बड़ों की तुलना में बच्चे और किशोर ज्यादा है एनीमिया के शिकार, जानें क्यों

एसआरएल डायग्नॉस्टिक्स द्वारा किए गए इन-हाउस सर्वेक्षण के आधार पर जारी एक रिपोर्ट के अनुसार पाया गया है कि एनिमिया न केवल वयस्कों में बल्कि बच्चों में भी आमतौर पर पाया जाता है। शोध में यह भी पाया गया है कि उम्र बढ़ने के साथ ही एनीमिया की संभावना भी

Rashmi Upadhyay
लेटेस्टWritten by: Rashmi UpadhyayPublished at: Apr 08, 2019Updated at: Apr 08, 2019
बड़ों की तुलना में बच्चे और किशोर ज्यादा है एनीमिया के शिकार, जानें क्यों

एनीमिया एक ऐसी स्थिति है जिसमें आपके बच्चे की उम्र के लिए शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं की मात्रा सामान्य से कम हो जाती है। जब कोई बच्चा एनीमिया का शिकार होता है तो उसका शरीर पीला दिखने लगता है और कमजोरी, थकान और सिर में दर्द होना भी इसके सामान्य लक्षण हैं। एनीमिया का सबसे आम कारण आयरन जैसे कि शरीर में लोह तत्व की कमी है। एनीमिया होने पर मरीज को लोह तत्व युक्त डाइट और अधिक अधिक पोषक तत्व खाने की सलाह दी जाती है। हाल ही में एक रिपोर्ट में जाहिर हुआ है कि बच्चे बड़ों की तुलना में ज्यादा एनीमिया के शिकार होते हैं। एसआरएल डायग्नॉस्टिक्स द्वारा किए गए इन-हाउस सर्वेक्षण के आधार पर जारी एक रिपोर्ट के अनुसार पाया गया है कि एनिमिया न केवल वयस्कों में बल्कि बच्चों में भी आमतौर पर पाया जाता है। शोध में यह भी पाया गया है कि उम्र बढ़ने के साथ ही एनीमिया की संभावना भी बढ़ जाती है। सर्वेक्षण के परिणाम जनवरी 2016 से मार्च 2019 के बीच देश भर की एसआरएल लैबोरेटरीज में हीमोग्लोबिन जांचों की रिपोर्ट्स पर आधारित है।

उम्र के अनुसार एनीमिया

इस रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि जो लोग 80 साल की उम्र से अधिक हैं वो 91 फीसदी एनीमिया के मरीज हैं। जबकि 61 से लेकर 85 साल तक की उम्र के करीब 81 फीसदी लोगों को एनीमिया है। इसके साथ ही 46 से लेकर 60 साल तक की उम्र में 69 फीसदी लोग जबकि 31 से 45 साल के 59 फीसदी लोगों को एनीमिया है। अगर किशोरों और बच्चों की बात करें तो 16 से 30 साल तक की उम्र के करीब 57 फीसदी किशोर तथा 0-15 साल के 53 फीसदी बच्चे एनीमिया की चपेट में हैं। अगर इसका निष्कर्ष देखा जाए तो हम कह सकते हैं कि 45 साल से अधिक उम्र के मरीजों में एनिमिया के सबसे गंभीर मामले पाए गए हैं।

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एसआरएल डायग्नॉस्टिक्स के आर एंड डी एंड मॉलीक्युलर पैथोलोजी के अडवाइजर एवं मेंटर डॉ बी.आर. दास ने कहा, "शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं या हीमोग्लोबिन की कम मात्रा होने पर शरीर के ओर्गेन सिस्टम को स्थायी नुकसान पहुंचता है। लाल रक्त कोशिकाओं की कमी से शरीर में खून के जरिए ऑक्सीजन का प्रवाह कम मात्रा में हो पाता है जिससे मरीज में कई लक्षण नजर आते हैं जैसे थकान, त्वचा का पीला पड़ना, सिर में दर्द, दिल की धड़कनों का अनियमित होना और सांस फूलना। अन्य लक्षणों में शामिल हैं मूड में बदलाव और चिड़चिड़ापन, कमजोरी। एनिमिया का सबसे आम कारण है आयरन की कमी, जिसका इलाज करना आसान है। ज्यादातर बीमारियों के मामले में जागरूकता बहुत महत्वपूर्ण होती है।"

अगर दुनियाभर में एनीमिया के मरीजों का आंकड़ा देखा जाए तो विश्व स्वास्थ्य संगठन ऐसा दावा करता है कि करीब दो अरब लोग एनिमिया से ग्रस्त हैं और इनमें से आधे मामलों का कारण आयरन की कमी ही होता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने एनिमिया को तीन स्तरों में श्रेणीबद्ध किया है: माइल्ड (हल्का), मॉडरेट (मध्यम) और सीवियर (गंभीर)। अध्ययन में लिए सैम्पल्स के अनुसार भारत के अन्य जोनों (64 फीसदी) की तुलना में उत्तरी जोन में एनिमिया के सबसे ज्यादा (69 फीसदी) मरीज पाए गए हैं। गंभीर एनीमिया के मामले उत्तरी जोन (6 फीसदी) में महिलाओं (2 फीसदी) की तुलना में पुरुषों (9 फीसदी) में अधिक पाए गए। शेष क्षेत्रों में से 34 फीसदी लोगों में मध्यम एनिमिया पाया गया, जिसमें पुरुषों में 35 फीसदी और महिलाओं में 26 फीसदी मामले पाए गए। पूर्वी जोन में माइल्ड एनिमिया के अधिक मामले पाए गए जबकि पुरुषों और महिलाओं में परिणामों में कुछ खास अंतर नहीं पाया गया।

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