प्रेग्‍नेंसी में एनीमिया, डायबिटीज और इन 5 बीमारियों का रहता है खतरा, ऐसे करें बचाव

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
May 19, 2018
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Quick Bites

  • प्रेग्नेंसी के दौरान हॉर्मोन संबंधी बदलाव का सामना करना पड़ता है।
  • अगर शुरू से सजगता बरती जाए तो इनके असर को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
  • गर्भस्थ शिशु की विकास के लिए स्त्री के शरीर को अधिक मात्रा में ब्लड की ज़रूरत होती है।

 

प्रेग्नेंसी किसी भी स्त्री के जीवन का सबसे खुशनुमा दौर होता है पर इस दौरान हॉर्मोन संबंधी बदलाव के कारण उसे कई तरह की स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ता है। अगर शुरू से सजगता बरती जाए तो इनके असर को काफी हद तक कम किया जा सकता है। आइए जानते हैं इसके कारणों और बचाव से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां।  

मॉर्निंग सिकनेस

प्रेग्नेंसी के शुरुआती दौर में लगभग 80 प्रतिशत स्त्रियों को सुबह के समय जी मिचलाने या वोमिटिंग की समस्या होती है। दरअसल गर्भावस्था के शुरुआती लक्षणों के लिए एचसीजी यानी ह्यूमन क्रॉनिक गोनाडोट्रॉपिन नामक हॉर्मोन को जि़म्मेदार माना जाता है। जैसे ही स्त्री के यूट्रस में एग का फर्टिलाइज़ेशन होता है, उसके शरीर में इस हॉर्मोन का सिक्रीशन तेज़ी से होने लगता है। इस दौरान उसके शरीर में एस्ट्रोजेन हॉर्मोन की  भी मात्रा बढ़ जाती है। इसी वजह से शुरुआती तीन महीनों में स्त्रियों को नॉजि़या या वोमिटिंग की समस्या होती है।      

कैसे करे बचाव : सुबह उठने के बाद अपनी पसंद की कोई भी नमकीन चीज़ खा लें, खाने के बीच में पानी पीने से बचें, इससे वोमिटिंग की आशंका बढ़ जाती है। जिन चीज़ों के गंध से परेशानी होती है, उनसे दूर रहने की कोशिश करें। अगर दिन में एक या दो बार वोमिटिंग हो तो  दवा लेने की ज़रूरत नहीं होती।

एनीमिया को कहें ना

गर्भस्थ शिशु की विकास के लिए स्त्री के शरीर को अधिक मात्रा में ब्लड की ज़रूरत होती है। इसलिए स्वाभाविक तौर पर उनके ब्लड में प्लाज्मा का घनत्व बढऩे लगता है। ऐसी दशा में अगर डाइट में आयरन की मात्रा न बढ़ाई जाए तो उनके शरीर में हीमोग्लोबिन का लेवल घट जाता है। ऐसी दशा को फ‍िजि़योलॉजिकल एनीमिया कहा जाता है। दरअसल ब्लड में मौजूद हीमोग्लोबिन शरीर की सभी कोशिकाओं तक ऑक्सीजन पहुंचाने का काम करता है। इसलिए प्रेग्नेंसी के दौरान एनीमिया होना मां और गर्भस्थ शिशु दोनों के लिए घातक हो सकता है।

कैसे करें बचाव : अपनी नियमित डाइट में चुकंदर और हरी पत्तेदार सब्जि़यों के अलावा सेब, अनार, केला, अंजीर और खजूर जैसे आयरनयुक्त फलों को प्रमुखता से शामिल करें। चना, गेहूं के चोकर और रेड मीट में भी पर्याप्त मात्रा में आयरन पाया जाता है। इन चीज़ों के साथ संतरा, मौसमी, आंवला और नींबू जैसे खट्टे फलों का सेवन भी करना चाहिए क्योंकि शरीर में आयरन के अवशोषण के लिए उसके साथ विटमिन सी का सेवन अनिवार्य है।

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डायबिटीज़ से हो दूरी  

आजकल खानपान संबंधी गड़बडिय़ों और रोज़मर्रा की दिनचर्या में शारीरिक गतिविधियों की कमी के कारण लगभग 40-50 प्रतिशत गर्भवती स्त्रियों में जेस्टेशनल डायबिटीज़ के लक्षण पाए जाते हैं। इससे शिशु में भी इसके लक्षण पनपने की आशंका बढ़ जाती है।

कैसे करें बचाव : ऐसी समस्या से ग्रस्त स्त्रियों को गर्भधारण करने के बाद भी मीठी चीज़ों, चावल, आलू और जंक फूड से दूर रहने की सलाह दी जाती है। साथ ही डॉक्टर के निर्देशानुसार हर तीन महीने के अंतराल पर ओरल ग्लूकोज टोलरेंस टेस्ट (ओजीटीटी) करवाना भी ज़रूरी होता है। खानपान में नियंत्रण के बावजूद अगर शुगर लेवल नहीं घटता तो दवाओं या इंसुलिन का इंजेक्शन देने की ज़रूरत पड़ सकती है।

पैरों और कमर में दर्द

प्रेग्नेंसी के दौरान ज़्यादातर स्त्रियों को पैरों में दर्द, खिंचाव और सूजन की समस्या होती है। कई बार पैरों के अलावा गर्भवती स्त्री के चेहरे और हाथ-पैरों में भी सूजन दिखाई देता है। इसी तरह प्रेग्नेंसी के दौरान रीढ़ की हड्डी पर दबाव बढऩे से कुछ स्त्रियो को रीढ़ की हड्डी के निचले हिस्से में दर्द हो सकता है।     

कैसे करें बचाव : एक ही अवस्था में बहुत देर तक बैठने या खड़ी होने से बचें। कामकाजी स्त्रियां ऑफिस में काम करते समय अपने पैरों को ज़मीन पर लटकाने के बजाय उन्हें किसी छोटे स्टूल पर टिकाकर रखें। रात को लेटते समय पैरों के नीचे तकिया रखें। बैक पेन से बचाव के लिए बैठते समय पीठ और कमर को कुशन का सपोर्ट दें। 

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प्रीइंक्लेंप्सिया की परेशानी

प्रेग्नेंसी के शुरुआती 20 सप्ताह में कुछ स्त्रियों का ब्लडप्रेशर बहुत तेज़ी से बढऩे लगता है और उसके साथ यूरिन से प्रोटीन का रिसाव शुरू हो जाता है। इसी अवस्था को प्रीइंक्लेंप्सिया कहा जाता है। गंभीर स्थिति में उनका ब्लडप्रेशर 160/110 तक पहुंच जाता है। इससे कई बार उसके चेहरे पर और पैरों में सूजन आ जाती है। ऐसी अवस्था में प्लेसेंटा तक रक्त प्रवाह में रुकावट पैदा होती है। इससे गर्भस्थ शिशु का विकास धीमी गति से होता है। ऐसी स्थिति में सिर या पेट में तेज़ दर्द और नॉजि़या जैसे लक्षण नज़र आते हैं।

कैसे करें बचाव :  प्रेग्नेंसी में ब्लडप्रेशर की नियमित जांच कराएं। प्रीइंक्लेंप्सिया की आशंका होने पर ब्लडप्रेशर के साथ यूरिन और ब्लड टेस्ट भी किया जाता है। नमक का सेवन सीमित मात्रा में करें। अगर यहां बताए गए लक्षण नज़र आएं तो बिना देर किए डॉक्टर से संपर्क करें। गंभीर स्थिति में गर्भवती स्त्री और गर्भस्थ शिशु के न्यूरो प्रोटेक्शन के लिए स्त्री की वेन्स में मैग्नीशियम सल्फेट का इन्जेक्शन लगाया जाता है और  उसे हाइपर सेंसिटिव दवाएं दी जाती हैं।

यूटीआई की आशंका

गर्भावस्था में स्त्रियों के शरीर में प्रोजेस्टेरॉन का स्तर काफी बढ़ जाता है। इससे उन्हें यूटीआई यानी यूरिनरी ट्रैक इन्फेक्शन हो सकता है। ऐसी अवस्था में यूरेटर और ब्लैडर की मांसपेशियां ढीली पड़ जाती हैं। इससे यूरिनरी ट्रैक की संरचना में झुकाव सा आ जाता है। नतीजतन यूरिन का प्रवाह इस ढंग से होता है कि वह किडनी को हलका सा टच करते हुए ब्लैडर से बाहर निकलता है। इसी वजह से प्रेग्नेंसी में यूटीआई के साथ किडनी इन्फेक्शन की भी आशंका बढ़ जाती है।

कैसे करें बचाव : पानी, जूस और छाछ जैसे तरल पदार्थों का सेवन अधिक मात्रा में करें। इस दौरान स्ट्रीट फूड खाने से बचें। पर्सनल हाइजीन के प्रति विशेष रूप से सजगता बरतनी चाहिए। पब्लिक टॉयलेट के इस्तेमाल  से पहले भी फ्लश चलाना न भूलें। दवाओं का नियमित सेवन करें क्योंकि एंटीबायोटिक्स का कोर्स अधूरा छोडऩे पर दोबारा इन्फेक्शन की आशंका बढ़ जाती है। 

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