National Organ Donor Day: अंगदान के मामले में भारत अन्य देशों से बहुत पीछे, जानें क्या है इसका कारण?

National Organ Donor Day 2020: राष्ट्रीय अंगदान दिवस पर जानें भारत में अंगदान क्यों नहीं करते हैं लोग और कौन सी चुनौतियां आती हैं सामने।

Anurag Anubhav
Written by: Anurag AnubhavPublished at: Feb 13, 2020Updated at: Feb 13, 2020
National Organ Donor Day: अंगदान के मामले में भारत अन्य देशों से बहुत पीछे, जानें क्या है इसका कारण?

नैशनल ऑर्गन डोनर डे यानी राष्ट्रीय अंगदान दिवस हर साल 14 फरवरी को मनाया जाता है। इस दिन को मनाने की वजह लोगों में इस बात की जागरूकता फैलाना है कि वो अंगदान करें। अंगदान के द्वारा लाखों लोगों की जिंदगी को बचाया जा सकता है और उनकी आंखों को रौशनी दी जा सकती है। आमतौर पर शरीर के द्वारा आप 5 तरह के दान कर सकते हैं- अंग, टिशूज, मैरो, प्लेटलेट्स और रक्त। रक्त दान के लिए तो फिर भी एक बार लोग तैयार हो जाते हैं मगर भारत में अंगदान की स्थिति बहुत नाजुक है। दूसरे देशों की अपेक्षा भारत में अंगदान के लिए बहुत कम लोग तैयार होते हैं। पारस हेल्थकेयर के एमडी डॉ. धर्मिंदर नागर के अनुसार भारत में अंगदान को बढ़ावा देने के लिए ऑप्ट आउट' प्रणाली को अपनाने की जरूरत है।

विदेशों में ज्यादा अंग दान करते हैं लोग

2016 में, स्पेन में कुल 4,818 अंग प्रत्यारोपित किए गये। यानी स्पेन में हर दस लाख लोगों में से 43.4 लोग अपने अंग दान करते हैं, वहीं अमेरिका में 26.6 लोग और युनाइडेट स्टेट्स में 19.6 लोग अंगदान करते हैं। स्पेन लंबे समय से अंगदान के मामले में सबसे अग्रणी देश बना हुआ है। इसका कारण वहां का एक खास नियम है, जिसे 'ऑप्ट आउट' सिस्टम कहते हैं।

क्या है ऑप्ट आउट सिस्टम?

स्पेन में अंगदान को एक बड़ी सफलता बनाने वाले कारकों में वहां का ऑप्ट आउट सिस्टम बहुत काम आया है। इस सिस्टम के तहत सभी नागरिक जन्म से ही अपने आप अंग दान करने के लिए पंजीकृत हो जाते हैं जब तक कि वे विशेष रूप से इसे अस्‍वीकार नहीं करते हैं। अंगदान करने वाले अन्य देशों में क्रोएशिया, फ्रांस, नॉर्वे और इटली भी शामिल हैं।

भारत में अंगदान की स्थिति

दूसरी तरफ, भारत के मामले में जब अंग दान की बात आती है, तब आंकड़ों का स्‍तर बहुत खराब स्थिति को दर्शाता है, क्‍योंकि यहां प्रतीक्षा सूची की वजह से हजारों लोगों के अंग प्रतिवर्ष मर रहे हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुमान के अनुसार भारत में किडनी की सालाना आवश्यकता 1-2 लाख के बीच है। हालांकि, वास्तव में एक यहां मामूली रूप से 5,000 अंगों का प्रत्यारोपण होता है। इनमें से अधिकांश कैडेवर डोनर (मृत दाताओं) के बजाय लाइव डोनर (जीवित दाताओं) हैं।
जर्नल ऑफ मेडिकल साइंसेज में प्रकाशित एक शोध के अनुसार, भारत में लिवर ट्रांसप्‍लांट की आवश्यकता प्रति वर्ष लगभग 20/मिलियन पॉपुलेशन (आबादी) या 25,000 होने का अनुमान है। हालांकि, भारत में 2013 और 2014 में लगभग 1200 और 1400 लिवर ट्रांसप्‍लांट किए गए हैं।

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कैडेवर डोनर्स (मृतक दाताओं) की संख्‍या में कमी

जैसा कि अक्सर इस बात की चर्चा की जाती है, कैडेवर डोनर्स की खराब दर भारत के ऑर्गन डोनर प्रोग्राम (अंग दान कार्यक्रम) के लिए एक बड़ी चुनौती रही है। भारत में मृतक अंग दाता दर लगभग 0.34 पर मिलियन (3 लाख 40 हजार) है, जो कि विकसित देशों की तुलना में बहुत कम है। भारत में अंग दान करने वाले ज्‍यादातर जीवित लोग हैं, जो या तो मरीज से सीधे तौर पर संबंधित हैं या अंग की अदला-बदली की व्यवस्था का हिस्सा हैं। मस्तिष्क मृत्यु, सामाजिक सांस्कृतिक कारकों, धार्मिक विश्वासों और अपर्याप्त प्रत्यारोपण केंद्रों सहित संगठनात्मक रूप से समर्थन की कमी के बारे में जागरूकता की कमी, अच्छी तरह से प्रशिक्षित प्रत्यारोपण समन्वयकों की कमी हमारे देश में अंग दान कार्यक्रम के मामले में सामने आने वाली प्रमुख चुनौतियां हैं।

2011 के बाद से भारतीय कानून और संशोधन में एक नियम है जो इंटेंसिव केयर डॉक्‍टर्स (गहन देखरेख चिकित्‍सक) के लिए "आवश्यक अनुरोध" के प्रावधान को पेश करता है ताकि मस्तिष्क मृत्यु की स्थिति में मरीज से अंग दान के लिए कहा जा सके। हालांकि, मस्तिष्क की मृत्यु की अवधारणा अभी भी लोगों को भ्रमित करती है और ऐसे में इसके प्रति जागरूकता की कमी के कारण यह यथास्थिति बनी हुई है।

मस्तिष्क मृत्यु वाले लोगों के अंग काम आ सकते हैं

लोग मस्तिष्क की मृत्यु की अवधारणा से अनजान हैं जिसमें एक व्यक्ति सिर की चोट या स्ट्रोक के कारण अपरिवर्तनीय मस्तिष्क क्षति से ग्रस्त है लेकिन अन्य अंग सही तरीके से काम करते रहते हैं। भारत में, लगभग 1.5 लाख लोग प्रतिवर्ष घातक सड़क दुर्घटनाओं से पीड़ित होते हैं, जिनमें से कई लोगों की मस्तिष्‍क मृत्‍यु (ब्रेन डेड) हो जाती है और ऐसे लोग अन्‍य अंगदान करने के लिए अंगदाता बन सकते हैं। यहां तक कि अगर मस्तिष्क की इन मौतों का आधा हिस्सा भी अंग दान में बदल जाता है, तो कई लोगों की जान बचाई जा सकती है। हालांकि, अभी भी दिल की धड़कन के साथ, अंग पुनर्प्राप्ति के लिए शरीर को दान करने के लिए परिवार को समझाना बहुत मुश्किल काम हो जाता है।

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ब्रेन डेड के बारे में फैलानी चाहिए जागरूकता

न केवल मस्तिष्क मृत्यु की अवधारणा के बारे में लोगों को शिक्षित करने के लिए अभियान शुरू करने की सख्त आवश्यकता है साथ ही इस अपरिवर्तनीय घटना से दूसरों को जीवन प्रदान करने के लिए प्रेरित करने की भी आवश्‍यकता है, इसके लिए अधिक प्रशिक्षित प्रत्यारोपण समन्वयकों, परामर्शदाताओं और सुविधाओं का होना भी आवश्यक है। एक ऑर्गन डोनर (अंग दाता) दिल, दो फेफड़े, अग्न्याशय (पैंक्रीयाज), दो गुर्दे (किडनी) और आंत (इंटेस्‍टाइन) दान करके आठ लोगों के जीवन को बचा सकता है।

क्या हम 'ऑप्ट आउट' प्रणाली पर विचार कर सकते हैं?

जैसा कि ऊपर हम कई पश्चिमी देशों की चर्चा कर चुके हैं, स्‍पेन में अंग दान की एक ऑप्ट आउट सिस्‍टम है, जिसके तहत प्रत्येक नागरिक को एक अंग दाता माना जाता है जब तक कि वे 'ऑप्ट आउट' को स्‍वीकार न करें और अंगों को न दान करने के निर्णय को स्‍वीकार करें। इंग्लैंड इस दृष्टिकोण को अपनाने वाला नवीनतम देश है। मांग और आपूर्ति के बीच असमानता को भरने के लिए संघर्षरत देश के रूप में, भारत को मृतक दाताओं की दर में सुधार के लिए अंग दान की 'ऑप्ट आउट' प्रणाली पर भी विचार करना चाहिए। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि अशिक्षा के उच्च स्तर और जागरूकता की कमी वाले देश के रूप में, भारत शायद अभी तक 'ऑप्ट आउट' प्रणाली में स्थानांतरित होने के लिए तैयार नहीं है। यह तर्क विशेष रूप से इस तथ्य को ध्यान में रखता है कि धार्मिक मान्यताएं मृतकों के साथ भी जुड़ी हुई हैं। कुछ समुदायों की धार्मिक मान्यताएं भी पोस्टमार्टम को भी मानव शरीर का अपवित्र होना मानती हैं। अंग दान से जुड़े कई मिथक भी हैं। और कुछ समुदायों का मानना है कि यह उनकी धार्मिक मान्यताओं के खिलाफ है।

निष्पक्ष तौर पर, कोई भी पहल तब तक सफल नहीं हो सकती जब तक कि जनता के बीच पर्याप्त जागरूकता न हो। प्रभावशाली लोगों जैसे कि लोकप्रिय हस्तियों, खिलाड़ियों और धर्म गुरुओं को जागरूकता अभियानों में शामिल करना बहुत महत्वपूर्ण है।

यह लेख डॉ. धर्मिंदर नागर, एमडी, पारस हेल्थकेयर से बातचीत पर आधारित है।

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