पिता के स्पर्श ने फूंकी बेटी के शरीर में जान, बच्ची को कंगारू मदर केयर थेरेपी देने के लिए पिता ने छोड़ा काम

ये कहानी है एक प‍िता की ज‍िसने अपने स्‍पर्श से बेटी की जिंदगी बचा ली, ये संभव हुआ कंगारू मदर केयर थैरेपी से। आइए जानते हैं कैसे काम करती है ये थैरेपी 

Yashaswi Mathur
Written by: Yashaswi MathurUpdated at: Mar 09, 2021 11:46 IST
 पिता के स्पर्श ने फूंकी बेटी के शरीर में जान, बच्ची को कंगारू मदर केयर थेरेपी देने के लिए पिता ने छोड़ा काम

हम केवल मां को बच्‍चे की जीवन-दाय‍िनी का दर्जा देते हैं पर ये क‍िस्‍सा है एक प‍िता का ज‍िसने अपनी बच्‍ची को नई ज‍िंदगी दी। प्रेगनेंसी के नौ महीने तक होने वाले माता-प‍िता को ये च‍िंता रहती है क‍ि वो अपने बच्‍चे को सही-सलामत इस दुन‍िया में ले आएं पर 9 माह बाद भी जब उस नन्‍ही सी जान की ज‍िंदगी खतरे में आ जाए तो ह‍िम्‍मत टूट जाती है। कुछ ऐसी ही कहानी है अख‍िलेश और रीना की ज‍िन्‍हें संतान का सुख म‍िला, दुआ कबूल हुई और कुदरत से बेटी म‍िली पर खुश‍ियां गम में तब बदल गईं जब पता चला क‍ि बच्‍ची का वजन सामान्‍य से कम है और उसे बचाना मुश्‍क‍िल है। न‍िचले तबके से जुड़े मां-बाप के लि‍ए बच्‍ची को महंगे ट्रीटमेंट या प्राइवेट अस्‍पताल में ले जा पाना मुमक‍िन नहीं था, तब उन्‍होंने डॉक्‍टर से सलाह लेकर कंगारू मदर केयर का सहारा ल‍िया ज‍िसमें बच्‍ची के प‍िता ने अपने स्‍पर्श से नन्‍ही सी जान को नई ज‍िंदगी दे दी। अगर न्‍यूबॉर्न 37 सप्ताह से पहले पैदा होता है, तो वह एक प्रीटर्म या प्रीमैच्योर बेबी कहलाता है। अगर उनके शरीर में मांस कम है तो कंगारू विधि की मदद ली जाती है। ये केस है लखनऊ का ज‍िसे सफल बनाने का दाय‍ित्‍व लखनऊ के डफर‍िन अस्‍पताल के वर‍िष्‍ठ बाल रोग व‍िशेषज्ञ डॉ सलमान खान का था ज‍िनसे हमने इस केस की बार‍िकी को समझा और कंगारू मदर केयर थैरेपी की जानकारी ली। 

true story of a newborn

प‍िता के स्‍पर्श से कैसे बची बेटी की ज‍िंदगी? 

यूपी के काकोरी ज‍िले में स्थित मेहंदीपुर के रहने वाले अख‍िलेश और रीना देवी शादी के तीन साल तक संतान की कामना करते रहे पर उनकी दुआ कबूल नहीं हुई फि‍र एक द‍िन उन्‍हें पता चला क‍ि वो माता-प‍िता बनने वाले हैं खुशी का ठ‍िकाना नहीं था। डॉक्‍टर के पास पहुंचे तो उन्‍होंने बताया मां के शरीर में खून की कमी है इसल‍िए बड़े अस्‍पताल जाना होगा। काकोरी ज‍िले में स्‍वास्‍थ्‍य सुव‍िधाओं का आज भी अभाव है ज‍िसके चलते रीना को लखनऊ रेफर क‍िया गया। लखनऊ के गोलागंज इलाके में स्‍थ‍ित डफर‍िन अस्‍पताल शहर के सबसे बड़े प्रसूता अस्‍पतालों में से एक है। यहां रीना का इलाज चला पर हाई र‍िस्‍क प्रेगनेंसी के चलते बच्‍ची का जन्‍म सातवे माह में ही हो गया। समय से पहले जन्‍मी बच्‍ची का वजन जन्‍म के समय एक क‍िलो भी नहीं था ऐसे में उसे इंक्‍यूबेटर पर रखा गया। ये मशीन नवजात श‍िशुओं के ल‍िए एक तरह का वेंटीलेटर होता है।

पहली बार मां की जगह प‍िता ने दी कंगारू मदर केयर थैरेपी

KMV therapy 

बच्‍ची की जान तो बच गई पर उसका ज्‍यादा समय तक ज‍िंदा रहना मुश्‍क‍िल था। हर मां-बाप की तरह रीना और अख‍िलेश के मन में भी आया क‍ि बच्‍ची को किसी प्राइवेट अस्‍पताल में ले जाएं ताक‍ि उसकी जान बच पाए पर पैसों के अभाव में वो लाचार थे। ज‍िला अस्‍पताल के वरिष्‍ठ च‍िक‍ित्‍सक डॉ सलमान की राय पर बच्‍ची को कंगारू मदर केयर थैरेपी देने का फैसला ल‍िया गया। ये थैरेपी नवजात शिशुओं को दी जाती है ज‍िसमें मां के स्‍पर्श से बच्‍चे के शरीर को गरमाहट म‍िलती है और इससे उसका वजन बढ़ता है। ये थैरेपी केवल मांएं ही अब तक देती आई हैं पर ये पहला मौका था जब इसकी पहल एक प‍िता ने की। डॉक्‍टर की सलाह पर अख‍िलेश ने अपनी बच्‍ची की जान बचाने के ल‍िए इस थैरेपी को देने के ल‍िए अपनी मंजूरी दी। उधर मेटरनल केयर में भर्ती बच्‍ची की मां अपने बेटी की सलामती की दुआ मांग रही थी। 

बच्‍ची की जान बचाने के ल‍िए बंद क‍िया आमदनी का जर‍िया

baby in hospital

डफर‍िन अस्‍पताल में केवल मांओं द्वारा बच्‍चे को थैरेपी देने का वार्ड बनाया गया है पर क्‍योंक‍ि ये थैरेपी कोई भी दे सकता है इसल‍िए अख‍िलेश ने अपनी बच्‍ची को बचाने के ल‍िए ये फैसला ल‍िया। उनके ल‍िए ये कदम इतना आसान नहीं था। अख‍िलेश को बच्‍ची के साथ अस्‍पताल में ही रुकना था तो उन्‍हें अपना काम रोकना पड़ा। दिहाड़ी मजदूर के तौर पर काम कर रहे अख‍िलेश के पास आमदनी का कोई जर‍िया नहीं था फ‍िर भी उन्‍होंने काम की जगह बेटी की जान को अहम‍ियत दी। अख‍िलेश को स‍िगरेट की लत थी पर थैरेपी के दौरान उन्‍होंने इसे भी छोड़ा और बच्‍ची को प‍िता के स्‍पर्श से ठीक करने में पूरी जान लगा दी। 

बच्‍ची और प‍िता में बना आत्मीय संबंध 

बच्‍ची  के पिता अखिलेश बताते हैं कि अस्पताल में थैरेपी के बाद बच्‍ची अपनी मां की अपेक्षा मेरे पास ज्‍यादा रहती है और उसे मेरे पास सोना ज्‍यादा पसंद है। तीन हफ्ते थैरेपी देने के बाद बच्‍ची पूरी तरह से सांस ले पाई, उसका वजन ढाई किलो होने तक उसे थैरेपी दी गई। अब बच्‍ची पूरी तरह स्‍वस्‍थ्‍य है और उसे ड‍िस्‍चार्ज कर द‍िया गया है।

कैसे दी जाती है केएमसी थैरेपी? (Method of Kanagaroo Mother Therapy for premature baby)

इसमें थैरेपी देने वाले व्‍यक्‍त‍ि को अपने सीने से बच्चे का सीना लगाना होता है। इसमें इस बात का ध्यान रखना होता है कि थैरेपी देने वाले व्‍यक्‍त‍ि की त्वचा से नवजात की त्वचा का स्पर्श हो सके। जरूरी नहीं है क‍ि ये थैरेपी मां ही दे, केएमसी स्वस्थ पिता, दादी भी दे सकती है पर इन लोगों को सफाई का भी विशेष ध्यान रखना होगा। कम वजन के बच्चों के लिए केएमसी उपचार वरदान है। इससे उनका वजन कुछ ही दिनों में बढ़ने लगता है और बच्चे पूर्ण रूप से स्वास्थ होने के बाद उसकी जान को कोई खतरा नहीं रहता। 

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कंगारू मदर केयर में भर्ती नि:शुल्क (KMC is a free therapy)

ये तकनीक सरकारी अस्‍पतालों में पूरी तरह से नि:शुल्क है, शिशु को भर्ती करने के पश्चात कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं लिया जाता है। कंगारू केयर में किसी तरह की दवाएं नहीं दी जाती। नवजातों के लिए कंगारू केयर वॉर्मर से ज्यादा कारगर है। इसमें बच्चों को शरीर की प्राकृतिक गर्माहट मिलती है। प्रीमेच्योर बच्चों का वजन भी अन्य नवजात शिशुओं की तुलना में काफी कम होता है। समय से पूर्व प्रसव से होने वाली इन समस्याओं से निपटने का प्रभावी उपाय देखभाल की कंगारू विधि होती है। एक बार में कम से कम एक घंटा या एक दिन में 6 से 8 घंटे नवजात को कंगारू थेरेपी दी जाती है। 

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केएमसी थैरेपी के फायदे (Benefits of Kanagaroo Mother Therapy) 

  • प्रीमेच्‍योर बेबी का वजन बढ़ता है
  • प्रीमेच्‍योर बेबी ठीक तरह से सांस ले पाता है  
  • नवजात आसानी से स्‍तनपान कर पाता है 
  • बच्‍चे के साथ र‍िश्‍ता मजबूत बनता है
  • नवजात श‍िशु को हाइपोथरम‍िया से बचाया जा सकता है 

आप इस थैरेपी को घर पर भी दे सकते हैं, अगर आपके घर में जल्‍द नया मेहमान आने वाला है तो डॉक्‍टर से इस थैरेपी की जानकारी लें ताक‍ि क‍िसी भी तरह की इमरजेंसी के ल‍िए आप तैयार रहें।

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