जानें क्या है हेलिकॉप्टर पेरेंटिंग और क्या हैं इसके नुकसान

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Aug 24, 2018
Quick Bites

  • पेरेंट्स का ओवर प्रोटेक्टिव होना हेलिकॉप्टर पेरेंटिंग कहलाता है।
  • समय के साथ परवरिश के तौर-तरीकों में भी बदलाव आना स्वाभाविक है।
  • पेरेंट्स अपने बच्चे की जिंदगी का हर फैसला लेने का जिम्मा खुद ले लेते हैं।

यह शब्द अक्सर हाई स्कूल या कॉलेज आयु वर्ग के छात्रों के माता-पिता के लिए इस्तेमाल होता है। इसमें पेरेंट्स एक हेलिकॉप्टर की तरह लगातार बच्चे के आसपास घूमते रहते हैं। या यूं कह सकते हैं पेरेंट्स का ओवर प्रोटेक्टिव होना हेलिकॉप्टर पेरेंटिंग कहलाता है। उनके इस व्यवहार के चलते बच्चा कोई फैसला लेने में, सही गलत में समझ रखने में या फिर अकेले कहीं जाने से घबराने लगता है। ऐसे पेरेंट्स अपने बच्चे की जिंदगी का हर फैसला लेने का जिम्मा खुद ले लेते हैं। फिर चाहे वह कपड़े हों, खाना हों, बच्चे के दोस्तों और गतिविधियों का चयन करना हो आदि। इस चीज का बच्चे की मानसिक क्षमता पर बहुत बुरा असर पढ़ता है। बच्चे पर बहुत किया जा सके, या होमवर्क और स्कूल परियोजनाओं के लिए असमान सहायता प्रदान की जा सके।

क्यों सही नहीं है हेलिकॉप्टर पेरेंटिंग

जब पेरेंट्स बिना सोचे समझे अपने बच्चों से हर वक्त क्यूं, क्या जैसा सवाल पूछते हैं तो बच्चा चिड़चिड़ा होने के साथ ही झूठ बोलने को भी मजबूर हो जाता है। जबकि पेरेंट्स को लगता है कि ऐसा करने से वह अपने बच्चों की गलत हरकतें सुधार रहे हैं। सात-आठ साल की उम्र में जब बच्चा थोड़ा समझदार होने लगता है और वह देखता है कि उसके पेरेंट्स हर चीज के लिए उसे मना करते हैं या फिर उसके साथ जाते हैं तो वह खुद को अंदर से खोखला समझने लगता है। उसकी निर्णय लेने की क्षमता घट जाती है। बच्चों को ऐसा लगता है कि अपने पेरेंट्स के बिना वह कुछ सही है। जिसके चलते बच्चा बड़ा तो हो जाता है लेकिन अपने वास्तव में अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो पाता है। इसलिए जरूरी है कि पेरेंट्स को अपने इस बर्ताव को सुधारना चाहिए।

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वक्त रहते सुधार जाएं पेरेंट्स

समय के साथ परवरिश के तौर-तरीकों में भी बदलाव आना स्वाभाविक है। बाल मनोवैज्ञानिकाों का कहना है कि ज्यादा रोक-टोक करने से बच्चा मानसिक स्तर पर बहुत कमजोर हो जाता है।  ऐसे में डॉक्टर्स कहते हैं कि पेरेंट्स को अपने बच्चों के आगे पीछे घूमने के बजाय उनके साथ फ्रेंक रहना चाहिए। ताकि वह उन पर नजर भी रख सके और बच्चे का विकास भी हो सके। इस संदर्भ में चाइल्ड काउंसलर गीतिका कपूर कहती हैं, 'जहां डांट-फटकार की वजह से बच्चों का सेल्फ एस्टीम कमज़ोर हो जाता है। वहीं थोड़ी सी तारीफ सुनकर वे दोगुने उत्साह के साथ अपने काम में जुट जाते हैं। पेरेंटिंग का यह तरीका ज्यादा कारगर साबित होता है। इसकी मदद से बच्चों को बहुत आसानी से अच्छी आदतें सिखाई जा सकती हैं।

क्या हैं हेलिकॉप्टर पेरेंटिंग के नुकसान

  • हेलिकॉप्टर पेरेंटिंग बच्चे के व्यक्तित्व के विकास में सीधे तौर पर बाधा डालता है। क्योकि हर बच्चे का सवभाव एक जैसा नहीं होता है और हो सकता है आपकी जरुरत से अधिक उसकी केयर करना उसके व्यक्तित्व को कमजोर बना दें।
  • हेलिकॉप्टर पेरेंट्स वह होते हैं जो हर समय बच्चे के साथ साथ जाते है। फिर चाहे वह स्कूल हो, ट्यूशन हो, दोस्तों के साथ हो या फिर कोई पर्सनल जगह हो। समय के साथ साथ बच्चे आपकी इस आदत के साथ असहज महसूस करने लगता है। जिसके चलते वह कभी झूठ बोलता है तो कभी धोखा देता है।
  • हेलिकॉप्टर पेरेंटिंग के चलते बच्चों का आत्मविश्वास कम होता है और वह खुद की काबिलियत पर शक करने लगते हैं। वह अगर कोई काम अकेला करते हैं तो उन्हें हमेशा यह डर रहता है कि वह पेरेंट्स की उम्मीदों पर खरा उतर पाएंगे या नहीं।
  • अगर बच्चे को आपके जरुरत से ज्यादा चिंता करने की आदत से परेशानी हो रही है और उसे कुछ समय दीजिये उसे कुछ एकांत रहने दें। इससे बच्चा स्थिति से उभर पाएगा।
  • बच्चे को अपनी गलतियों से सबक लेने दें और उन्हें चीज़े सीखने और नयी चीज़े करने के लिए प्रेरित करें और उन्हें हार को सकारात्मक और जीत को सकारात्मक लेना सिखाएं।

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