Thu Sep 24, 2026 | 11:47 AM IST

Medically Reviewed by Dr Anju Suryapani , Senior Consultant – Obstetrics, Gynaecology

प्रेग्नेंसी में जेस्टेशनल डायबिटीज का खतरा किन महिलाओं को ज्यादा हो सकता है? जानें डॉक्टर से

प्रेग्नेंसी के दौरान अक्सर महिलाओं को जेस्टेशनल डायबिटीज होने का खतरा ज्यादा रहता है। ऐसे में जिन महिलाओं का वजन ज्यादा है, परिवार में डायबिटीज का इतिहास है या पिछली प्रेग्नेंसी में जेस्टेशनल डायबिटीज रही है, उन्हें इसके होने का खतरा ज्यादा होता है।
प्रेग्नेंसी में जेस्टेशनल डायबिटीज का खतरा किन महिलाओं को ज्यादा हो सकता है? जानें डॉक्टर सेप्रेग्नेंसी में जेस्टेशनल डायबिटीज का खतरा किन महिलाओं को ज्यादा हो सकता है? जानें डॉक्टर से

प्रेग्नेंसी एक ऐसा दौर है, जिसमें महिला के शरीर में कई तरह के शारीरिक और हार्मोनल बदलाव होते हैं। इनमें से कुछ बदलावों के कारण महिलाओं को प्रेग्नेंसी में जेस्टेशनल डायबिटीज का सामना करना पड़ सकता है। यह एक ऐसी स्थिति है जो पहली बार प्रेग्नेंसी के दौरान सामने आती है। जेस्टेशनल डायबिटीज प्रेग्नेंसी के दौरान होने वाली एक ऐसी स्थिति है, जिसमें महिला के शरीर में ब्लड शुगर का लेवल नॉर्मल से ज्यादा हो जाता है। यह आमतौर पर प्रेग्नेंसी की दूसरी या तीसरी तिमाही में होता है। हालांकि, अक्सर महिलाओं के मन में सवाल रहता है कि किन महिलाओं को जेस्टेशनल डायबिटीज का खतरा ज्यादा रहता है? आइए इस लेख में Dr.(Prof.) Anju Suryapani, Sr. Consultant- Obstetrics & Gynaecology, Metro Hospital, Noida से जानते हैं।

प्रेग्नेंसी में जेस्टेशनल डायबिटीज का खतरा किसे ज्यादा होता है? 

साल 2018 में American Journal of Lifestyle Medicine में प्रकाशित स्टडी के अनुसार, प्रेग्नेंसी के दौरान जेस्टेशनल डायबिटीज मेलिटस (GDM) की हाई रिस्क उन महिलाओं में ज्यादा होता है, जिनके परिवार में टाइप 2 डायबिटीज का इतिहास रहा हो। इसके अलावा, प्रेग्नेंसी से पहले कम शारीरिक गतिविधि होना भी इस जोखिम को लगभग तीन गुना बढ़ा देता है। साथ ही मां की उम्र ज्यादा होना और प्रेग्नेंसी से पहले 30 kg/m² या उससे ज्यादा बॉडी मास इंडेक्स होना भी इस स्थिति के जोखिम को बढ़ा सकता है।

Dr. Anju Suryapani का कहना है कि कुछ ऐसी महिलाएं होती हैं, जिनमें जेस्टेशनल डायबिटीज होने का जोखिम अन्य महिलाओं की तुलना में काफी ज्यादा होता है। इन महिलाओं में शामिल हैं-

1. ज्यादा वजन या मोटापा

प्रेग्नेंसी की शुरुआत में अगर महिला का बॉडी मास इंडेक्स 25 या उससे ज्यादा है तो उसमें जेस्टेशनल डायबिटीज होने का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है। शरीर में ज्यादा चर्बी सेल्स को इंसुलिन रेजिस्टेंस बना देती है। इसके कारण प्लेसेंटा द्वारा बनाए जाने वाले एंटी-इंसुलिन हार्मोन्स का असर बढ़ जाता है और ब्लड शुगर का लेवल अनियंत्रित होने लगता है।

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2. पारिवारिक इतिहास

अगर किसी महिला के माता-पिता, भाई या बहन को टाइप-2 डायबिटीज है तो उस महिला में प्रेग्नेंसी के दौरान शुगर बढ़ने की जेनेटिक संभावना ज्यादा बढ़ जाती है। इसलिए, उन्हें प्रेग्नेंसी के दौरान जेस्टेशनल डायबिटीज होने का खतरा ज्यादा होता है।

3. पिछली गर्भावस्था में जेस्टेशनल डायबिटीज

अगर किसी महिला को अपनी पिछली डिलीवरी या प्रेग्नेंसी के समय जेस्टेशनल डायबिटीज था तो अगली प्रेग्नेंसी में इसके दोबारा होने की संभावना 50% से ज्यादा बढ़ जाती है।

4. PCOS या PCOD होना

जिन महिलाओं को कंसीव करने से पहले PCOS की समस्या रही हो, वे प्रेग्नेंसी के दौरान हाई-रिस्क जेस्टेशनल डायबिटीज के खतरे पर रहती हैं। PCOS से पीड़ित महिलाओं के शरीर में पहले से ही इंसुलिन रेजिस्टेंस मौजूद रहता है। प्रेग्नेंसी के हार्मोन्स इस स्थिति को और ज्यादा बढ़ा देते हैं।

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5. पहले ज्यादा वजन के शिशु को जन्म देना

अगर किसी महिला ने अपनी पिछली प्रेग्नेंसी में 4 किलोग्राम या उससे ज्यादा वजन वाले बच्चे को जन्म दिया है, तो यह इस बात का संकेत है कि पिछली प्रेग्नेंसी में उसे अनडायग्नोस्ड (बिना पहचान वाला) जेस्टेशनल डायबिटीज रहा होगा। इसलिए, दूसरी प्रेग्नेंसी में भी जेस्टेशनल डायबिटीज होने का जोखिम रहता है।

6. ज्यादा उम्र में प्रेग्नेंसी

20 साल या उससे ज्यादा उम्र में जो महिलाएं कंसीव करती हैं, उनमें कम उम्र की महिलाओं की तुलना में जेस्टेशनल डायबिटीज होने का खतरा काफी ज्यादा होता है।

7. पिछली प्रेग्नेंसी में समस्या होना

पिछली प्रेग्नेंसी में बिना किसी कारण मिसकैरेज या मरे हुए बच्चे का जन्म, पिछले बच्चे में कोई जन्मजात दोष होना, और पेट में बच्चे के आस-पास पानी की मात्रा बहुत ज्यादा होने के कारण भी महिलाओं में जेस्टेशनल डायबिटीज का जोखिम बढ़ जाता है।

8. गलत खान-पान और शारीरिक गतिविधियों की कमी

जो महिलाएं प्रेग्नेंसी के दौरान बिल्कुल भी शारीरिक गतिविधियां नहीं करती हैं और जिनकी डाइट में ज्यादा मीठा, रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट और प्रोसेस्ड फूड शामिल होता है, उनमें ब्लड शुगर अचानक बढ़ने का जोखिम ज्यादा रहता है।

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प्रेग्नेंसी में जेस्टेशनल डायबिटीज को कैसे मैनेज करें?

Dr. Anju Suryapani कहती हैं कि अगर आप में प्रेग्नेंसी के दौरान जेस्टेशनल डायबिटीज का रिस्क ज्यादा है तो घबराने की जरूरत नहीं है। सही समय पर कदम उठाकर इसे पूरी तरह कंट्रोल किया जा सकता है।

  • शुरुआती ब्लड टेस्ट- हाई-रिस्क जेस्टेशनल डायबिटीज महिलाओं को पहली तिमाही में ही अपना ब्लड शुगर और HbA1c टेस्ट करवा लेना चाहिए।
  • संतुलित आहार- प्रेग्नेंसी के दौरान डाइट में हाई-फाइबर, हरी सब्जियां, साबुत अनाज और प्रोटीन शामिल करें। रिफाइंड शुगर, मिठाई और कोल्ड ड्रिंक्स से परहेज करें।
  • एक्टिव रहें- डॉक्टर से सलाह लेकर रोजाना 20 से 30 मिनट की हल्की वॉक करें या प्रेग्नेंट महिलाओं के लिए सुरक्षित योग डॉक्टर की सलाह पर चुनें।
  • रेगुलर मॉनिटरिंग- अगर जेस्टेशनल डायबिटीज डायग्नोस होता है, तो घर पर ग्लूकोमीटर की मदद से खाली पेट और खाने के 2 घंटे बाद शुगर लेवल ट्रैक करें। साथ ही जरूरत पड़ने पर डॉक्टर इंसुलिन या दवाएं शुरू कर सकते हैं।

निष्कर्ष
प्रेग्नेंसी के दौरान कई महिलाओं को जेस्टेशनल डायबिटीज होने का जोखिम होता है, जिनमें खराब लाइफस्टाइल, फैमिली में डायबिटीज, PCOS और पिछली प्रेग्नेंसी में जेस्टेशनल डायबिटीज का इतिहास वाली महिलाएं शामिल हैं। जेस्टेशनल डायबिटीज को समय पर पहचान कर और सही लाइफस्टाइल अपनाकर मां और होने वाले शिशु दोनों को पूरी तरह हेल्दी और सुरक्षित रखा जा सकता है। प्रेग्नेंसी की शुरुआत में ही अपने गायनोलॉजिस्ट से अपनी मेडिकल हिस्ट्री शेयर करें!
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FAQ

  • प्रेग्नेंसी में नॉर्मल शुगर कितनी होनी चाहिए?

    प्रेग्नेंसी के दौरान ब्लड शुगर का सामान्य लेवल सामान्य महिलाओं की तुलना में थोड़ा कम होना चाहिए। खाली पेट 95 mg/dL से कम, खाना खाने के 1 घंटे बाद 140 mg/dL से कम और खाना खाने के 2 घंटे बाद 120 mg/dL से कम होना चाहिए।
  • प्रेग्नेंसी में ज्यादा शुगर होने से क्या होता है?

    प्रेग्नेंसी में ब्लड शुगर का लेवल बढ़ना जेस्टेशनल डायबिटीज कहलाता है। यह स्थिति मां और शिशु दोनों के स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाल सकती है।

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Disclaimer

इस जानकारी की सटीकता, समयबद्धता और वास्तविकता सुनिश्चित करने का हर सम्भव प्रयास किया गया है हालांकि इसकी नैतिक जि़म्मेदारी ओन्लीमायहेल्थ डॉट कॉम की नहीं है। हमारा आपसे विनम्र निवेदन है कि किसी भी उपाय को आजमाने से पहले अपने चिकित्सक से अवश्य संपर्क करें। हमारा उद्देश्य आपको जानकारी मुहैया कराना मात्र है।

कात्यायनी तिवारी पिछले 6 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। करियर की शुरुआत उन्होंने न्यूज चैनल से की और बाद में डिजिटल मीडिया में हेल्थ और लाइफस्टाइल विषयों पर काम करना शुरू किया। फिलहाल वह OnlyMyHealth में सब एडिटर के तौर पर कार्यरत हैं।वह महिला स्वास्थ्य, पोषण, आयुर्वेद, योग, स्किन हेल्थ और प्रेग्नेंसी जैसे विषयों पर लिखती हैं। उनका प्रयास रहता है कि ताजा रिसर्च, विशेषज्ञ डॉक्टरों की राय और प्रमाणित स्रोतों के आधार पर सही स्वास्थ्य जानकारी सरल भाषा में पाठकों तक पहुंचे। जिन लेखों में मेडिकल पुष्टि जरूरी होती है, उन्हें प्रकाशित होने से पहले डॉक्टरों द्वारा रिव्यू किया जाता है।OnlyMyHealth से पहले वह Jantantra TV और Boldsky के साथ काम कर चुकी हैं।

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    Sep 24, 2026 10:24 IST

    Published By : Katyayani Tiwari
    Reviewed By : Dr Anju Suryapani

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