कितना खतरनाक बीमारी है मिर्गी? एक्सपर्ट से जानें मिर्गी का इलाज और दौरा पड़ने पर क्या करें-क्या न करें?

मिर्गी के झटके कोई दैवी प्रकोप नहीं बल्कि न्यूरोसाइंस से जुड़ी समस्या है। डॉ. सुमित सिंह से जानें मिर्गी का इलाज और दौरा पड़ने पर जरूरी सावधानियां।

Anurag Anubhav
Written by: Anurag AnubhavPublished at: Aug 21, 2020
कितना खतरनाक बीमारी है मिर्गी? एक्सपर्ट से जानें मिर्गी का इलाज और दौरा पड़ने पर क्या करें-क्या न करें?

एपिलेप्सी एक ऐसी बीमारी है, जिसके लक्षण आम लोगों के लिए डरावने हो सकते हैं। इसीलिए कई बार अंजाने में लोग इसे दैवी प्रकोप या दुष्टात्मा के शरीर में प्रवेश से जोड़कर देखते हैं। एपिलेप्सी का दौरा पड़ने पर व्यक्ति का शरीर ऐंठने लगता है, उसका शरीर झटके मारने लगता है, शरीर में असामान्य मरोड़ आने लगता है, व्यक्ति का व्यवहार बदल जाता है, कई बार वो एकटक एक ही चीज को देखने लगता है और कई अन्य लक्षण उभरते हैं। लेकिन ये समस्याएं किसी चमत्कार के कारण नहीं, बल्कि मस्तिष्क की कोशिकाओं के अत्यधिक या असामान्य रूप से सक्रिय हो जाने के कारण होती हैं, इन्हें न्यूरॉन्स कहा जाता है। क्या है एपिलेप्सी या मिर्गी की बीमारी, इसकी जांच और इलाज के बारे में जानें एग्रीम इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरो साइंस, आर्टेमिस हॉस्पिटल के न्यूरोसाइंसेस के डायरेक्टर डॉ. सुमित सिंह से

डॉ. सुमित के अनुसार, हर जब्ती या दौरा मिर्गी नहीं होता है। मिर्गी वे परिस्थिति है जिसमें कोई स्पष्ट उत्तेजक कारक के बिना दो या दो से अधिक जब्ती की समस्या हो। हजार में से लगभग 4 से 5 लोग इस रोग से पीड़ित होते हैं। बच्चों में मिर्गी की समस्या अनुवांशिक रूप से पाई जाती है। साथ ही यह जन्म के समय या जीवन में पूर्व समय के आसपास मस्तिष्क किसी प्रकार की क्षति पंहुचने के कारण भी हो सकती है। मस्तिष्क में संक्रमण भी मिर्गी का कारण बन सकता है। यह मस्तिष्क के असामान्य संरचना, सिर पर आघात या ब्रेन ट्यूमर के कारण भी हो सकता है। शरीर के विभिन्न हार्मोन्स के कुछ दोष भी मिर्गी को जन्म दे सकती है। मिर्गी से ग्रस्त कुछ बच्चों के त्वचा पर भूरे या सफेद धब्बे, चेहरे या छल्ले की रंजकता पर लाल धब्बे नजर आने लगते है।

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कैसे होती है एपिलेप्सी की जांच?

ऐसे मामलों में, बाल चिकित्सक या न्यूरोलॉजिस्ट से परामर्श करना चाहिए। आमतौर पर कई मामलों में मिर्गी का कारण चिकित्सक द्वारा एक विस्तृत परीक्षण से पता चलता है। टेस्ट की आवश्यकता प्रत्येक मामले के आधार पर तय की जाती है। बीमारी का पता लगाने के लिए इलैक्ट्रोएनसेफलोग्रफी (ईईजी) और मस्तिष्क की स्कैनिंग, सीटी हेड सामान्य रूप से किया जाता है। एमआरआई मस्तिष्क मिर्गी से ग्रस्त चयनित बच्चों में किया जाता है। हर दौरे के बाद इन टेस्ट्स की जरूरत नहीं पड़ती है।

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मिर्गी या एपिलेप्सी का इलाज कैसे होता है?

मिर्गी या एपिलेप्सी का उपचार इसके कारणों पर निर्भर करता है। कुछ मामले जैसे सीएनएस संक्रमण, इनफेस्टेशन, ट्यूमर और कुछ मेटाबोलिक कारणों में इलाज उपलब्ध होता है। बहुत सारे अन्य मामलों में जब्ती को नियंत्रित करने के लिए दवाएं दी जाती हैं, लेकिन बीमारी का इलाज नहीं कर सकते हैं। यह बहुत महत्वपूर्ण है कि चिकित्सक द्वारा निर्धारित उपचार का पालन बताए अनुसार ही किया जाए, वरना फिर से जब्ती दोबारा हो सकती है।
दवा का एक समय तय कर लें और संभव हो सके तो इसे नियमित रूप से लेने का प्रयास करना चाहिए। लेकिन अगर आप एक खुराक लेना भूल जाएं, तो उस स्थिति में जितनी जल्दी हो सके खुराक फिर से ले लें या अगर अगले खुराक का समय आ गया हो तो भूली हुई दवा और जो खानी है दोनों साथ में ली जा सकती है।अगर एक खुराक से अधिक दवा लेने मे चूक हुई है तो अपने डॉक्टर से परामर्श करें।

क्या मिर्गी की दवा के साइड इफेक्ट्स भी हो सकते हैं?

हर दवा का कुछ ना कुछ साइड-इफेक्ट होता ही है, लेकिन ये सभी में नहीं दिखते हैं। वे इस पर निर्भर करता है कि कैसी दवा ली जा रही है, लेकिन इसका सबसे आम प्रभाव नींद अधिक आना और आलस है जो समय के साथ बेहतर हो जाता है। बच्चे की त्वचा में लाल चकत्ते, अल्सर, पीलिया, बदली मानसिक स्थिति, व्यवहार में गड़बड़ी, संज्ञानात्मक गिरावट, असंतुलन या उल्टी जैसी स्थिति में अपने चिकित्सक से आपको तुरंत परामर्श करना चाहिए।जब्ती की पुनरावृत्ति आमतौर पर प्रथम 6 महीनों में दवाएं बंद करने के बाद हो सकती है।

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बच्चों को एपिलेप्सी (मिर्गी) होने पर क्या करें

मिर्गी के दौरे को रोकने के लिए मेरी सलाह है कि बच्चे को सख्ती से चिकित्सक द्वारा निर्धारित दवाओं का पालन करना चाहिए। सही समय पर सही मात्रा में सही दवा लेना महत्वपूर्ण है। नियमित रूप से जांच करने की आवश्यकता है और बेहतर होगा कि हर विजिट में डॉक्टर को अपनी दवाओं को दिखाएं।
कुछ सामान्य गलतियां करने से बचें। कुछ मिरगी की समस्या इन कारणों के वजह से बिगड़ सकती हैंः-गर्म पानी के स्नान, नींद के अभाव से, वीडियो गेम खेलने से, टीवी देखने, उपवास या संगीत सुनने आदि। इन बातों से बच्चों को परहेज किया जाना चाहिए। मिर्गी ग्रस्त बच्चों को अच्छी नींद लेनी चाहिए। कभी कभी मिरगी की स्थितियां दवाएं लेने के बावजूद भी अनियंत्रित हो जाती है। ऐसे में व्यक्ति को दवा और खुराक उपयुक्त है या नहीं जाँच करने के लिए बाल चिकित्सा न्यूरोलॉजिस्ट से परामर्श करने की जरूरत है। जब्ती की मुश्किलों को नियंत्रित करने के लिए बच्चों के इलाज के लिए मिर्गी की सर्जरी एक और विकल्प है। इस काम के लिए एक तरह का ट्रांसप्लांट डिवाइस भी कभी-कभी इस्तेमाल किया जाता है।

क्या मिर्गी ग्रस्त बच्चों को स्कूल में डालना चाहिए?

एक आम सवाल अक्सर पूछा जाता है कि क्या मिर्गी से ग्रस्त बच्चों को स्कूल में शामिल किया जा सकता है? यह मूल कारण पर निर्भर करता है, अधिकांश मिर्गी से ग्रस्त बच्चे अच्छी तरह से स्कूल जा सकते हैं। माता-पिता को यह नहीं सोचना चाहिए कि इन बच्चों के लिए पढ़ाई तनाव या बोझ हो जाएगा। स्कूल के शिक्षकों और कर्मचारियों को पूरी तरह से बच्चे की स्थिति के बारे में सूचित किया जाना चाहिए। प्राथमिक उपचार के उपाय भी उन्हें समझाया जाना चाहिए। उन्हें आवश्यकता पड़ने की स्थिति में माता-पिता या डॉक्टर के संपर्क नंबर दिया जाना चाहिए। कुछ दवाओं के साथ नींद आना एक समस्या हो सकती है जोकि स्कूल समय में हस्तक्षेप कर सकता है। यह आमतौर पर समय के साथ कम हो जाता है या अन्यथा खुराक या दवा का समय डॉक्टर के परामर्श के बाद बदला जा सकता है।

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क्या करें-क्या ना करें जब बच्चे को मिर्गी का दौरा हो

क्या ना करें

  • घबराना नहीं चाहिए।
  • ठंडा करने के लिए अपने बच्चें को ठंडे या गुनगुने पानी में डालने की कोशिश ना करें।
  • अपने बच्चे के मुंह में कुछ भी नहीं देना चाहिए।
  • आपके बच्चे को पकड़ने या नियंत्रित करने की कोशिश ना करें।

क्या करें

  • शांत रहें
  • अपने बच्चे के साथ रहें।
  • टाईट कपड़ो को ढीला कर दें।
  • अपने बच्चे को संभावित हानिकारक वस्तुओं से दूर ही रखें जैसे नुकीला फर्नीचर, शीशा, छत की मुंडेर आदि।
  • नाक और मुंह को किसी भी स्राव से साफ कर लें
  • फर्श से टकराने से उनके सिर को रोकने के लिए उनके सिर के नीचे कुछ नरम चीज रखें
  • यदि संभव हो, तो जब्ती के शुरू और अंत का समय नोट कर लें

यह लेख एग्रीम इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरो साइंस, आर्टेमिस हॉस्पिटल के न्यूरोसाइंसेस के डायरेक्टर डॉ. सुमित सिंह से बातचीत पर आधारित है।

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