भारत में 5 करोड़ से ज्यादा लोग थैलेसीमिया के रोगी, जानें इसके लक्षण और इलाज

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Nov 28, 2018
Quick Bites

  • इस रोग में शरीर की हीमोग्लोबिन निर्माण की प्रक्रिया में गड़बड़ी हो जाती है।
  • इसमें विटामिन या आयरन युक्त खुराक न लेने के निर्देश दिए जा सकते हैं।
  • लेंटीवायरस कोशिका में बीटा-ग्लेबिन जीन शामिल करने में सक्षम होता है। 

देश में पांच करोड़ से ज्यादा लोग थैलेसीमिया से पीड़ित हैं और प्रत्येक वर्ष 10 से 12 हजार बच्चे थैलेसीमिया के साथ जन्म लेते हैं हालांकि इन भयावह आंकड़ों के बावजूद इस गंभीर बीमारी को लेकर लोगों के बीच जागरूकता की कमी है। लेकिन जीन थेरेपी इस रोग के लिए कारगर साबित हो सकती है। इस रोग में शरीर की हीमोग्लोबिन निर्माण की प्रक्रिया में गड़बड़ी हो जाती है जिसके चलते रक्तक्षीणता के लक्षण पैदा हो जाते हैं। बीटा चेंस के कम या बिल्कुल न बनने के कारण हीमोग्लोबिन गड़बड़ाता है। जिस कारण स्वस्थ हीमोग्लोबिन जिसमें 2 एल्फा और 2 बीटा चेंस होते हैं, में केवल एल्फा चेंस रह जाते हैं जिसके कारण लाल रक्त कणिकाओं की औसत आयु 120 दिन से घटकर लगभग 10 से 25 दिन ही रह जाती है। इससे प्रभावित व्यक्ति अनीमिया से ग्रस्त हो जाता है। इसमें रोगी के शरीर में खून की कमी होने लगती है जिससे उसे बार-बार खून चढ़ाने की जरूरत पड़ती है।

मरीजों की जीवन गुणवत्ता में सुधार लाने और थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चों के जन्म को रोकने के लिए नेशनल थैलेसीमिया वेलफेयर सोसाइटी द्वारा डिपार्टमेन्टपीडिएट्रिक्स ने एलएचएमसी के सहयोग से राष्ट्रीय राजधानी में दो दिवसीय जागरूकता सम्मेलन किया, जिसमें 200 प्रख्यात डॉक्टरों, वैज्ञानिकों और 800 मरीजों/अभिभावकों ने हिस्सा लिया। ल्युकाइल पैकर्ड चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल के हीमेटो-ओंकोलोजिस्ट डॉ. संदीप सोनी ने जीन थेरेपी के बारे में बताया कि जीन थेरेपी कोशिकाओं में जेनेटिक मटेरियल को कुछ इस तरह शामिल करती है कि असामान्य जीन की प्रतिपूर्ति हो सके और कोशिका में जरूरी प्रोटीन बन सके। उस कोशिका में सीधे एक जीन डाल दिया जाता है, जो काम नहीं करती है। एक कैरियर या वेक्टर इन जीन्स की डिलीवरी के लिए आनुवंशिक रूप से इंजीनियर्ड किया जाता है। वायरस में इस तरह बदलाव किए जाते हैं कि वे बीमारी का कारण न बन सकें।

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लेंटीवायरस में इस्तेमाल होने वाला वायरस कोशिका में बीटा-ग्लेबिन जीन शामिल करने में सक्षम होता है। यह वायरस कोशिका में डीएनए को इन्जेक्ट कर देता है। जीन शेष डीएनए के साथ जुड़कर कोशिका के क्रोमोजोम/ गुणसूत्र का हिस्सा बन जाता है। जब ऐसा बोन मैरो स्टेम सेल में होता है तो स्वस्थ बीटा ग्लोबिन जीन आने वाली पीढ़ियों में स्थानान्तरित होने लगता है। इस स्टेम सेल के परिणामस्वरूप शरीर में सामान्य हीमोग्लोबिन बनने लगता है।

थैलेसीमिया के लक्षण

थैलेसीमिया के लक्षणों में निम्नलिखित शामिल हो सकते हैं- थकान, कमजोरी, त्वचा का पीला रंग (पीलिया), चेहरे की हड्डी की विकृति, धीमी गति से विकास, पेट की सूजन, गहरा व गाढ़ा मूत्र आदि।

थैलेसीमिया का इलाज

थैलेसीमिया का इलाज रोग की गंभीरता पर निर्भर करता है। इसलिए डॉक्टर रोग के हिसाब से इलाज का निर्धारण करता है। सामान्य तौर पर उपचार में निम्न प्रक्रियाएं शामिल हो सकती हैं:- रक्ताधान, अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण, दवाएं और सप्लीमेंट्स, संभव प्लीहा और/या पित्ताशय की थैली को हटाने के लिए सर्जरी, साथ ही आपको विटामिन या आयरन युक्त खुराक न लेने के निर्देश दिए जा सकते हैं, खासतौर पर रक्ताधान होने पर।

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