आजकल महिलाओं में हार्मोनल समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं, जिनमें पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (PCOS) एक आम समस्या बन चुकी है। अनियमित पीरियड्स, वजन बढ़ना और हार्मोनल असंतुलन इसके प्रमुख लक्षण हैं लेकिन कई लोग यह नहीं जानते कि पीसीओएस सिर्फ पीरियड्स की समस्या तक सीमित नहीं है बल्कि यह आगे चलकर गंभीर बीमारियों का कारण भी बन सकता है। ऐसे में अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या पीसीओएस से एंडोमेट्रियल कैंसर का खतरा बढ़ जाता है? इसी विषय पर सही जानकारी के लिए हमने यशोदा हॉस्पिटल्स, हैदराबाद की कंसल्टेंट ऑब्स्टेट्रिशियन और गायनेकोलॉजिस्ट, डॉ. एम. वी. ज्योत्सना से बात की।
क्या पीसीओएस एंडोमेट्रियल कैंसर का खतरा बढ़ाता है?
डॉ. एम. वी. ज्योत्सना के अनुसार, पीसीओएस एक एंडोक्राइन और मेटाबॉलिक डिसऑर्डर है, जो शरीर में हार्मोनल असंतुलन के कारण कई गंभीर समस्याएं पैदा करता है। सामान्य स्थिति में हर महीने ओव्यूलेशन के बाद शरीर में प्रोजेस्टेरॉन हार्मोन बनता है, जो गर्भाशय की परत (एंडोमेट्रियम) को संतुलित रखता है लेकिन पीसीओएस में ओव्यूलेशन नियमित नहीं होता, जिससे प्रोजेस्टेरॉन की कमी हो जाती है। इसके विपरीत, शरीर में एस्ट्रोजन का प्रभाव लगातार बना रहता है। यह लगातार एस्ट्रोजन का प्रभाव गर्भाशय की परत को जरूरत से ज्यादा मोटा (thick) कर देता है, जिससे कोशिकाओं की असामान्य बढ़ोतरी शुरू हो सकती है। यही प्रक्रिया आगे चलकर एंडोमेट्रियल हाइपरप्लासिया यानी यूट्रस की आंतरिक परत का असामान्य रूप से बहुत मोटा होना और फिर कैंसर का कारण बन सकती है। इसलिए अनियमित पीरियड्स को कभी भी सामान्य मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
इंसुलिन रेजिस्टेंस और कैंसर का बढ़ता खतरा
पीसीओएस में इंसुलिन रेजिस्टेंस एक आम समस्या है। इसका मतलब है कि शरीर इंसुलिन का सही तरीके से उपयोग नहीं कर पाता, जिससे ब्लड शुगर और इंसुलिन का लेवल बढ़ जाता है। इंसुलिन का बढ़ा हुआ लेवल (hyperinsulinemia) ओवरी को ज्यादा एंड्रोजन (male hormones) बनाने के लिए प्रेरित करता है। इससे हार्मोनल असंतुलन और बढ़ जाता है और ज्यादा इंसुलिन शरीर में कोशिकाओं की ग्रोथ को बढ़ावा देता है, जिससे कैंसर का खतरा भी बढ़ सकता है।
इसे भी पढ़ें: PCOS का इलाज कैसे किया जाता है? जानें डॉक्टर से
Spandidos Publication के Oncology Letters के साल 2023 में प्रकाशित मेटा एनालिसिस के अनुसार, पॉलीसिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम (PCOS) से पीड़ित महिलाओं में एंडोमेट्रियल कैंसर होने का खतरा काफी ज्यादा होता है। इस रिसर्च के अनुसार, PCOS वाली महिलाओं में इस कैंसर की संभावना सामान्य महिलाओं की तुलना में लगभग 4 से 5 गुना ज्यादा पाई गई है। विशेष रूप से 54 वर्ष से कम उम्र की महिलाओं में यह जोखिम और भी ज्यादा देखा गया है। इसका मुख्य कारण शरीर में हार्मोनल असंतुलन और समय पर ओव्यूलेशन न होना माना जाता है।
मोटापा और एस्ट्रोजन का कनेक्शन
डॉ. एम. वी. ज्योत्सना बताती हैं, ‘’पीसीओएस में मोटापा एक आम समस्या है, खासकर पेट के आसपास फैट। फैट टिशू शरीर में एंड्रोजेन को एस्ट्रोजन में बदलने का काम करता है, इसका मतलब है कि जितना ज्यादा फैट होगा, उतना ज्यादा एस्ट्रोजन बनेगा। यह अतिरिक्त एस्ट्रोजन फिर से ''unopposed estrogen'' की स्थिति को बढ़ाता है, जिससे एंडोमेट्रियम की मोटाई और बढ़ जाती है। इसके अलावा, मोटापा शरीर में क्रॉनिक इंफ्लेमेशन को भी बढ़ाता है, जो कैंसर के विकास में एक कारक है।’’
Journal of Clinical Oncology में साल 2016 में प्रकाशित स्पेशल सीरीज रिव्यू के अनुसार, एंडोमेट्रियल कैंसर (गर्भाशय का कैंसर) और मोटापे के बीच गहरा संबंध है। इस स्टडी का मुख्य निष्कर्ष यह है कि आधे से ज्यादा एंडोमेट्रियल कैंसर के मामले बढ़ते वजन और मोटापे के कारण होते हैं। शरीर में एक्स्ट्रा फैट हार्मोन के संतुलन को बिगाड़ देता है, जिससे एस्ट्रोजन और इंसुलिन का लेवल बढ़ जाता है, जो कैंसर कोशिकाओं के विकास को बढ़ावा देते हैं। हेल्दी लाइफस्टाइल, जैसे सही डाइट और नियमित एक्सरसाइज, इस कैंसर के जोखिम को काफी हद तक कम कर सकते हैं।
इसे भी पढ़ें: PCOS का खतरा किन महिलाओं को ज्यादा होता है? डॉक्टर से जानें

बचाव कैसे करें?
डॉ. एम. वी. ज्योत्सना के अनुसार, पीसीओएस में एंडोमेट्रियल कैंसर से बचाव संभव है, बशर्ते समय पर सही कदम उठाए जाएं।
1. हार्मोनल संतुलन बनाए रखें
कंबाइंड ओरल कॉन्ट्रासेप्टिव्स और साइक्लिक प्रोजेस्टेरॉन थेरेपी एंडोमेट्रियम को नियमित रूप से शेड होने में मदद करती हैं, जिससे एस्ट्रोजन का असर संतुलित रहता है। PCOS में अक्सर ओव्यूलेशन नहीं होता, इसलिए शरीर में प्रोजेस्टेरॉन कम बनता है और एस्ट्रोजन लगातार परत को मोटा करता रहता है, जिससे हाइपरप्लासिया और कैंसर का खतरा बढ़ सकता है। प्रोजेस्टेरॉन इस प्रभाव को संतुलित करता है, सेल्स की अनियंत्रित बढ़ोतरी को रोकता है और नियमित पीरियड्स के जरिए एक्स्ट्रा परत को बाहर निकालने में मदद करता है, जिससे यूट्रस हेल्दी रहता है। यह जानकारी केवल जागरूकता के लिए है, किसी भी हार्मोनल दवा का उपयोग डॉक्टर की सलाह के बिना न करें, क्योंकि हर महिला की स्थिति अलग होती है और गलत उपयोग से साइड इफेक्ट हो सकते हैं।
2. ओव्यूलेशन को नियमित करें
डॉक्टर की सलाह से ओव्यूलेशन-इंड्यूसिंग दवाएं ली जा सकती हैं, जिससे पीरियड्स नियमित होते हैं और गर्भाशय की परत समय पर निकलती रहती है।
इसे भी पढ़ें: PCOS में BMI कितना होना चाहिए?
3. डाइट और एक्सरसाइज
लो-ग्लाइसेमिक इंडेक्स डाइट, नियमित फिजिकल एक्टिविटी और स्ट्रेस मैनेजमेंट बहुत जरूरी हैं, क्योंकि यह शरीर को इंसुलिन का सही उपयोग करने में मदद करती है।
4. समय-समय पर जांच कराएं
PCOS में कई बार लक्षण धीरे-धीरे बढ़ते हैं और शुरुआत में ज्यादा गंभीर नहीं लगते लेकिन अगर समय पर ध्यान न दिया जाए, तो यह आगे चलकर बड़ी समस्या बन सकते हैं। इसलिए नियमित रूप से डॉक्टर से जांच कराना बहुत जरूरी है। इसके अलावा अगर आपके पीरियड्स लंबे समय तक नहीं आते, बहुत ज्यादा या बहुत कम ब्लीडिंग होती है, या अनियमित पीरियड्स हैं, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ये संकेत हो सकते हैं कि यूट्रस की लाइनिंग सही तरीके से नहीं निकल रही है। समय पर जांच कराने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि किसी भी समस्या का जल्दी पता चल जाता है। अगर एंडोमेट्रियल परत ज्यादा मोटी हो रही है, तो उसे शुरुआती स्टेज में ही कंट्रोल किया जा सकता है, जिससे कैंसर का खतरा काफी हद तक कम हो जाता है।
5. डायबिटीज और इंसुलिन को कंट्रोल करें
PCOS में इंसुलिन रेजिस्टेंस एक बहुत आम समस्या है, जिसमें शरीर इंसुलिन हार्मोन का सही तरीके से उपयोग नहीं कर पाता। इससे ब्लड शुगर लेवल बढ़ने लगता है और आगे चलकर डायबिटीज का खतरा भी बढ़ सकता है। यह स्थिति हार्मोनल असंतुलन को और खराब कर सकती है। जब इंसुलिन लेवल ज्यादा होता है, तो यह शरीर में एंड्रोजन को बढ़ाता है, जिससे ओव्यूलेशन प्रभावित होता है और पीरियड्स अनियमित हो जाते हैं। इसके कारण यूट्रस की लाइनिंग समय पर नहीं निकलती और लंबे समय तक बनी रहती है, जिससे एंडोमेट्रियल कैंसर का खतरा बढ़ सकता है। इंसुलिन को कंट्रोल में रखने के लिए सबसे जरूरी है सही खानपान और हेल्दी लाइफस्टाइल। लो-ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाले फूड्स जैसे दलिया, ओट्स, ब्राउन राइस, दालें और हरी सब्जियां खाना फायदेमंद होता है और प्रोसेस्ड फूड से बचना चाहिए।
PCOS में स्क्रीनिंग कितने समय के अंतराल पर करानी चाहिए?
अगर किसी महिला को PCOS है, तो उसे अपनी स्थिति के अनुसार नियमित फॉलो-अप कराना जरूरी होता है। आमतौर पर हर 6-12 महीने में गायनेकोलॉजिस्ट से जांच करानी चाहिए, लेकिन अगर पीरियड्स बहुत अनियमित हैं या 2-3 महीने से ज्यादा समय तक नहीं आते, तो जल्दी डॉक्टर से मिलना चाहिए। जिन महिलाओं में मोटापा, डायबिटीज है, उनमें एंडोमेट्रियल समस्याओं का खतरा ज्यादा होता है, इसलिए उन्हें और भी नियमित मॉनिटरिंग की जरूरत होती है। सही समय पर स्क्रीनिंग से किसी भी बदलाव को शुरुआती स्टेज में ही पकड़ा जा सकता है और समय रहते इलाज शुरू किया जा सकता है।
एंडोमेट्रियल कैंसर की स्क्रीनिंग कैसे होती है?
एंडोमेट्रियल कैंसर की स्क्रीनिंग मुख्य रूप से लक्षणों और टेस्ट पर आधारित होती है। सबसे पहले डॉक्टर मरीज की हिस्ट्री लेते हैं, जैसे अनियमित पीरियड्स, ज्यादा ब्लीडिंग या लंबे समय तक पीरियड्स का न आना। इसके बाद ट्रांसवेजाइनल अल्ट्रासोनोग्राफी की जाती है, जिससे एंडोमेट्रियम की मोटाई मापी जाती है। अगर यह सामान्य से ज्यादा मोटी पाई जाती है या कोई असामान्यता दिखती है, तो आगे एंडोमेट्रियल बायोप्सी की जाती है, जिसमें परत का छोटा सा सैंपल लेकर जांच की जाती है। इन जांचों के जरिए डॉक्टर यह पता लगाते हैं कि कोई प्रीकैंसरस बदलाव या कैंसर तो नहीं है, ताकि समय पर सही इलाज किया जा सके।
डॉक्टर से कब मिलें?
अगर किसी महिला को लंबे समय तक पीरियड्स नहीं आते या बहुत अनियमित हैं, तो उसे नियमित रूप से डॉक्टर से जांच करानी चाहिए। ट्रांसवेजाइनल अल्ट्रासोनोग्राफी एक जरूरी टेस्ट है, जिससे एंडोमेट्रियल थिकनेस (गर्भाशय की परत की मोटाई) का पता लगाया जाता है। सामान्य रूप से प्रीमेनोपॉजल महिलाओं में एंडोमेट्रियम की मोटाई मासिक चक्र (Menstrual Cycle) के अनुसार बदलती है, लेकिन आमतौर पर 4-12 मिमी के बीच सामान्य माना जाता है। अगर पीरियड्स लंबे समय से नहीं आए हैं और मोटाई 12-15 मिमी या उससे ज्यादा पाई जाती है, तो यह सावधानी का संकेत हो सकता है। ऐसी स्थिति में डॉक्टर आगे की जांच जैसे एंडोमेट्रियल बायोप्सी की सलाह दे सकते हैं, ताकि किसी भी असामान्यता का समय रहते पता लगाया जा सके और सही इलाज शुरू किया जा सके।

निष्कर्ष
पीसीओएस केवल एक सामान्य हार्मोनल समस्या नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी स्थिति है जो लंबे समय में गंभीर बीमारियों का कारण बन सकती है, जिनमें एंडोमेट्रियल कैंसर भी शामिल है। अनियमित पीरियड्स, इंसुलिन रेजिस्टेंस और मोटापा, ये सभी मिलकर इस खतरे को बढ़ाते हैं। हालांकि, अच्छी बात यह है कि सही समय पर पहचान, लाइफस्टाइल में बदलाव और मेडिकल ट्रीटमेंट के जरिए इस जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है। महिलाओं को अपने शरीर के संकेतों को समझना और अनियमित पीरियड्स को नजरअंदाज न करना बेहद जरूरी है। नियमित जांच और डॉक्टर की सलाह से न केवल पीसीओएस को कंट्रोल किया जा सकता है, बल्कि फ्यूचर में होने वाले गंभीर जोखिमों से भी बचा जा सकता है।
FAQ
पीसीओएस से कौन सा कैंसर होता है?
पीसीओएस सीधे कैंसर नहीं बनाता, लेकिन इससे एंडोमेट्रियल कैंसर का खतरा बढ़ सकता है। कारण यह है कि हार्मोन असंतुलन के कारण गर्भाशय की परत (Uterine lining) मोटी होती रहती है और समय पर झड़ती नहीं। सही इलाज, नियमित जांच और लाइफस्टाइल में सुधार से इस खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।एंडोमेट्रियल कैंसर के क्या लक्षण हैं?
एंडोमेट्रियल कैंसर (Endometrial Cancer) के प्रमुख लक्षणों में असामान्य ब्लीडिंग, मेनोपॉज के बाद ब्लीडिंग, पेल्विक दर्द और वजन कम होना शामिल हैं। कुछ महिलाओं में थकान या कमजोरी भी महसूस हो सकती है। शुरुआत में लक्षण हल्के हो सकते हैं, इसलिए इन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।पीसीओएस किस उम्र में होता है?
PCOS आमतौर पर टीनएज या 15-25 साल की उम्र में शुरू होता है, जब हार्मोनल बदलाव शरीर में तेज होते हैं। हालांकि, यह किसी भी फर्टिलिटी एज की महिला में हो सकता है।क्या हर PCOS मरीज को अल्ट्रासाउंड कराना जरूरी है?
हर किसी को बार-बार नहीं, लेकिन डॉक्टर की सलाह के अनुसार समय-समय पर अल्ट्रासाउंड कराना फायदेमंद होता है।क्या PCOS में प्रेग्नेंसी संभव है?
सही इलाज और डॉक्टर की निगरानी में PCOS वाली महिलाएं प्रेग्नेंट हो सकती हैं।
इस जानकारी की सटीकता, समयबद्धता और वास्तविकता सुनिश्चित करने का हर सम्भव प्रयास किया गया है हालांकि इसकी नैतिक जि़म्मेदारी ओन्लीमायहेल्थ डॉट कॉम की नहीं है। हमारा आपसे विनम्र निवेदन है कि किसी भी उपाय को आजमाने से पहले अपने चिकित्सक से अवश्य संपर्क करें। हमारा उद्देश्य आपको जानकारी मुहैया कराना मात्र है।
How we keep this article up to date:
We work with experts and keep a close eye on the latest in health and wellness. Whenever there is a new research or helpful information, we update our articles with accurate and useful advice.
-
Current Version
Apr 07, 2026 17:25 IST
Modified By : Akanksha Tiwari Apr 07, 2026 17:25 IST
Modified By : Akanksha TiwariApr 07, 2026 17:25 IST
Published By : Akanksha Tiwari
Reviewed By : Dr M V Jyothsna