बदलते मौसम गर्भवती ऐसे रखें अपना और अपने शिशु का ख्याल

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Apr 09, 2018
Quick Bites

  • प्रेग्नेंसी में कई सावधानियां रखने की भी जरूरत होती है।
  • महिलाओं के कमजोर इम्यून सिस्टम की बहुत शिकायत रहती है।
  • शिशु के जन्म के पहले से ही उन्हें ठंड से बचकर रहना चाहिए।

गर्भावस्था यानि कि प्रेग्नेंसी हर महिला के जीवन का सबसे सुंदर और यादगार दौर होता है। इस दौरान महिलाएं ऐसे क्षणों को जीती हैं जिनसे वे अब तक अंजान थीं। प्रेग्नेंसी के दौरान महिलाएं कई खट्टे-मीठे अनुभवों व उतार-चढ़ावों से गुजरती है। इस दौरान कई सावधानियां रखने की भी जरूरत होती है। जिस तरह आजकल ठंडी हवाओं, हल्की बारिश और तूफान का मौसम चल रहा है ऐसे में गर्भवती को खुद के साथ साथ अपने शिशु की भी विशेष देखभाल करने की जरूरत पड़ती है। आज हम आपको कुछ टिप्स बता रहे हैं जिनसे आप इस बदलते मौसम में अपने शिशु की सही तरह से देखभाल कर सकती हैं।

कमजोर इम्यून सिस्टम

इस दौर में महिलाओं के कमजोर इम्यून सिस्टम की बहुत शिकायत रहती है। ऐसे में शिशु के जन्म के पहले से ही उन्हें ठंड से बचकर रहना चाहिए। जब तक बहुत जरूरी न हो शाम को खुली  हवा में बाहर न जाएं। सुबह-शाम अपने पूरे शरीर को ऊनी कपडों से अच्छी तरह ढंक कर रखें। पैरों को ठंड से बचाने के लिए मोजे जरूर पहनें। अगर पहले से ही खांसी-जुकाम जैसी कोई समस्या नहीं होगी तो डिलिवरी के बाद सेहत में तेजी से सुधार होगा। अस्पताल जाने से पहले अपना बैग तैयार करते समय उसमें अपने लिए स्कार्फ सहित पर्याप्त मात्रा में ऊनी कपडे रखना न भूलें।

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शिशु के कमरे का तापमान

जन्म के बाद शुरुआती दो-चार दिनों तक शिशु की देखभाल की पूरी जिम्मेदारी अस्पताल की होती है, इसलिए परिवार के सदस्यों को अतिरिक्त रूप से कुछ करने की जरूरत नहीं होती। जन्म के बाद शिशु का शरीर गीला होता है। उसे साफ गीले कपड़े से अच्छी तरह पोंछने के बाद रेडिएंट वार्मर में रखा जाता है क्योंकि मां के गर्भ के बाहर का तापमान उसके लिए काफी ठंडा होता है। इसके बाद शिशु को नर्म क्विल्ट में अच्छी तरह लपेट दिया जाता है। सर्दी के मौसम में जन्म लेने वाले बच्चों को पहले दिन नहलाना नहीं चाहिए, इससे उसे कोल्ड इंजरी (ठंड की वजह से शरीर के नीला पडने जैसी समस्याएं) हो सकती हैं। शिशु के लिए कमरे का आदर्श तापमान 28 डिग्री सेल्शियस माना जाता है। उसके कमरे के तापमान को संतुलित रखने के लिए रूम हीटर या ब्लोअर का इस्तेमाल किया जा सकता है।

सप्ताह में 1 बार जरूर नहलाएं

नवजात शिशु को एक सप्ताह तक नहलाने के बजाय सिर्फ गीले कपडे से पोंछना चाहिए क्योंकि उसकी नाभि में इन्फेक्शन होने डर रहता है। उसके अंब्लिकल कॉर्ड को स्प्रिट से पोंछ कर साफ करना चाहिए। एक सप्ताह बाद जब अंब्लिकल कॉर्ड  सूख कर गिर जाए, उसके बाद ही शिशु को नहलाना चाहिए। गुनगुने पानी से नहलाने के बाद बिना देर किए उसे अच्छी तरह पोंछ कर कपडे पहनाएं। इस बात का ध्यान रखें शिशु के कपडे धूप में अच्छी तरह सूखाने के बाद प्रेस किए गए हों क्योंकि प्रेस करने के बाद कपडों में मौजूद ज‌र्म्स  नष्ट हो जाते हैं। शिशु को गर्म कपडों से पूरी तरह ढंक कर रखें।

खुद पर भी दें ध्यान

अक्सर यह देखा गया है कि डिलिवरी के बाद स्त्रियां अपने बच्चे का तो पूरा खयाल  रखती हैं, पर वे अपने लिए समय नहीं निकाल पातीं। ऐसा करना उचित नहीं है क्योंकि शिशु की सही देखभाल के लिए मां का स्वस्थ होना भी बहुत जरूरी है। खुद  को ठंड से बचाकर रखने की कोशिश करें। ऐसी धारणा बिलकुल गलत है कि डिलिवरी के बाद नहाने से सर्दी-जुकाम हो जाता है। स्वच्छता और अच्छी सेहत के लिए प्रतिदिन गुनगुने पानी से स्नान जरूर करें। मालिश से मांसपेशियों में रक्त-संचार बढता है। इसलिए प्रतिदिन हाथ-पैरों की मालिश जरूर करवाएं, अगर आपकी नॉर्मल डिलिवरी नहीं है तो अपनी डॉक्टर से सलाह के बाद ही अपनी मालिश शुरू करवाएं।

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डाइट होनी चाहिए हेल्दी

बादाम, मुनक्का और अखरोट जैसे मेवों का सेवन स्त्री की रोग-प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाता है। केला, सेब और अमरूद जैसे फलों का सेवन भी सेहत के लिए फायदेमंद होता है, लेकिन अगर आपका गला खट्टे फलों या दही के प्रति संवेदनशील है तो ऐसी चीजों का सेवन न करें। इससे खांसी या गले में इन्फेक्शन जैसी समस्याएं हो सकती हैं। प्रतिदिन पालक, टमाटर या मिली-जुली हरी सब्जियों के सूप का सेवन भोजन के प्रति रुचि बढाने के साथ शरीर को स्फूर्ति भी देता है। पुराने समय में लैक्टेशन पीरियड के दौरान मां को बहुत सारी चीजें खाने से रोका जाता था, पर इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। अगर इन बातों का ध्यान रखा जाए तो हर मौसम में मां और शिशु स्वस्थ रह सकते हैं।

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