लगाव विकार के लक्षण

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Nov 24, 2011

attachment disorder ke lakshan

लगाव (एटेचमेंट)- एक सुरक्षित आधार


बचपन में बच्चे अपनी तरह तरह की जरूरतों की पूर्ति के लिए, जैसे भूख, आराम,  सुरक्षा इत्यादि के लिए, अपने बड़ों के उपर निर्भर करते हैं।
 
अगर बच्चों की ये सब जरूरतें पूरी होती रहती हैं तो जो उसकी जरूरतों को पूरा करता है उससे उसे गहरा लगाव हो जाता है।  इस तरह वह खुद को सुरक्षित महसूस करता/करती है और उसकी भेद्यता एवं अनजाना डर कम हो जाता है। इस तरह से बच्चे में बुनियादी तौर पर एक अजीब तरह का विश्वास उत्पन्न हो जाता है और उसे यह यकीन रहता है कि जब भी वह किसी मुश्किल में होगा या उसे किसी चीज की जरुरत होगी, उसकी देखभाल के लिए यानि उसकी जरूरतें पूरी करने के लिए कोई न कोई उसके पास होगा। ये सब बातें बच्चे को मुशिकलों से निपटने के लिए तैयार करती हैं एवं उनपर विजय प्राप्त करने को सक्षम बनती है क्योंकि उसे यह विश्वास रहता है कि जरुरत के वक्त उसकी मदद के लिए उसके लोग उसके साथ रहेंगे। इस तरह से बचपन में हीं बच्चे के मन में प्यार एवं विश्वास का बीज पड़ जाता है साथ हीं साथ उस बच्चे का उनलोगों के साथ रिश्ता भी मजबूत बनता है।

एटेचमेंट  डिसऑर्डर क्या है?

एटेचमेंट  डिसऑर्डर एक व्यक्ति के कई पहलुओं को दर्शाता है जो  भावनात्मक, संज्ञानात्मक, सामाजिक और व्यावहारिक हो सकता है।  यह  डिसऑर्डर यानि विकार माँ, पिता, दादा, दादी या नाना नानी किसी भी सम्बन्धी के साथ हो सकता है।

आमतौर पर जब कोई बच्चा  लगाव विकार (एटेचमेंट  डिसऑर्डर)  विकसित कर लेता है तो यह उसके मनोवैज्ञानिक विकास में बाधा उत्पन्न करती है और इससे उसके बचपन में, किशोरावस्था में और वयस्कता में कई समस्याएं घेर लेती हैं। बचपन में लगाव  विकार (एटेचमेंट  डिसऑर्डर) के कारण आगे चलकर विभिन्न तरह के अन्य विकार पैदा हो सकते हैं मसलन अन्तराबन्ध व्यक्तित्व विकार, पागल व्यक्तित्व विकार, व्यक्तित्व विकार बॉर्डर, असामाजिक व्यक्तित्व विकार इत्यादि।
 
एटेचमेंट  डिसऑर्डर  के लक्षण


लगाव  विकार के कई लक्षण उभर कर सामने आते हैं।  एक ओर बच्चे दूसरों से खुद को दूर समझने लगते हैं एवं उनकी बातों पर ध्यान नहीं देते और खुद को अलग थलग रखते हैं वहीँ  दूसरी ओर बच्चे अपने लोगों के साथ इस कदर चिपके रहते हैं जिसका कोई जवाब नहीं।  यद्यपि दो बच्चों में एटेचमेंट  डिसऑर्डर के भिन्न भिन्न लक्षण हो सकते हैं लेकिन उनके बीच कुछ लक्षण लगभग सामान होते हैं जो निम्न प्रकार के होते हैं। 

संकोची स्वभाव :
इस केस में बच्चे खुद को दूसरों से अलग थलग रखना पसंद करते हैं। वे जल्दी किसी से संपर्क नहीं बनाते न हीं जान पहचान बढ़ाना चाहते ; दूसरे लोग जब उनके पास जाते हैं तभी वे उनसे बात करते हैं; वह भी खुलकर नहीं। कुछ बच्चे ऐसे होते हैं जो किसी के साथ मेल जोल या संपर्क तो बढ़ा लेते हैं लेकिन फिर बिना किसी वजह के एकाएक अलग हो जाते हैं।

मिलनसार बच्चा :
इस लक्षण से ग्रसित बच्चा बहुत हीं मिलनसार होता है और किसी के साथ भी मेल जोल बढ़ा लेता है चाहे वो कोई अजनबी हीं क्यों न हो। ऐसे बच्चे किसी को भी अपना शुभचिंतक और दोस्त  मान लेते हैं और उनके साथ रहने में इन्हें कोई दिक्कत नहीं होती। 

लगाव विकार के चरम मामलों में, लगाव के कारण हुए परेशानी के कारण कुछ अतिरिक्त लक्षण भी हो सकते हैं।  इनमें से जो मुख्य लक्षण देखने को मिलते हैं वे हैं शारीरिक एवं मानसिक विकास में कमी, वजन कम होना, संज्ञानात्मक विकास में कमी, बोलने में समस्या, एवं समाज में घुलने मिलने में समस्या। 

एटेचमेंट  डिसऑर्डर के कारण
 
प्रत्येक बच्चे का जन्मजात एक जैविक स्वभाव होता है।  उदाहरण के लिए कुछ बच्चों को आप आसानी से शांत कर सकते हैं जबकि कुछ बच्चे ऐसे होते हैं जिन्हें शांत करने में पसीना आ जाता है। अपने ख्याल करने वाले व्यक्ति के साथ शुरू शुरू में बच्चा जिस तरह का आचरण या  स्वभाव अपनाता है उसी समय यह तय हो जाता है कि आगे चलकर बच्चे में एटेचमेंट  डिसऑर्डर होगा या नहीं और यदि होगा तो किस हद तक! 

जिस माहौल में किसी भी कारणों से बच्चे की बुनियादी जरूरतें भी उसके अपने लोग पूरी नहीं करते या उसका साथ नहीं देते या जिस माहौल में बच्चों का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शोषण होता हो, वहां एटेचमेंट  डिसऑर्डर पनपने की काफी संभावना होती है। 

एटेचमेंट  डिसऑर्डर का इलाज


लगाव विकार का उपचार इस बात पर निर्भर करता है कि मरीज की उम्र क्या है और जब उसके इस रोग की निदान  की गई तब उसकी उम्र क्या है इत्यादि। यदि इस रोग का निदान शैशवकाल के दौरान हीं कर लिया जाता है या बचपन में हीं कर लिया जाता है तो  पैतृक परामर्श मनोचिकित्सा दी जाती है या अभिभावक को इस मनोरोग से निपटने के तरीके समझाए जाते हैं। बढ़ते हुए बच्चे या थोडा बड़े हुए बच्चे खेल कूद के द्वारा इस रोग से निजत पाते हैं  एवं बड़ों की निगरानी में उन्हें रचनात्मक काम में लिप्त करवाया जाता है जिससे उनका मानसिक विकास होता है जबकि यदि यही समस्या वयस्कों को है तो लंबी अवधि की  गहन मनोचिकित्सा की जरूरत पड़ती है।

 

 

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