अपने साथ कई बीमारियों को साथ लाती है थायराइड, अस्थमा जैसी ये 5 बीमारियां

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Apr 06, 2018
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Quick Bites

  • सांस की नलियों में सूजन आने से वे संकरी हो जाती हैं। 
  • एनीमिया यानी रक्ताल्पता की समस्या ज्य़ादातर स्त्रियों में देखने को मिलती है।
  • इंसुलिन एक ऐसा हॉर्मोन है, जो रक्त में शर्करा की मात्रा को नियंत्रित रखता है।

अक्सर लोग मुख्य बीमारी के साथ पैदा होने वाली स्वास्थ्य समस्याओं को नजरअंदाज कर देते हैं, जो आगे चलकर दोगुनी मुसीबत का सबब बन जाती है। सेहत की हिफाजत के लिए ऐसी शैडो डिजीज के बारे में जानना बहुत जरूरी है। पुरानी कहावत है कि कोई भी मुसीबत अकेले नहीं आती। बीमारियों का भी यही हाल है। एक स्वास्थ्य समस्या के आते ही शरीर में कई दूसरी बीमारियों के भी लक्षण दिखाई देने लगते हैं। ऐसी बीमारियों को शैडो डिजीज कहा जाता है। आइए जानते हैं, कुछ ऐसी ही स्वास्थ्य समस्याओं के बारे में।

एनीमिया

एनीमिया यानी रक्ताल्पता की समस्या ज्य़ादातर स्त्रियों में देखने को मिलती है। शरीर में फोलिक एसिड, आयरन और विटमिन बी-12 की कमी से लोगों को यह समस्या होती है। दरअसल लाल रक्त कणिकाओं में हीमोग्लोबिन नामक तत्व पाया जाता है, जो शरीर की सभी कोशिकाओं तक ऑक्सीजन पहुंचाने का काम करता है। एनीमिया होने पर रक्त में हीमोग्लोबिन की मात्रा कम हो जाती है। इससे व्यक्ति को हमेशा कमजोरी, थकान और सिरदर्द जैसी समस्याएं होती हैं।

बचाव : हरी पत्तेदार सब्जियों, खजृूर, गुड, चना, मूंगफली, अनार, चुकंदर और रेड मीट में पर्याप्त मात्रा में आयरन पाया जाता है। यदि इन चीजों को अपने खानपान में प्रमुखता से शामिल किया जाए तो यह समस्या आसानी से दूर हो सकती है।

माइग्रेन

अगर किसी व्यक्ति को लंबे समय तक एनीमिया की समस्या हो तो इसकी वजह से उसे माइग्रेन भी हो सकता है। यह तंत्रिका-तंत्र से जुडी बीमारी है। इसमें न्यूरोट्रांस्मीटर्स का संचरण प्रभावित होता है। ऐसी स्थिति में खुशी और आराम का एहसास दिलाने वाले हॉर्मोन सिरोटोनिन की कमी हो जाती है। इससे उसके सिर में बहुत तेज दर्द होता है। कुछ लोगों में किसी खास तरह की गंध, तेज रोशनी या आवाज से माइग्रेन का दर्द बढ जाता है। एनीमिया में हीमोग्लोबिन की कमी की वजह से शरीर के बाकी हिस्सों की तरह मस्तिष्क की कोशिकाओं को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाता। इसी वजह से एनीमिया के साथ लोगों में माइग्रेन की आशंका बढ जाती है।

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बचाव : माइग्रेन का कोई स्थायी उपचार नहीं है, पर दवाओं से इसकी तीव्रता को कम जरूर किया जा सकता है। सही समय पर सोना-जगना, नियमित एक्सरसाइज और खानपान की स्वस्थ आदतें अपना कर इस समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

उच्च रक्तचाप

ऐसी स्थिति में हृदय की धमनियां सिकुड जाती हैं। इससे शरीर के सभी हिस्सों में रक्त का सही प्रवाह बनाए रखने के लिए दिल को बहुत ज्य़ादा मेहनत करनी पडती है। इससे व्यक्ति में घबराहट, बेचैनी, चक्कर आना, आंखों के आगे अंधेरा छाना और बेहोशी जैसे लक्षण दिखाई देते हैं।

बचाव : शारीरिक और मानसिक तनाव इसका सबसे बडा कारण है क्योंकि इसकी वजह से हृदय की रक्तवाहिका नलिकाएं सिकुड कर रक्त-प्रवाह के दौरान हृदय पर ज्य़ादा दबाव डालती हैं। इसलिए हमेशा तनावमुक्त और खुश रहने की कोशिश करें। खाने में नमक, घी-तेल, मिर्च-मसाले, चीनी और मैदे से बनी चीजों का सेवन सीमित मात्रा में करना चाहिए। अपने भोजन में ताजा सब्जियों और फलों की मात्रा बढा दें। सादा और संतुलित खानपान अपनाएं। उच्च रक्तचाप होने पर डायबिटीज की नियमित जांच कराते रहें। स्वस्थ व सक्रिय जीवनशैली अपनाएं।

डायबिटीज

इंसुलिन एक ऐसा हॉर्मोन है, जो रक्त में शर्करा की मात्रा को नियंत्रित रखता है, लेकिन कई बार पैंक्रियाज पर्याप्त मात्रा में इंसुलिन नहीं बना पाता या व्यक्ति का शरीर उपलब्ध इंसुलिन का प्रभावकारी तरीके से उपयोग नहीं कर पाता। इससे रक्त में शर्करा का स्तर बढ जाता है और इसी समस्या को डायबिटीज कहा जाता है। हाइ ब्लडप्रेशर के साथ इस समस्या को इसलिए जोडकर देखा जाता है क्योंकि खानपान की गलत आदतें हाइ ब्लडप्रेशर और डायबिटीज दोनों के लिए जिम्मेदार हैं। जो लोग हाइ ब्लडप्रेशर के मरीज होते हैं, उनमें डायबिटीज की आशंका बढ जाती है। इतना ही नहीं डायबिटीज के मरीजों में आंखों की रोशनी घटने (रेटिनोपैथी) और यूरिन इन्फेक्शन का भी खतरा रहता है। इसके अलावा त्वचा के कटने-छिलने पर जख्म ठीक होने में काफी वक्त लगता है।

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बचाव : चावल, आलू, चीनी, कोल्ड ड्रिंक्स, जंक फूड, केला, आम, लीची और खजूर जैसी चीजों से दूर रहें क्योंकि इनमें शुगर, स्टार्च और कैलरी की मात्रा ज्य़ादा होती है, जिससे व्यक्ति के शरीर में शुगर लेवल बढ जाता है। नियमित एक्सरसाइज और मॉर्निंग वॉक करें। हमेशा सक्रिय रहने की कोशिश करें। अगर कोई समस्या न हो तो भी 40 वर्ष की उम्र के बाद साल में एक बार शुगर की जांच जरूर कराएं। अगर इस बीमारी की फेमिली हिस्ट्री रही हो तो शुरुआत से ही संयमित खानपान और जीवनशैली अपनाएं।

थायरॉयड की समस्या

आमतौर पर दो प्रकार की थायरॉयड संबंधी समस्याएं देखने को मिलती हैं। पहली स्थिति को हाइपोथायरॉयडिज्म कहा जाता है। इसमें थायरॉयड ग्लैंड धीमी गति से काम करने लगता है। इससे शरीर के लिए आवश्यक हॉर्मोन टी-3, टी-4 निर्माण नहीं हो पाता और टीएसएचएच (थायरॉयड स्टिम्युलेटिंग हॉर्मोन) का स्तर बढ जाता है। दूसरी ओर हाइपरथायरॉयडिज्म की स्थिति में टी-3 और टी-4 हॉर्मोन अधिक मात्रा में निकलकर रक्त में घुलनशील हो जाता है और टीएसएच स्तर कम हो जाता है। ये दोनों ही स्थितियां सेहत के लिए नुकसानदेह होती हैं क्योंकि इनकी वजह से शरीर में हॉर्मोन संबंधी असंतुलन पैदा हो जाता है। शरीर के मेटाबॉलिज्म की प्रक्रिया को नियंत्रित करने में इस हॉर्मोन का बहुत बडा योगदान है। वैसे तो यह समस्या किसी को भी हो सकती है, पर पुरुषों की तुलना में स्त्रियों को ज्य़ादा परेशान करती है। इसमें तेजी से वजन बढऩा या घटना, अनावयश्क थकान, पीरियड्स में अनियमितता, थकान एवं चिडचिडापन, चेहरे पर सूजन, तेजी से दिल धडकना जैसे लक्षण देखने को मिलते हैं।

बचाव : अगर कोई समस्या न हो फिर भी साल में एक बार थायरॉयड की जांच जरूर करवाएं। डॉक्टर की सलाह पर नियमित रूप से दवा का सेवन करें। इससे शरीर में इस हॉर्मोन का स्तर संतुलित रहता है। गर्भावस्था के दौरान इसकी गडबडी की वजह से मिसकैरेज या शिशु में जन्मजात मानसिक दुर्बलता जैसी समस्याओं की आशंका बनी रहती है। इसलिए कंसीव करने से पहले थायरॉयड की जांच जरूर करवानी चाहिए। शैडो डिजीज : हाइ कोलेस्ट्रॉल

थायरॉयड ग्लैंड से निकलने वाले टी-3 और टी-4 हॉर्मोन शरीर की सभी कोशिकाओं को सही ढंग से काम करने के योग्य बनाते हैं। इन हॉर्मोंस के असंतुलन की वजह से शरीर में बैड कोलेस्ट्रॉल एलडीएल की मात्रा बढ जाती है, जो शरीर के लिए कई तरीके से नुकसानदेह होती है। इसकी अधिक मात्रा की वजह से हृदय रोग भी हो सकता है।

अस्थमा

सांस की नलियों में सूजन आने से वे संकरी हो जाती हैं। इससे सांस लेने में तकलीफ होती है, ऐसी स्थिति को एस्थमा कहा जाता है। धूल और धुएं की वजह से वातावरण में फैलने वाला प्रदूषण, बदलते मौसम में फूलों के पोलन (पराग कणों) से होने वाली एलर्जी और ठंड की वजह से यह समस्या बढ जाती है। इसके अलावा आनुवंशिकता भी इसका प्रमुख कारण है।

बचाव : जहां तक संभव हो धूल, धुआं, तेज गंध आदि से दूर रहने की कोशिश करें। डॉक्टर की सलाह से नियमित दवाओं के सेवन और उसके सभी निर्देशों का पालन करें। यात्रा के दौरान दवाएं और इन्हेलर हमेशा अपने साथ रखें।

डिप्रेशन

महानगरों में डिप्रेशन की समस्या काफी तेजी से बढ रही है। भाग-दौड व तनाव के कारण मस्तिष्क को पूरा आराम नहीं मिल पाता और उस पर हमेशा दबाव बना रहता है। लगातार तनाव की स्थिति डिप्रेशन में बदल जाती है। कई अध्ययनों में यह तथ्य सामने आया कि एस्थमा और डिप्रेशन के बीच गहरा संबंध है। सांस लेने में कठिनाई से उत्तेजना बढती है और इस समस्या से निबटने के लिए शरीर में एड्रेनलिन और कोर्टिसोल हॉर्मोन का स्तर बढ जाता है, जो आगे चलकर डिप्रेशन के लिए जिम्मेदार होता है।

बचाव : नियमित एक्सरसाइज और योगाभ्यास करें। जहां तक संभव हो अकेलेपन से बचने की कोशिश करें। आसपास के लोगों से मेल-जोल बढाएं। अपनी रुचि से जुडे कार्यों के लिए समय निकालें। हमेशा सक्रिय और प्रसन्न रहें।

विनीता

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