खतरनाक रोग है काला अजार, जानें इसके कारण, लक्षण और उपचार

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
May 09, 2018
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काला अजार एक घातक संक्रमण है जो एक परजीवी के कारण होता है। कीट के काटने से यह एक व्यक्ति से दूसरे में फैल जाता है। सार्वजनिक स्वास्थ्य संगठनों की माने तो भारत में काला अजार के मरीजों की संख्‍या काफी ज्‍यादा है। भारत समेत यह हमारे पडोसी देशों जैसे- बांग्लादेश और नेपाल के कई हिस्सों में पाया जाता है। यह बीमारी ऐसे तबके पर ज्‍यादा आक्रमण करती है जो गरीब होते हैं और अधिकतर ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले होते हैं।

काला अजार (वी एल) के लक्षण

  • इसके विशिष्ट नैदानिक लक्षण लंबे समय तक रहते हैं जिनमें अनियमित रूप से बुखार आता जाता रहता हैं। लेकिन ऐसा जरुरी नहीं कि किसी प्रकार की कठोरता या ठंड लगने जैसे लक्षण दिखे। 
  • इसके अन्य लक्षणों में एस्प्लेनोमेगले, लीम्फाडिनोपेथी, हेपाटोमेगले और प्रगतिशील एनीमिया हैं। 
  • ऐसे में कुछ रोगियों का वजन कम हो सकता है तथा हाइपरगामाग्लोब्युलिनेमिया के साथ हाइपोअल्ब्युनेमिया हो सकता है। 
  • इस बीमारी में भूख, पीलापन और वजन घटाने के कारण कमजोरी आती हैं। 
  • सूखी त्वचा, पतला होना, बालों का गिरना। 
  • इस बीमारी में पैर, पेट, चेहरे और हाथ की त्वचा का रंग हल्का हो जाता हैं। इसलिए इसे काला अजार यानी "ब्लैक बुखार" कहते है।
  • इस बीमारी में रक्ताल्पता की भी समस्‍या आती है। 
  • कुछ रोगियों को अन्य दूसरी बीमारियों के साथ काला अजार भी हो जाता है। ऐसी स्थिति में काला अजार को पहचान पाना और भी मुश्किल हो जाता है।
  • बच्चों को काला अजार अधिक प्रभावित करता हैं क्योंकि उनमें संक्रमण से लड़ने के लिए प्रतिरक्षा क्षमता कम होती है रोग हर कोई है। 
  • अगर सही समय पर इसका इलाज नहीं किया गया तो इस बीमारी से मरीज की जान भी जा सकती है। काला अजार को अक्सर लोग मलेरिया, टाइफाइड या तपेदिक समझने की भूल कर बैठते हैं क्योंकि इनके लक्षण और बाकी रोगों के लक्षण लगभग एक जैसे होते हैं।

काला आजार के कारण

  • काला अजार या आंत लीशमनियासिस एक घातक संक्रमण होता है जो परजीवी प्रोटोजोआ लीशमनिया डोनोवनी के कारण होता है।  यह एक संक्रमित व्यक्ति से, संक्रमित स्त्री जाति की सेंड   मक्खी के काटने से,  दूसरे स्वस्थ व्यक्ति में फ़ैल सकता है  जिसका नाम   फ्लेबोटोमस अर्जेन्तिप्स है।  सेंड मक्खी  परजीवी जब किसी संक्रमित व्यक्ति के रक्त पर बैठती है तो वह भी संक्रमित हो जाती है और जब वह किसी स्वस्थ व्यक्ति को काटती है तो उस व्यक्ति को भी ये बीमारी लग जाती है।
  • एल डोनोवनी के भारत में कारण आंत का (वीएल) लीशमनियासिस या भारत और पूर्वी अफ्रीका में काला अजार का कारण बनता है।
  • एल तरोपिका , क्युतेनिअस लीशमनियासिस (सीएल) का  कारण बनता है।

काला आजार से बचाव

  • पेर्मेथ्रिन जैसे कीटनाशकों का प्रयोग करके वेक्टर पर नियंत्रण पाया जा सकता है या ऐसे उपायों से उसे रोका जा सकता है। पेर्मेथ्रिन यक्त कपडे अथवा मच्छरदानी या पर्दे या कीटनाशक पेंट से इस  रोग के संचरण को रोकने में मदद मिल सकती है।  कालाजार की रोकथाम के लिए राष्ट्रीय स्तर इन उपकरणों के उपयोग और उत्पादन को  प्रोत्साहित किया जा रहा है।
  • प्रारंभिक और शीघ्र निदान तथा इलाज से इस रोग को बढ़ने एवं फैलने से रोका जा सकता है जिससे रुग्णता और मृत्यु दर कम हो सकती है।  इसके अलावा परजीवी के द्वारा इस रोग के फैलने और बढ़ने का खतरा भी कम हो जायेगा।
  • जिन क्षेत्रों में कालाजार फैला हुआ हो या फैलने की आशंका हो उन भागों में स्वास्थ्य सम्बन्धी शिक्षा एवं जागरूकता फ़ैलाने की जरुरत है साथ हीं उन क्षेत्रों में काम करने वाले चिकित्सकों को भी इन मामलों के बारे में पूरी तरह से सजग रहने को जागरूक करना होगा और उन्हें इस रोग की  चिकित्सा एवं उचित इलाज के बारे में नया नया ज्ञान देना होगा।

देश के किस हिस्से में यह समस्या सबसे अधिक है?

  • पूरे विश्व में (लगभग 88 देशों में रहने वाले लोगो में) तकरीबन 350 मिलियन लोगों में काला अजार होने का जोखिम है और अनुमानतः पांच लाख लोग इस जानलेवा बीमारी से ग्रसित हैं। यह रोग दक्षिण पूर्व एशिया क्षेत्र में बहुत आम है और लगभग 200 मिलियन लोगों के इसकी चपेट में आने का खतरा है। भारत में लगभग 165 मिलियन लोगों को काला अजार होने का जोखिम है। यहां में हर साल काला अजार 
  • के लगभग एक लाख मामले प्रकाश में आते हैं जिनमें से लगभग 200 रोगी मौत के मुंह में चले जाते हैं। लेकिन यह तो सिर्फ उन मामलों की बात की जा रही है जो प्रकाश में आते हैं। बहुत से ऐसे भी मामले होते हैं जो सामने नहीं आते। भारत में काला अजार के अधिकांश मामले बिहार में होते हैं (सभी मामलों का 90 प्रतिशत)। भारत के दूसरे राज्य जहां यह आम बात है वे हैं पश्चिम बंगाल, झारखंड और उत्तर प्रदेश।
  • एचआईवी/एड्स के मरीजों को कालाजार होने का बहुत ज्यादा जोखिम रहता है। क्योंकि उनकी प्रतिरक्षा प्रणाली पहले से ही कमजोर रहती हैं।

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