ज्यादा एक्टिव होना भी सही नहीं, एडीएचडी रोग होने का रहता है खतरा

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Apr 20, 2018
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Quick Bites

  • ये रोग मनोवैज्ञानिक समस्या का भी लक्षण हो सकता है।
  • मस्तिष्क के न्यूरोट्रांसमीटर्स का सही ढंग से काम न करना।
  • प्रेग्नेंसी के दौरान एल्कोहॉल या सिगरेट का सेवन।

हमेशा सक्रिय रहना अच्छा है, लेकिन जब यह सक्रियता जरूरत से ज्यादा बढ जाए तो इसे सामान्य आदत समझकर अनदेखा न करें, क्योंकि यह अटेंशन डेफिसिट हाइपर एक्टिविटी डिसॉर्डर जैसी गंभीर मनोवैज्ञानिक समस्या का भी लक्षण हो सकता है। एडीएचडी को उसके लक्षणों की प्रमुखता के आधार पर दो श्रेणियों में बांटा जाता है-इन अटेंशन टाइप और हाइपरएक्टिविटी। पहली स्थिति में व्यक्ति को किसी एक काम में अपना ध्यान टिकाने में बहुत दिक्कत आती है। वह अपनी चीजें व्यवस्थित ढंग से नहीं रख पाता, वह एक साथ कई काम करने की कोशिश करता है, पर उसका कोई भी काम सही ढंग से और समय पर पूरा नहीं हो पाता। इससे उसका व्यवहार बेहद चिडचिडा हो जाता है। दूसरी स्थिति में व्यक्ति अनावश्यक रूप से सक्रिय हो जाता है, पर उसकी यह सक्रियता ज्यादातर नकारात्मक होती है। हालांकि, ज्यादातर लोगों में दोनों तरह के लक्षण होते हैं। कुछ ही लोग ऐसे होते हैं, जिनमें केवल इन अटेंशन टाइप या केवल हाइपरएक्टिविटी के लक्षण देखने को मिलते हैं।

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क्या है वजह

  • मस्तिष्क के न्यूरोट्रांसमीटर्स का सही ढंग से काम न करना
  • ब्रेन के प्री-फ्रंटल लोब में गडबडी
  • सिर में अंदरूनी चोट
  • आनुवंशिकता
  • प्रेग्नेंसी के दौरान एल्कोहॉल या सिगरेट का सेवन

ब्रेन से निकलने वाले एक हॉर्मोन डोपामिन की कमी वजह से भी यह समस्या होती है। यह हॉर्मोन मस्तिष्क से कई जरूरी सिग्नल्स को ग्रहण करके उन्हें नर्वस सिस्टम तक पहुंचाने का काम करता है। ये सिगनल आमतौर पर शारीरिक गतिविधियों, नींद, मूड, ध्यान केंद्रित करने की क्षमता और सीखने की प्रक्रिया से संबंधित होते हैं।

बडों को भी होती है समस्या

पहले ऐसा माना जाता था कि यह समस्या केवल बच्चों में होती है, लेकिन हाल ही में अमेरिकन साइकेट्री एसोसिएशन द्वारा उनके डाइग्नोस्टिक स्टैटिस्टिकल मैन्युअल (डीएसएम-4) में संशोधन करके अब डीएसएम-5 तैयार किया गया है, जिसके अनुसार आजकल बडों में भी यह समस्या बहुत ज्यादा देखने को मिल रही है। दोनों आयु वर्ग के लोगों में एडीएचडी के लक्षण एक जैसे ही होते हैं, लेकिन उनकी जीवन स्थितियों के फर्क की वजह से उनके लक्षणों के प्रभाव अलग-अलग दिखाई देते हैं। मिसाल के तौर पर इस समस्या से ग्रस्त बच्चे पढाई पर अपना ध्यान नहीं टिका पाते, सही समय पर अपना होमवर्क पूरा नहीं करते, हमेशा उछल-कूद मचाते रहते हैं। इसी तरह बडों में सही समय पर प्रोजेक्ट पूरा न कर पाना, अव्यवस्थित रहना, सामने रखी चीजों को बेवजह उलटना-पलटना, बिना सोचे-समझे कुछ भी बोल देना, बार-बार नौकरी बदलना, जैसे लक्षण देखने को मिलते है।

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क्या है उपचार

यह एक ऐसी समस्या है, जिसका कोई स्थायी उपचार नहीं होता, पर बिहेवियर थेरेपी द्वारा इसके लक्षणों को नियंत्रित किया जा सकता है। दवा का इस्तेमाल अंतिम विकल्प के रूप में किया जाता है। गंभीर स्थिति में डोपामिन हॉर्मोन को सक्रिय बनाने वाली दवाएं दी जाती हैं, लेकिन दवाओं के साथ बिहेवियर थेरेपी भी जरूरी है। उपचार के दौरान पीडित व्यक्ति को व्यवहार संबंधी प्रशिक्षण दिया जाता है। अकसर ऐसे मरीजों को ऑर्गेनाइजर डायरी दी जाती है। जिसकी मदद से उन्हें सेल्फ मैनेजमेंट सिखाया जाता है। अगर बच्चे को ऐसी समस्या हो तो उसके साथ माता-पिता की भी काउंसलिंग की जाती है। बडों में अगर ख्ाुद को बदलने की मजबूत इच्छाशक्ति हो तो उनकी यह समस्या आसानी से दूर हो जाती है। अगर व्यक्ति व्यवस्थित ढंग से काम करना शुरू कर दे तो एडीएचडी का नकारात्मक प्रभाव बहुत जल्दी खत्म हो जाता है। कई बार लोगों में इसके लक्षण दोबारा भी दिखने लगते हैं, ऐसे में उसे फिर से काउंसलिंग की जरूरत पडती है, लेकिन इससे जल्द ही समस्या के लक्षणों को दूर किया जा सकता है।

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