच्चों के बारे में सोचना चाहिए। तलाक की प्रक्रिया को शुरू करने से पहले माता-पिता को कुछ तथ्यों की जानकारी होनी चाहिए, जो उनके बच्चों पर मानसिक रूप से प्रभावित कर सकते हैं। मनोवैज्ञानिक अनुसंधान और अध्ययनों ने निष्कर्ष निकाला है कि क्रोनिक पेरेंटल डिस्कॉर्ड बच्चों के लिए अधिक हानिकारक है, जो सौहार्दपूर्ण अलगाव की तुलना में बच्चों के लिए ज्यादा तनाव देने वाला होता है। इसे लेकर शोधकर्ताओं ने अध्ययन किया और बच्चों पर इसके असर के बारे में पता लगाया।

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क्या है क्रोनिक पेरेंटल डिस्कॉर्ड?

एक पति-पत्नी के बीच समय-समय पर बहस और लड़ाई स्वाभाविक है, पर जब ये अलग होने की स्थिति पैदा कर देती है और रिश्ते का अंत बहुत बुरी तरह से होता है, तो ये क्रोनिक पेरेंटल डिस्कॉर्ड कहलाता है। ये कुछ ऐसा है, जो ज्यादातर बच्चों को उनके जीवन में किसी न किसी बिंदु पर परेशान करता है। इस तरह के माता-पिता के झगड़े को अच्छी तरह से सुलझाए नहीं जाते या ठीक नहीं किए जाते तो ये बच्चों में मानसिक परेशानियों को जन्म देती है।

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क्रोनिक पेरेंटल डिस्कॉर्ड का बच्चों पर असर

आंकड़ों की मानें, तो अमेरिका में दो में से एक विवाह तलाक में समाप्त होता है और ब्रिटेन में हर तीसरे बच्चे को एक ही माता-पिता द्वारा पाला जाता है। इनमें से अधिकांश बच्चे मनोवैज्ञानिक रूप से बीमार महसूस करते हैं। वहीं इसके दीर्घकालिक मनोवैज्ञानिक परिणामों को प्रभावित करने वाले कारकों का अध्ययन किया गया था, जो निम्नलिखित बातों का पता चला-

  • -क्रोनिक पेरेंटल डिस्कॉर्ड का नकारात्मक परिणाम देखे जाते हैं, जहां बच्चे दूसरे माता-पिता के प्रति बुरा व्यवहार करते हैं।
  • - अगर अलगाव सौहार्दपूर्ण हो और माता-पिता द्वारा परिपक्व रूप से संभाला जाए, तो नकारात्मक प्रभावों को कम किया जा सकता है।
  • -बच्चों को माता-पिता दोनों के साथ स्पष्ट और सुसंगत रहने की व्यवस्था, सीमाओं और ज्यादा संपर्क बढ़ाने की आवश्यकता होती है।
  • -व्यवहार में, हम देखते हैं कि तलाक आमतौर पर अच्छी तरह से नियंत्रित नहीं किया जाता है और माता-पिता के बीच तलाक की शर्तों, रिश्तेदारों से हस्तक्षेप आदि के बारे में बहुत अधिक नकारात्मकता है, जहां तक संभव हो, बच्चों को इन नकारात्मक मुद्दों से दूर रखा जाना चाहिए।
  • -तलाक और इसके लिए निर्माण आमतौर पर माता-पिता के लिए एक कठिन समय होता है और उन्हें भावनात्मक रूप से संघर्ष कर रहे हैं, तो पेशेवर मदद लेने पर विचार करना चाहिए। जब तक माता-पिता मानसिक रूप से स्वस्थ स्थान पर नहीं होते हैं, तब तक तलाक की कार्यवाही और जीवन तलाक के बाद परिपक्व और समझदार तरीके से नियंत्रित नहीं होता है।
  • -बच्चों के स्ट्रेस हार्मोन कोर्टिसोल का स्तर तब बढ़ जाता है जब वे माता-पिता को बहस करते हुए देखते हैं। ध्यान से इस तर्क को देखा जाए तो, जिन दो लोगों को आप सबसे ज्यादा एक-दूसरे से प्यार करते हुए देखते थे, उन्हें इस तरह से लड़ते देखना और फिर भी रिश्ते को खत्म तकने की भावना बच्चे को पूरी तरह से असहाय बना देती है। ये बच्चों में दुख, चिंता और तनाव पैदा करती है।

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इन तमाम कारकों को ध्यान में रखते हुए, बच्चों के लिए किसी भी तलाक के परिणाम विनाशकारी हो सकते हैं। हम बच्चों को मामूली तनाव से लेकर पूर्ण अवसादग्रस्त बीमारियों तक की कठिनाइयों के साथ देखते हैं। यह बच्चों को उनके सामाजिक और शैक्षणिक कामकाज में गिरावट और व्यसनों के शिकार होने की ओर अग्रसर करता है, वहीं ये उन्हें कुछ भावनात्मक कठिनाइयां भी पैदा करती हैं, जो गंभीर और लगातार हैं बच्चे के मानसिक पटल और सोच को प्रभावित करती हैं। इसमें चिकित्सा और दवाएं बहुत सहायक हैं।दीर्घावधि में, बुरी तरह से संभाले गए तलाक से उत्पन्न नकारात्मकताएं एक वयस्क और उनके भविष्य के रिश्तों के रूप में बच्चे के व्यक्तित्व पर एक स्थायी प्रभाव डाल सकती हैं। अगर बच्चे को बुरी तरह से प्रबंधित तलाक सहना पड़ता है, तो वो जीवनभर एक अजीब परेशानी और स्ट्रेस भरा जीवन जीते हैं।

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