खानपान संबंधी आपकी कुछ आदतें एनोरेक्सिया और बुलिमिया नर्वोसा रोग के हैं संकेत, जानें कारण और उपचार

खानपान की गलत आदतें न केवल शरीर को नुकसान पहुंचाती हैं बल्कि कई बार ये गंभीर मनोवैज्ञानिक समस्या का रूप धारण कर लेती हैं, जिन्हें ईटिंग डिसॉर्डर कहा जाता है। क्यों होता है ऐसा, जानने के लिए पढ़ें यह लेख। 

Atul Modi
Written by: Atul ModiPublished at: Oct 04, 2018Updated at: Oct 04, 2018
खानपान संबंधी आपकी कुछ आदतें एनोरेक्सिया और बुलिमिया नर्वोसा रोग के हैं संकेत, जानें कारण और उपचार

मनपसंद खाने का नाम सुनते ही मुंह में पानी आना या टेस्टी डिशेज़ देखकर भूख बढ़ जाना तो स्वाभाविक है लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिनका उनकी फूड हैबिट पर कोई नियंत्रण नहीं होता। ऐसे लोग जब मऱ्जी होती है, कुछ भी बेहिसाब खा लेते हैं या फिर खाते ही नहीं। अगर आपके साथ भी ऐसी समस्या हो तो इसे नज़रअंदाज़ न करें क्योंकि यह ईटिंग डिसॉर्डर का लक्षण हो सकता है। वैसे तो यह समस्या किसी भी उम्र में हो सकती है लेकिन टीनएजर्स में इसकी आशंका बढ़ जाती है क्योंकि यही वह समय होता है, जब आप अपने फिजिकल अपियरेंस को लेकर ज़्यादा कॉन्शस रहते हैं।

हालांकि किसी व्यक्ति के खानपान की आदतों, शारीरिक संरचना और हाव-भाव देखकर यह पता नहीं लगाया जा सकता कि उसे ईटिंग डिसॉर्डर की समस्या है या नहीं? ईटिंग डिसॉर्डर के मुख्यत: 3 रूप नज़र आते हैं-एनोरेक्सिया नर्वोसा, बुलिमया और बिंज ईटिंग, जो व्यक्ति के शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य पर बहुत बुरा असर डालते हैं।  

 

एनोरेक्सिया नर्वोसा

एनोरेक्सिया से ग्रस्त लोग अपने वज़न को लेकर अत्यधिक चिंतित रहते हैं। अंडरवेट होते हुए भी उनके दिमाग में वज़न घटाने का फितूर सवार रहता है जिसके कारण वे खाने की मात्रा लगातार कम करते जाते हैं। इसके अलावा अपनी शारीरिक बनावट को लेकर भी वे इतने चिंतित रहते हैं कि भूख लगने के बावज़ूद खाने से बचने की कोशिश करते हैं। अपनी डाइट में प्रोटीन की मात्रा बहुत कम कर देते हैं और कैलरी बर्न करने के लिए आवश्यकता से अधिक एक्सरसाइज़ करते हैं। इस तरीके से उनका वज़न तेज़ी से घटने लगता है लेकिन यह स्थिति सेहत के लिए बहुत नुकसानदेह होती है। वैसे तो यह समस्या किसी को भी हो सकती है, पर ज्य़ादातर टीनएजर लड़कियां इसकी शिकार होती हैं। कई बार वज़न घटाने की यह जि़द उनके लिए जानलेवा भी साबित हो जाती है। 

क्या है नुकसान :

बहुत कम खाने से शरीर में कैल्शियम, फैट, कार्ब, प्रोटीन और विटमिंस जैसे पोषक तत्वों की कमी हो जाती है। बीएमआई के मापदंड के अनुसार वज़न बहुत कम हो जाता है। इसकी वजह से एनीमिया, इम्यून सिस्टम से जुड़ी कमज़ोरी, कब्ज़, सिरदर्द, अनिद्रा, डिप्रेशन के अलावा लड़कियों में अनियमित पीरियड्स जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं। कई बार इस समस्या से पीडि़त मरीज़ इतने कुपोषित हो जाते हैं कि इसकी वजह से उनकी जान तक चली जाती है।  

बुलिमिया नर्वोसा       

यह भी ईटिंग डिसॉर्डर से जुड़ी गंभीर मनोवैज्ञानिक समस्या है। इससे ग्रस्त लोग फूड क्रेविंग की वजह से अपनी मनपसंद डिशेज़ जी भरकर खा लेते हैं, उसके बाद जानबूझकर वोमिटिंग करते हैं। ऐसा करने के पीछे उनकी यही मंशा होती हैं कि मनपसंद भोजन का स्वाद लेने के बाद वोमिटिंग करने से वज़न नहीं बढ़ेगा। एनोरेक्सिया की तरह बुलिमिया के मरीज़ों को भी हमेशा वजऩ बढऩे का डर सताता रहता है और इसी डर की वजह से वे कैलरीज़ घटाने के लिए ऐसे नुकसानदेह तरीके अपनाने लगते हैं। 

क्या है नुकसान :

बार-बार जबरन वोमिटिंग करने की वजह से गले में खराश, डीहाइड्रेशन, थकान, सोडियम, कैल्शियम, पोटैशियम और मिनरल्स जैसे पोषक तत्वों की कमी हो सकती हैं।  

बिंज ईटिंग

इस समस्या से ग्रस्त लोगों को भोजन से बहुत  लगाव होता है। इनके लिए अपनी फूड क्रेविंग को रोकना मुश्किल हो जाता है। एनोरेक्सिया और बुलिमिया के मरीज़ों के विपरीत इन्हें अपने बढ़ते वज़न की ज़रा भी परवाह नहीं होती और ऐसे लोग बेफिक्र होकर ओवर ईटिंग करते हैं। इन्हें मंचिंग की आदत होती है और ये बिना सोचे-समझे हमेशा कुछ न कुछ खाते रहते हैं। घर में बार-बार फ्रिज खोलना और दोस्तों की प्लेट से कुछ भी उठाकर खा लेना इनकी आदत होती है। ऐसे लोगों की डाइट में पिज्ज़ा, बर्गर, चॉकलेट, पेस्ट्री और सॉफ्ट ड्रिंक्स की मात्रा बहुत अधिक होती है। अपनी इस आदत की वजह से इन्हें बहुत शर्मिंदगी भी महसूस होती है, इसलिए कई बार ये छिप-छिप कर अकेले में खाने की भी कोशिश करते हैं।    

क्या है नुकसान : 

बिना-सोचे समझे लगातार खाते रहने की आदत के कारण ऐसे लोग जल्द ही ओबेसिटी यानी मोटापे के शिकार हो जाते हैं। इसके अलावा कोलेस्ट्रॉल और शुगर लेवल बढऩा, जोड़ों में दर्द, हार्ट की ऑर्टरी में ब्लॉकेज जैसी समस्याएं भी परेशान कर सकती हैं। ऐसे लोगों में इतनी ज़बर्दस्त फूड क्रेविंग होती है कि अगर खाने के लिए इन्हें इनकी मनपसंद चीज़ें न मिलें तो इन्हें डिप्रेशन भी हो सकता है।  

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क्यों होता है ऐसा

आमतौर पर तनाव, अकेलापन, उदासी, भावनात्मक कमज़ोरी और आत्मविश्वास की कमी जैसी वजहों से व्यक्ति में ईटिंग डिसॉर्डर के लक्षण पनपने लगते हैं। दरअसल ऐसी समस्याओं की तरफ से अपना ध्यान हटाने के लिए लोग स्वादिष्ट भोजन का सहारा लेते हैं। आनुवंशिकता भी इसकी प्रमुख वजह है। अगर माता-पिता को ऐसी समस्या है तो बच्चों में इसके लक्षण नज़र आते हैं। शरीर में कुछ $खास तरह के एंज़ाइम्स के असंतुलन की वजह से भी व्यक्ति को ईटिंग डिसॉर्डर से जुड़ी ऐसी समस्याएं हो सकती हैं।

क्या है उपचार

ईटिंग डिसॉर्डर एक मनोवैज्ञानिक समस्या है। इसलिए इसका उपचार भी काउंसलिंग के ज़रिये ही होता है। एनोरेक्सिया के मरीज़ों को विभिन्न प्रकार की साइकोथेरेपी दी जाती है, जिसमें मरीज़ के दिमाग से मोटे होने का भ्रम निकाला जाता है। बेहतर परिणाम के लिए कुछ दवाओं के ज़रिये भी ईटिंग डिसऑर्डर का उपचार किया जाता है। इसके अलावा न्यूट्रिशनिस्ट द्वारा काउंसलिंग भी ज़रूरी है और डाइट चार्ट के अनुसार खानपान अपनाने की सलाह दी जाती है।

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इन बातों का रखें ध्यान

  • खाने का निश्चित समय निर्धारित करें और क्रैश डाइटिंग से बचें।
  • अगर आपको अपनी फूड हैबिट में कुछ भी असामान्य लगे तो एक्सपर्ट की सलाह अवश्य लें।
  • अपनी यह धारणा बदलने की कोशिश करें कि हर हाल में स्लिम-ट्रिम रहना बहुत ज़रूरी है और मोटे लोग अनाकर्षक होते हैं।
  • अपने बढ़ते वज़न के लिए दूसरों के नेगेटिव कमेंट्स पर ज़रा भी ध्यान न दें।
  • इस बात के प्रति सजग रहें कि बीएमआई के अनुसार आपका वज़न कितना होना चाहिए, अगर उससे एक-दो किलो अधिक वज़न हो तो चिंतित न हों।
  • बार-बार वज़न चेक न करें।
  • इन बातों का ध्यान रखेंगे तो ईटिंग डिसॉर्डर की समस्या से बचाव आसान हो जाएगा।
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