आपकी फिटनेस के लिए रूकावट हैं ये 7 स्पीड ब्रेकर्स

By  ,  सखी
Sep 15, 2017
Quick Bites

  • कई बार गलत धारणाएं फिटनेस की राह में बाधक भी बनती हैं
  • सही रिजल्ट नहीं आता तो वर्कआउट में बदलाव करें
  • वर्कआउट के प्रति हरेक के शरीर की प्रतिक्रिया अलग हो सकती है

फिटनेस का अर्थ महज वजन कम करना नहीं है। इसका मतलब है हमेशा चुस्त-दुरुस्त और ऊर्जावान बने रहना। कई बार घंटों पसीना बहाने के बाद भी सही नतीजे नहीं मिलते तो कभी थोड़ी सी मेहनत से भी बेहतर परिणाम मिल जाते हैं। जानें फिटनेस की राह में क्या गलतियां करते हैं लोग और हेल्दी रहने के लिए किन धारणाओं से बचना जरूरी है। भारतीय स्त्रियां सेहत और फिटनेस को लेकर जागरूक हो रही हैं लेकिन कई बार गलत धारणाएं फिटनेस की राह में बाधक भी बनती हैं। जानें वे कौन सी गलतियां हैं, जो आमतौर पर हो जाती हैं।

वॉर्मअप-स्ट्रेचिंग न करना

एक्सरसाइज से पहले और बाद में वॉर्मअप और स्ट्रेचिंग न करना फिटनेस की राह में बड़ी रुकावट है। लोगों को लगता है कि वॉर्मअप के लिए ब्रिस्क जॉग और थोड़ी सी स्ट्रेचिंग काफी है लेकिन ऐसा नहीं है। जब तक शरीर सही ढंग से वॉर्मअप नहीं होगा, मसल्स उस खास एक्सरसाइज के लिए तैयार नहीं हो सकेंगी। ऐसा न करने से मसल्स पेन, पुल या मसल टियर जैसी समस्याएं हो सकती हैं। वर्कआउट के बाद भी स्ट्रेचिंग जरूरी है। यह जरूरी है कि एक्सरसाइज के बाद रिलैक्स्ड मोड में लौटें। मसल्स ग्रुप जैसे थाइज, हिप, चेस्ट, शोल्डर और एंकल को स्ट्रेच करने से रक्त संचार सुचारु होता है।

उबाऊ रूटीन

रोज एक ही ट्रैक पर वॉक या जॉग करना नीरस हो सकता है। व्यायाम तभी $फायदेमंद हो सकता है, जब उसमें मजा आए। शरीर वर्कआउट रूटीन को जल्दी ग्रहण करता है। कोई नया वर्कआउट शुरू करने पर जल्दी रिजल्ट मिलता है लेकिन जैसे ही शरीर अभ्यस्त होने लगता है, अपेक्षित नतीजे नहीं मिल पाते। इसके लिए दो तरी$के अपनाएं। पहला यह कि वर्कआउट बढ़ा दें, अगर किसी एक्सरसाइज का एक सेट कर रहे हैं तो इसे दो सेट में करें। दूसरा यह कि रोज एक जैसे व्यायाम न करें, इनमें बदलाव लाएं।  सामान्य रूप से शरीर को किसी नए बदलाव को ग्रहण करने में 6 से आठ सप्ताह तक लग सकते हैं। बेहतर नतीजे चाहते हैं तो एक्सरसाइज रूटीन को हर दूसरे-तीसरे महीने बदल लें। आउटडोर ऐक्टिविटीज पसंद हों तो हफ्ते के पांच दिन अलग-अलग ऐक्टिविटीज करें। योग, जुंबा, किक बॉक्सिंग और पिलेटीज दिलचस्प एक्सरसाइज हैं, साथ ही इनसे शरीर की अलग-अलग मसल्स को फायदा मिलता है।

धैर्य की कमी

कोई भी फिटनेस रूटीन तुरंत फायदा नहीं पहुंचाता। कम से कम 2-3 महीने इंतजार करना जरूरी है। दो-तीन ह$फ्ते तक सकारात्मक नतीजे नजर न आएं तो निराश न हों। हर किसी का शारीरिक ढांचा अलग होता है। एक चीज किसी के लिए फायदेमंद है तो जरूरी नहीं कि वह दूसरे को भी लाभ पहुंचाएगी। अगर डेढ़-दो महीने बाद तक भी सही रिजल्ट नहीं आता तो वर्कआउट में बदलाव करें।

सिर्फ कार्डियो काफी नहीं

जयादातर स्त्रियां वजन घटाने के लिए ट्रेडमिल एक्सरसाइज पसंद करती हैं। अगर वजन घटाना हो तो शुरुआत में कार्डियो से फायदा मिलता है। यह ट्रेनिंग प्रोग्राम का जरूरी हिस्सा है और हार्ट के लिए भी फायदेमंद है लेकिन वजन घटाने के साथ मसल मास बनाना भी जरूरी है। इससे मेटाबॉलिज्‍म बढ़ता है और शरीर दिन भर में जयादा कैलरीज बर्न करने लायक बन पाता है। केवल कार्डियो बेस्ड एक्सरसाइज करने से कई बार जोड़ों का दर्द शुरू हो जाता है। इसलिए एक संतुलित ट्रेनिंग प्रोग्राम जरूरी है, जिसमें रेजिस्टेंस ट्रेनिंग, मसल स्ट्रेंथनिंग, योग और स्ट्रेचिंग शामिल हो। इनमें से कोई भी जरूरी चीज मिस हो जाए तो फिर नतीजा बेहतर नहीं हो सकता। इसलिए रोज शरीर के अलग-अलग  हिस्से के लिए व्यायाम करना जरूरी है।

डाइट घटाना

यह भी गलत धारणा है कि डाइट कम करने से वजन घटेगा। बहुत कम खाने के बजाय संतुलित भोजन पर ध्यान देना चाहिए। कोई भी वर्कआउट करें, उसके साथ हेल्दी डाइट नहीं होगी तो शरीर को लाभ नहीं, नुकसान होगा। इसलिए यह बात ध्यान रखें कि डाइट में सभी पोषक तत्व मौजृद हों। अपनी ऐक्टिविटीज के हिसाब से डाइट प्लैन करें। अगर वर्कआउट कर रहे हैं तो हर दो घंटे में 6 से 9 छोटे मील्स लेना जरूरी है।

एक्सपर्ट की राय न लेना

कितने भी फिटनेस फ्रीक क्यों न हों, कभी न कभी सभी से गलतियां होती हैं। अपने शरीर के हिसाब से एक्सरसाइज या वर्कआउट का चुनाव करने से ही बेहतर परिणाम मिल सकते हैं। बिना एक्सपर्ट या ट्रेनर के वर्कआउट करना वैसे ही है, जैसे बिना डॉक्टर के मेडिकल स्टोर से दवा खरीद लेना। हो सकता है, इससे कभी-कभी फायदा मिल जाए लेकिन कई बार अधिक नुकसान भी हो सकता है। सही ट्रेनर बॉडी टाइप के हिसाब से ब्रीदिंग टेक्नीक्स, पोस्चर और स्ट्रेचिंग का तरीका समझा सकता है।

बॉडी टाइप को न समझना

हर शरीर की संरचना अलग होती है, उसके हिसाब से उसकी जरूरत अलग होती है। इसी तरह वर्कआउट के प्रति हरेक के शरीर की प्रतिक्रिया अलग हो सकती है। उम्र व शारीरिक क्षमता के अनुसार भी एक्सरसाइज में फर्क होता है। यूट्यूब चैनल्स या टीवी से सीख कर एक्सरसाइज ट्राई करना खतरनाक भी साबित हो सकता है। उदाहरण के लिए प्लैंक एक आसान और फायदेमंद वर्कआउट है लेकिन जरूरी नहीं कि इसका लाभ सबको मिले। रीढ़ में समस्या हो तो शरीर को नुकसान भी हो सकता है।
इंदिरा राठौर

 

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