आईवीएफ (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) के जरिए अब मां बनना काफी आसान हो गया है, लेकिन इसकी शुरुआत इतनी आसान नहीं थी। IVF टेक्नीक की शुरुआत इस सोच के साथ हुई कि क्या इंसान के एग्स और स्पर्म को बाहर मिलाकर भ्रूण बनाया जा सकता है और फिर उसे महिला के गर्भाशय में विकसित किया जा सकता है? वैज्ञानिकों को इस सोच का जवाब ढ़ूंढने और तकनीक का विकास में कई दशक लग गए, लेकिन जब साल 1978 में तकनीक विकसित हुई, तो रिप्रोडक्टिव मेडिसन की दिशा ही बदल दी।
IVF की शुरुआत किस सोच के साथ हुई?
दरअसल, IVF का इतिहास अचानक शुरू नहीं हुआ था। वैज्ञानिक काफी लंबे समय से यह समझने की कोशिश कर रहे थे कि महिला के एग्ज कैसे परिपक्व होते हैं और फिर एग और स्पर्म के बीच किस तरह की प्रक्रिया होती है।
1930 के दशक में वैज्ञानिकों ने जानवरों पर के अंडे के मैच्योर होने के तरीके से समझने की कोशिश की और इसके बाद इंसानी एग्ज पर रिसर्च शुरू हुई। 1940 और 1950 के दशक में कुछ वैज्ञानिकों ने महिलाओं के एग्ज और शुरुआती एम्ब्रियो से जुड़े कई प्रयोग किए। हालांकि उस समय तकनीक और वैज्ञानिक समझ इतनी विकसित नहीं थी कि इन नतीजों को पूरी तरह विश्वसनीय माना जा सके, लेकिन यहां से रिसर्च का आधार जरूर तैयार हो गया था।
सर रॉबर्ट जैफरी एडवर्ड्स ने IVF के बारे में सोचा
आईवीएफ के इतिहास में वैज्ञानिक रॉबर्ट जैफरी एडवर्ड्स का नाम सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि 1960 के दशक में उन्होंने महिलाओं के एग्ज के मैच्योर और फर्टिलाइजेशन को शरीर के बाहर समझने पर गंभीरता से काम शुरू किया। शुरुआत में उन्हें यह भी समझना पड़ा कि मानव अंडा कब परिपक्व होता है। इसके लिए उन्होंने पहले जानवरों पर प्रयोग किए और फिर मानव अंडों पर अध्ययन किया।
रॉबर्ट जैफरी एडवर्ड्स सिर्फ एग्ज और स्पर्म नहीं मिलाना चाहते थे, बल्कि उनकी असली चुनौती यह थी कि फर्टिलाइजड एग को आगे विकसित करके एम्ब्रियो बनाना और फिर उसे महिला के यूटरस में वापस डालना भी था। इसी सिलसिले में वह साल 1963 में कैम्ब्रिज पहुंचे और वहां के वैज्ञानिकों के साथ मिलकर इसे आगे बढ़ाना जारी रखा।
साल 1965 में IVF में नहीं मिली सफलता
साल 1965 तक एडवर्ड्स महिलाओं के एग्ज कैसे मैच्योर होते हैं, यह काफी हद तक समझ चुके थे, लेकिन अभी तक एग को फर्टिलाइज नहीं कर पा रहे थे। इस दौरान उन्हें अमेरिका जाकर काम करने का मौका मिला। वहां जॉर्जाना और हॉवर्ड जोन्स की मदद से उन्हें मानव एग्ज पर काम करने का अवसर मिला। इस दौरान एडवर्ड्स को यह समझ आ गया कि इंसानी एग्ज को परिपक्व होने में करीब 36 घंटे का समय लग सकता है, लेकिन फर्टिलाइजेशन अभी भी चुनौती बना हुआ था।
पैट्रिक स्टेप्टो से मुलाकात एडवर्ड्स के लिए बनी महत्वपूर्ण
जब एड्वर्ड्स की मुलाकात पैट्रिक स्टेप्टो से हुई, तो IVF तकनीक को विकसित करने में नया मोड़ आया। दरअसल, पैट्रिक लैप्रोस्कोपी के क्षेत्र में काम कर रहे थे और इस तकनीक की मदद से महिला के अंडाशय से अंडे निकालने की संभावना को बेहतर तरीके से समझा जा सकता था। साल 1968 में एडवर्ड्स और स्टेप्टो ने साथ काम करना शुरू किया।
इस समय तक उनके पास IVF की दो महत्वपूर्ण कड़ियां थीं, जिसमें एडवर्ड्स लैब में एग को मैच्योर, फर्टिलाइजेशन और एम्ब्रियो को विकसित करने पर काम कर रहे थे। इसमें स्टेप्टो लैप्रोस्कोपी की मदद से महिला के अंडाशय से अंडे निकालने की तकनीक विकसित कर रहे थे।
साल 1969 में पहली बड़ी सफलता
साल 1969 में एडवर्ड्स, बैरी बाविस्टर और स्टेप्टो ने इंसानी एग्ज के फर्टिलाइजेशन से जुड़े महत्वपूर्ण जर्नल को प्रकाशित किया। इस समय तक वैज्ञानिकों को भरोसा होने लगा था कि इंसानी एग को बाहर फर्टिलाइज किया जा सकता है, लेकिन फर्टिलाइजेशन के बाद अगली चुनौती भ्रूण का विकास था। साल 1970 तक लैब में इंसानी भ्रूण को ब्लास्टोसिस्ट स्टेज तक विकसित किया जा चुका था।

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एम्ब्रियो को वापस गर्भाश्य में ट्रांसप्लांट करने की चुनौती
एडवर्ड्स के सामने अब सवाल था कि लैब में तैयार भ्रूण को महिला के गर्भाशय में ट्रांसफर करने के बाद क्या महिला प्रेग्नेंट हो पाएगी? साल 1971 से एडवर्ड्स और स्टेप्टो ने एम्ब्रियो ट्रांसफर पर काम शुरू किया, लेकिन सफलता ही नहीं मिल रही थी।
उन्होंने कुछ एम्ब्रियो महिलाओं में ट्रांसप्लांट किए, लेकिन वे लंबे समय तक टिक नहीं पाए और मिसकैरेज हो गया। साल 1975 में एक प्रेग्नेंसी हुई, लेकिन वह गर्भाश्य में होने के बजाय फैलोपियन ट्यूब में इंप्लांट हो गी। इससे उन्हें समझने में मदद मिली कि सिर्फ एम्ब्रियो बनाना ही काफी नहीं है, बल्कि उसके ट्रांसफर का सही समय भी बहुत महत्वपूर्ण है।
महिला के पीरियड्स को समझकर ही मिली सफलता
लगातार असफलताओं के बाद एडवर्ड्स की टीम ने एक बड़ा बदलाव किया। उन्होंने ओवरी को स्टिमुलेट करने के बजाय महिलाओं के पीरियड्स के नेचुरल प्रोसेस को समझने की कोशिश की। इसमें उन्होंने जाना कि उन्हें उस एग को इस्तेमाल करना है, जो प्राकृतिक रूप से उस साइकिल में मैच्योर होता है। इससे ओव्यूलेशन के सही समय का अंदाजा लगाने में मदद मिली।
पहले टेस्ट ट्यूब बेबी का जन्म
लेस्ली और जॉन ब्राउन करीब नौ साल से बच्चा पैदा करने की कोशिश कर रहे थे और नवंबर 1977 में लेस्ली ब्राउन का एग नेचुरल साइकिल के दौरान लैप्रोस्कोपिक तरीके से निकाला गया। फिर एग को लैब में स्पर्म के साथ फर्टिलाइज करके कुछ समय बाद एम्ब्रियो को लेस्ली के यूटरस में ट्रांसफर कर दिया। उस समय वैज्ञानिकों को यह नहीं पता था कि यह इतिहास बदलने वाला है और 25 जुलाई 1978 को आया मेडिकल इतिहास का सबसे बड़ा मोड़, जब रात 11:47 बजे लुईस जॉय ब्राउन का जन्म हुआ।
वह दुनिया की पहली बच्ची थीं, जिनका जन्म IVF के जरिए हुआ था। इस खबर ने दुनिया भर में सुर्खियां बटोरी थ और इनफर्टिलिटी के इलाज में नई राह खोल दी।
दिलचस्प बात यह है कि लुईस ब्राउन के IVF में सिर्फ एक ही एग लिया गया था, जो उनकी मां के नेचुरल साइकिल से निकाला गया था।
भारत में पहला टेस्ट ट्यूब बेबी
NCBI में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, ब्रिटेन में पहले टेस्ट ट्यूब बेबी के सिर्फ 67 दिन बाद भारत का पहला टेस्ट ट्यूब बेबी कोलकता में हुआ। इसके पीछे डॉ. सुभाष मुखोपाध्याय थे, लेकिन उन्हें वह सम्मान नहीं मिला, जिसके वह हकदार थे। पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा गठित एक जांच समिति बनाई गई, जिसमें कोई भी IVF विशेषज्ञ नहीं था। उन्होंने डॉ. मुखोपाध्याय की रिसर्च को फर्जी करार देकर खारिज कर दिया। उन्हें अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में जाने से रोका गया और बार-बार अपमानजनक तबादले किए गए और शोध करने से रोक दिया गया। मेंटल स्ट्रेस, अपमान और बदनामी से दुखी होकर उन्होंने 18 जून 1981 को आत्महत्या कर ली।
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IVF को लेकर हुआ विरोध
IVF की शुरुआत में लोगों के बीच इस बात को लेकर भी बहस हुई कि लैब में एम्ब्रियो बनाने की प्रक्रिया उचित नहीं है। IVF को लेकर कई तरह के मिथक थे, इसलिए ब्रिटेन में IVF को लेकर कई सामाजिक और नैतिक सवाल भी उठाए गए और इस वजह से आगे चलकर वारनॉक रिपोर्ट बनी और एम्ब्रियो रिसर्च को लेकर एक रेगुलेटरी फ्रेमवर्क भी तैयार किया गया।
IVF तकनीक में आए कई बदलाव
साल 1978 का IVF आज की तकनीक से काफी अलग था। शुरुआती IVF में नेचुरल साइकिल का इस्तेमाल किया जाता था और सिर्फ एक ही एग पर निर्भर रहना पड़ता था, जबकि अब एक से ज्यादा एग्ज लिए जाते हैं ताकि प्रेग्नेंसी की संभावना को बेहतर किया जा सके। अब IVF में एम्ब्रियो की जेनेटिक जांच भी की जा सकती है और प्रेग्नेंसी की संभावना भी काफी बढ़ गई है।
निष्कर्ष
लुईस ब्राउन के जन्म के बाद IVF तेजी से दूसरे देशों में पहुंचा। 1981 में अमेरिका में पहला IVF बेबी पैदा हुआ। आज IVF की वजह से लाखों कपल्स बच्चे की उम्मीद कर सकते हैं। वैज्ञानिकों की लगातार खोज और असफलता के बावजूद डटे रहने के हौसलों की वजह से आज IVF मॉडर्न रिप्रोडक्टिव मेडिसन का सबसे महत्वपूर्ण चैप्टर है।
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Aug 10, 2026 19:04 IST
Modified By : Aneesh Rawat Aug 10, 2026 19:04 IST
Modified By : Aneesh RawatAug 10, 2026 19:04 IST
Published By : Aneesh Rawat