दर्द से रूला देता है स्‍पाइनल इंफेक्‍शन, जानें इसके कारण लक्षण और बचाव

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Mar 19, 2018
Quick Bites

  • यह इंफेक्‍शन बैक्टीरिया की वजह से ही होता है
  • रक्तवाहिनियों के जरीए यह बैक्टीरिया रीढ़ की हड्डी तक फैल जाता है
  • रक्तवाहिकाओं के जरिए बैक्टीरिया वर्टिब्रल डिस्क में फैल जाता है

स्पाइनल इन्फैक्शन एक तरह का रेयर इंफेक्‍शन है, जो रीढ़ की हड्डियों के बीच मौजूद डिस्क स्पेस, कशेरुकाओं और स्पाइनल कैनाल या उस के आसपास के सौफ्ट टिशूज को प्रभावित करता है। आमतौर पर यह इंफेक्‍शन बैक्टीरिया की वजह से ही होता है और रक्तवाहिनियों के जरीए यह बैक्टीरिया रीढ़ की हड्डी तक फैल जाता है। रक्तवाहिकाओं के जरिए बैक्टीरिया वर्टिब्रल डिस्क में फैल जाता है, जिस से डिस्क और उस के आसपास के हिस्सों में इंफेक्‍शन होने लगता है और डिसाइटिस होने का खतरा पैदा हो जाता है।



डिसाइटिस भी एक तरह का इंफेक्‍शन ही है, जो रीढ़ की हड्डी की अंदरूनी डिस्क में होता है, जैसे-जैसे यह इंफेक्‍शन बढ़ने लगता है, डिस्क के बीच की स्पेस कम होने लगती है और डिस्क के भंग होते रहने की वजह से इंफेक्‍शन डिस्क स्पेस के ऊपर और नीचे की तरफ शरीर के अन्य अंदरूनी हिस्सों में भी फैलने लगता है, जिस से औस्टियोमाईलाइटिस हो जाता है। यह एक तरह का हड्डियों का इंफेक्‍शन ही है, जो बैक्टीरिया या फंगल और्गेनिज्म की वजह से होता है।

इंफेक्‍शन की वजह से कमजोर हो रही हड्डी के टूटने या उस का आकार बिगड़ने का खतरा भी रहता है।  कुछ मामलों में इंफेक्‍शन या उस की वजह से टूट रही हड्डी नसों या स्पाइनल कोड की तरफ धंसने लगती है, जिस की वजह से बेहोशी आने, शरीर में कमजोरी महसूस होने, झनझनाहट होने, तेज दर्द होने और ब्लैडर डिस्फंक्शन जैसे न्यूरोलौजिकल लक्षण भी नजर आने लगते हैं।

स्पाइनल इंफेक्‍शन के कारण

कुछ परिस्थितियां स्पाइनल इंफेक्‍शन से पीडि़त मरीज की रोगप्रतिरोधक क्षमता पर काफी प्रभाव डालती हैं और मरीज की रोगप्रतिरोधक क्षमता को कमजोर कर देती हैं. इन में डाइबिटीज मैलिटस, रोगप्रतिरोधक क्षमता को दबाने या कम करने वाली दवा का इस्तेमाल, कुपोषण, और्गन ट्रांसप्लांट की हिस्ट्री और नसों के जरीए लिए जाने वाले नशीले पदार्थों के सेवन जैसी परिस्थितियां शामिल हैं।

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स्पाइनल इंफेक्‍शन सामान्यतया स्टेफिलोकौकस औरियस बैक्टीरिया की वजह से होता है, जो आमतौर पर हमारे शरीर की स्किन में रहता है। इस के अलावा इस्चेरिचिया कोली, जिसे ई कोलाई बैक्टीरिया भी कहा जाता है, उस से भी यह इन्फैक्शन हो सकता है। ज्यादातर स्पाइन इंफेक्‍शन लंबर स्पाइन यानी रीढ़ की हड्डी के मध्य या निचले हिस्से में होते हैं, क्योंकि इसी हिस्से से रीढ़ की हड्डी में ब्लड सप्लाई होता है। इस के बीच पैल्विक इन्फैक्शन, यूरिनरी या ब्लैडर इन्फैक्शन, निमोनिया या सौफ्ट टिशू इन्फैक्शन में होते हैं। नसों के जरीए लिए जाने वाले नशे से संबंधित इन्फैक्शन में ज्यादातर गरदन या सर्वाइकल स्पाइन प्रभावित होती है।

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स्पाइनल इंफेक्‍शन के लक्षण

वयस्कों में स्पाइनल इंफेक्‍शन  बहुत धीमी गति से फैलता है और इसी वजह से उस के लक्षण बहुत कम नजर आते हैं, जिस के कारण काफी देर से इस का पता चलता है। कुछ मरीजों को तो डायग्नोज किए जाने के कुछ हफ्ते या महीने पहले ही इस के लक्षणों का एहसास होना शुरू हो जाता है। इसके लक्षण आमतौर पर गरदन या पीठ के किसी हिस्से में टिंडरनैस आने के साथ शुरू होते हैं और पारंपरिक दवा लेने और आराम करने के बावजूद मूवमेंट करते वक्त महसूस होने वाला दर्द कम नहीं होता, बल्कि बढ़ता ही जाता है।

इंफेक्‍शन बढ़ने पर बुखार होना, कंपकंपी आना, नाइट पेन या अप्रत्याशित तरीके से वजन घटना आदि लक्षण भी दिखाई देने लगते हैं। हालांकि ये वे सामान्य लक्षण नहीं हैं, जो हर मरीज में खासतौर पर लंबे समय से बीमार चल रहे मरीज में दिखाई देते हों। शुरुआत में मरीज को पीठ में बहुत तेज दर्द होने लगता है, जिस के कारण शरीर का मूवमैंट भी सीमित हो जाता है। अगर स्पाइनल इन्फैक्शन होने की आशंका है, तो लैबोरेटरी इवैल्यूएशन और रेडियोग्राफिक इमेजिंग स्टडीज कराना बेहद जरूरी हो जाता है।

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