भारत और चीन में दुनिया के एक तिहाई मनोरोगी

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
May 23, 2016

हाल ही में विज्ञान पत्रिका दि लैंसेट में एक अध्ययन प्रकाशिक हुई है जिसके अनुसार दुनिया के एक तिहई मानसिक बीमारी के मरीज भारत और चीन में पाए जाते हैं। अध्ययन के अुसार ये दो देश दुनिया भर के एक तिहाई मानसिक मरीजों का घर है। लेकिन फिर भी कुछ ही मरीजों को इन देशों में चिकित्सीय मदद मिल पाती है। दोनों ही देशों में मानसिक स्वास्थ्य के लिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवाओं के बजट का 1% से भी कम खर्च किया जाता है।

 

और बढ़ेगी मनोरोगियों की संख्या

इस अध्ययन के अनुसार भारत में मनोरोगियों की संख्या और अधिक बढ़ेगी। विशेषतौर पर भारत में यह बोझ आने वाले दशकों में काफी बढ़ने वाला है। एक अनुमान के अनुसार  2025 तक मनो​रोगियों की तादाद एक चौथाई और बढ़ जाएगी। चीन में जन्मदर कम करने के लिए एक बच्चे की सख्त नीति अपनाई गई जिसका स्वाभाविक असर चीन में तेजी से बढ़ती मानसिक बीमारी की रोकथाम पर भी पड़ेगा।

मनोरोगी

 

नहीं है दोनों देश तैयार

अध्ययन के अनुसार इस चुनौती से जूझने के लिए फिलहाल दोनों देश तैयार नहीं है। चीन में केवल 6% मनोरोगियों की उपचार तक पहुंच है। इस शोध के लेखकों में शामिल एमोरी यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर माइकल फिलिप्स कहते हैं, ''चीन के ग्रामीण इलाकों में मानसिक स्वास्थकर्मियों का भारी अभाव है।'' इसी तरह भारत में भी मनोरोगियों को स्वास्थ्य सुविधाएं मिलना मुश्किल है।

भारत और चीन दोनों ने हाल ही में मनोरोगियों से निपटने के लिए कई उपाय किए हैं जो कि हकीकत में अमल नहीं किए जा रहे हैं। लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन के प्रोफेसर विक्रम पटेल कहते हैं, ''ग्रामीण इलाकों में इस तरह के इलाज बिल्कुल नहीं होते।'' शोध में कहा गया है कि दोनों ही देशों में नीतियों और हकीकत के बीच के अंतर को खत्म करने में अभी दशकों लग सकते हैं। रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि दोनों ही देशों में योग या चीनी चिकित्सकीय पद्धति सरीखे पारंपरिक तरीकों को बढ़ावा देकर मानसिक स्वास्थ की चुनौतियों से निपटा जा सकता है।

 

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