आॅफिस के लोगों के साथ करें ऐसा व्यवहार, नहीं होगा स्ट्रेस

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Jul 01, 2018

अपनी हर समस्या के लिए दूसरों को दोषी ठहराने से पहले हमें अपने अंतर्मन के आईने में झांक कर अपनी खामियों को पहचानने की कोशिश करनी चाहिए। अगर हम अपने मन को नियंत्रित करना सीख जाएं तो हमें खुद ही अपने भीतर बदलाव महसूस होगा। जकल लोगों की सामान्य बोलचाल की भाषा में टेंशन, स्ट्रेस और डिप्रेशन जैसे नकारात्मक शब्द बार-बार सुनाई देते हैं। अब सवाल यह उठता है कि क्या हमारी जि़ंदगी में इतना तनाव है? अगर वाकई ऐसी कोई समस्या है तो भी क्या इसे दूर करना असंभव है? आज सभी को अपने आप से यह सवाल ज़रूर पूछना चाहिए कि अपनी सीधी-सादी जि़ंदगी को हम इतना जटिल क्यों बनाते जा रहे हैं? जबकि मन का सुकून पाना सबसे आसान है, इसके लिए केवल नकारात्मक विचारों से दूर रहना ही काफी है। 

डिलीट करें स्ट्रेस को

एक बार किसी वर्कशॉप में लोगों के साथ हमारी बातचीत का विषय था-'हैप्पीनेस एंड वेल बीइंग। उस कार्यक्रम में उपस्थित सभी लोगों ने साथ मिलकर यह निर्णय लिया कि हम सब अपनी डिक्शनरी से 'स्ट्रेस शब्द को हमेशा के लिए बाहर निकालने की कोशिश करेंगे क्योंकि बड़ों को सुनकर आजकल घरों में बच्चे भी यही कहने लगे हैं कि 'मैं बहुत स्ट्रेस में हूं। अगर बेवजह ऐसी नकारात्मक बातें बार-बार दोहराई जाएं तो अंतत: वे सच साबित हो जाती हैं।

भारतीय संस्कृति में मंत्रों की शक्ति को काफी अहमियत दी जाती है। ज़रा सोचिए, वास्तव में मंत्र क्या हैं? अगर सकारात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण किसी शब्द को बार-बार दोहराया जाए तो उसका उच्चारण करने और सुनने वाले लोग बहुत अच्छा महसूस करते हैं। वास्तव में मंत्र हाई एनर्जी वाले ऐसे सकारात्मक शब्द हैं, जिनका बार-बार उच्चारण करने से लोगों का मनोबल बढ़ता है। जिस तरह मंत्रों का हमारे जीवन पर अच्छा असर पड़ता है, उसी तरह तनाव और डिप्रेशन जैसे नकारात्मक शब्दों को भी यदि बार-बार दोहराया जाए तो पूरे वातावरण में नकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।    

कहां हैं क्रोध की जड़ें

बताइए हम क्रोधित क्यों होते हैं? हम सभी के जीवन में कभी न कभी ऐसी स्थिति ज़रूर आती है, जब हमारी इच्छाएं ज्य़ादा होती हैं लेकिन वे पूरी नहीं पातीं। दूसरी स्थिति यह भी होती है, जब कभी हमारे सामने अनचाही स्थितियां और लोग आ जाते हैं तो उन्हें देखते ही हमें झल्लाहट महसूस होने लगती है। यहां आपको खुद से यह सवाल पूछना चाहिए कि क्या यह कभी संभव है कि हमेशा सभी स्थितियां और लोग एक समान हों? थोड़ी देर के लिए दूसरों को भूल जाइए और अपने बच्चों के बारे में सोचिए, क्या वे आपकी हर बात मानते हैं? नहीं, न...तो फिर यह समझने वाली बात है कि जब हमारा बच्चा हमारे अनुसार नहीं चल सकता तो हम अपने रिश्तेदारों, पड़ोसियों, दोस्तों और सहकर्मियों से यह उम्मीद कैसे कर सकते हैं कि वे हमारी इच्छा के अनुसार चलेंगे।

अलग-अलग परिवारों से आने वाले ऐसे लोगों के संस्कारों और विचारों में कोई समानता नहीं होती। इसी फर्क  की वजह से हमारे लिए दूसरों के साथ तालमेल बिठाना मुश्किल हो जाता है। व्यक्ति के अच्छे या बुरे संस्कार उसके हर निर्णय को प्रभावित करते हैं। परिवारों में पति-पत्नी के बीच भी वैचारिक मतभेद इसी वजह से होते हैं। ऑफिस में साथ काम करने वाले लोगों के बीच आपसी तालमेल की कमी इसी वजह से पैदा होती है। जब आपको यह बात स्पष्ट रूप से मालूम हो जाती है कि सभी का स्वभाव एक जैसा नहीं हो सकता तो फिर छोटी-छोटी बातों के लिए आपसी विवाद बढ़ा कर अपना कीमती समय, ऊर्जा और मन की शांति नष्ट करने से क्या फायदा? 

संयत रहे व्यवहार

आज हर व्यक्ति अपने भीतर बदलाव लाने के बजाय दूसरे के व्यवहार को नियंत्रित की कोशिश करता है। इससे दूसरे व्यक्ति में कोई बदलाव नहीं आता लेकिन ऐसा करने वाले  व्यक्ति का मन हमेशा तनावग्रस्त रहता है और इसकी वजह से वह धीरे-धीरे डिप्रेशन की गिरफ्त में आने लगता है। उसे इस बात का ज़रा भी अंदाज़ा नहीं होता कि दूसरों के बारे दिन-रात सोच कर वह अपने शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को कितना बड़ा नुकसान पहुंचा रहा है। यहां सभी के लिए यह समझना बहुत ज़रूरी है कि हमें दूसरों के कारण तनावग्रस्त और क्रोधित नहीं होना चाहिए। हमें दूसरों से बहुत ज्य़ादा उम्मीदें भी नहीं रखनी चाहिए क्योंकि जब कोई व्यक्ति हमारी अपेक्षाओं की कसौटी पर खरा नहीं उतरता तो इससे बेवज़ह हमारे मन में गुस्सा और तनाव पैदा होता है।

घर-दफ्तर या पास-पड़ोस कहीं भी अगर कोई व्यक्ति अपने बुरे व्यवहार से आपका मनोबल तोडऩे की कोशिश करता है तो उसके साथ बहस करके अपनी एनर्जी नष्टï करने से बेहतर यही है कि उसकी ऐसी बातों को ग्रहण न करें, इससे उसकी नेगेटिविटी उसी के पास वापस लौट जाती है। याद कीजिए जब कभी गुस्से में आप किसी को डांटते-फटकारते हैं तो ऐसा करके  आप उस व्यक्ति में कोई खास बदलाव नहीं ला पाते। भले हम किसी को एक मिनट के लिए डांटते हैं पर इसके बाद दिन भर हमारा मन अशांत रहता है और हम यह समझ नहीं पाते कि हमें ऐसा क्यों महसूस हो रहा है? दरअसल हमारे द्वारा किया गया हर अच्छा या बुरा कर्म हमारे साथ चलता है। इसके विपरीत यदि हम किसी को प्यार और सम्मान दें तो इससे स्वत: हमारा मन खुश रहता है क्योंकि दूसरों की दुआएं भी हमें ही मिलती हैं।

खुशी का आधार हैं सत्कर्म

हम सब एक-दूसरे के साथ अपने अच्छे या बुरे व्यवहार के माध्यम से जुड़े हैं। यदि आप दिनभर खुश रहना चाहते है तो दूसरों को सम्मान एवं प्यार दीजिए। हमें खुशी पाने के लिए अलग से कुछ भी करने की ज़रूरत नहीं है। अच्छे कर्म ही हमारी खुशी का आधार हैं। यदि आप अपने अंतर्मन के भीतर झांक कर देखें तो आपको खुद ही महसूस होगा कि तनाव कहीं बाहर से नहीं आ रहा बल्कि वह आपके मन के भीतर मौज़ूद है। यदि आप वास्तव में अपनी और आसपास मौज़ूद लोगों की भलाई चाहते हैं तो आपको अपने मन के रिऐक्शन पर ध्यान देना होगा कि दूसरों के किसी भी व्यवहार पर आपकी प्रतिक्रिया $गलत नहीं होनी चाहिए। अपने संतुलित व्यवहार से आसपास मौज़ूद तनावग्रस्त लोगों को भी खुश रहने की कला सिखाना ही हमारे सुखमय जीवन का आधार है। यह बात केवल पारिवारिक ही नहीं बल्कि प्रोफेशनल रिश्तों के मामले में भी समान रूप से लागू होती है। माहौल को सकारात्मक बनाने के लिए सभी को निजी स्तर पर प्रयास करना चाहिए।

अभ्यास है ज़रूरी

सही मायने में अपने भीतर यह बदलाव लाने के लिए कम से कम पंद्रह-बीस दिनों तक योजनाबद्ध ढंग से अभ्यास बहुत ज़रूरी है।  आप एक डायरी में अपने ज़रूरी कार्यों और संतुलित व्यवहार की एक चेक लिस्ट बनाएं। रोज़ाना रात को सोने से पहले उसके माध्यम से अपने हर अच्छे-बुरे व्यवहार का पूरी निरपेक्षता और ईमानदारी से मूल्यांकन करें। साथ ही प्रतिदिन सुबह और रात को सोने से पहले यह बात किसी मंत्र की तरह मन ही मन दोहराएं कि मैं एक स्वस्थ और प्रसन्न व्यक्ति हूं, मेरे शरीर की प्रत्येक कोशिका पॉजि़टिव एनर्जी से भरपूर है। इस अभ्यास से आपके मन में नए उत्साह का संचार होगा, जिससे आप मुश्किल हालात में भी हमेशा खुश रहेंगे। 

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