#MeToo : सेक्शुअल हैरसमेंट से निपटने के लिए अपनाएं एक्सपर्ट की ये टिप्स, नहीं होगी मानसिक घुटन

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Oct 15, 2018
Quick Bites

  • इस कैंपन को एक सकारात्मक बदलाव की तरह देखा जा सकता है।
  • ICC के तहत पीड़ित 3 महीने के अंदर शिकायत दर्ज करवा सकती है। 
  • पुलिस और सरकार को अपराधी की पहचान सबके सामने लानी चाहिए।

बॉलीवुड के दिग्गज कलाकार नाना पाटेकर और तनुश्री दत्ता का विवाद अब उनका आपसी मामला नहीं रह गया है। सोशल मीडिया पर हैशटैग मी-टू (#MeToo) के साथ इस विवाद ने पूरे देश में अपनी पकड़ बना ली है। नतीजा यह है कि इस कैंपेन के तहत कई बड़ी अभिनेत्रियों, पत्रकारों और महिलाओं ने अपने साथ कार्यस्थल पर हुए सेक्शुअल हैरसमेंट की बात कबूली है। सालों साल पहले यौन हिंसा की शिकार बनी महिलाएं और लड़कियां अब चुप्पी तोड़ रही है। महिलाओं का कहना है कि उन्हें काम देने के नाम पर उनके साथ गलत हरकतें की गई हैं। हालांकि इस कैंपन को समाज में एक सकारात्मक बदलाव की तरह देखा जा सकता है कि जो महिलाएं पहले अपने साथ हुईं इस तरह की घटनाओं के बारे में बोलने से डरतीं थीं वे अब खुलकर बोल रही हैं। कई महिलाएं ऐसी भी हैं जो अब भी अपने साथ हुए अत्याचार के खिलाफ खुलकर सामने नहीं आ रही हैं। ऐसी महिलाओं को लगता है कि ऐसा करने से सिर्फ उनकी बदनामी होगी। जिसके चलते वह अंदर ही अंदर मानसिक घुटन की शिकार होती हैं। आज हम फोर्टिस एस्कोर्ट के मनोवैज्ञानिक डॉक्टर पुनीत जैन से बातचीत के दौरान आपको सेक्शुअल हैरसमेंट से निपटने की कुछ आसान टिप्स बता रहे हैं।

महिलाओं का बिगड़ता है स्वास्थ्य

सेक्शुअल हैरसमेंट की शिकार हुई महिलाएं या पीड़ित होने के बावजूद चुप रहने वाली महिलाएं क्रोध, शर्मिंदगी, आत्म-चेतना, नींद आने में मुश्किल और भूख की कमी का शिकार होती हैं। जिसका सीधा असर उनके स्वास्थ्य पर पड़ता है। युवा महिलाओं और स्कूली लड़कियों में यह स्थिति दर्दनाक तनाव विकार का कारण बन सकती है। उदाहरण के लिए, यदि पीड़ित एक छोटी लड़की है तो सेक्शुअल हैरसमेंट के बाद वह न सिर्फ खुद को असुरक्षित महसूस करेगी बल्कि डर की वजह से खुद को कमरे में बंद भी कर सकती है। यह स्थिति लड़कियों के लिए तब और भी ज्यादा भयावह हो जाती है जब स्कूल प्रशासन ऐसे अपराधों को बहुत मामूली समझता है।  जबकि ऐसे जघन्य अपराधों के खिलाफ सख्त कानून होने चाहिए और इन्हें बहुत गंभीरता से लिया जाना चाहिए।

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सामाजिक कलंक और समाज का सामना कैसे करें?

जब भी किसी लड़की के शरीर के साथ उसकी मर्जी के बिना छेड़छाड़ होती है तो उसे इसके खिलाफ खुलकर आवाज उठानी चाहिए। अगर लड़की स्कूल या कॉलेज जाती है तो उसे उसी स्तर पर अपनी बात को रखना चाहिए और अपराधी का चेहरा सबसे सामने लाना चाहिए। इसके साथ ही सरकार को भी पीड़ित को सुरक्षा प्रदान करनी चाहिए। पुलिस और सरकार को भी अपराधी की पहचान को गोपनीय रखने के बजाय उसका चेहरा सबके सामने लाना चाहिए। ताकि एक महिला की आवाज अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणा बन सके।

पीड़ित को सहूलियत कैसे दें?

अगर कोई लड़की सेक्शुअल हैरसमेंट की शिकार हुई है तो उसके अंदर दर्द और असहजता की  फीलिंग आना लाजमी है। पीड़ित के आसपास रहने वाले लोग का फर्ज बनता है कि वह उसके दुख को कम करने के लिए उसके प्रति प्यार और आकर्षण दिखाएं। उसे यह महसूस कराएं कि जो कुछ भी हुआ है उसमें उसकी कोई गलती नहीं है। अगर ऐसा नहीं होता है तो पीड़ित अपने इस दर्द के लिए और पीछे चली जाती है और उसका अंदर बढ़ता रहता है।

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क्या करें जब अपराधी परिवार का सदस्य हो?

अगर किसी लड़की के साथ उसके कोई परिवार का सदस्य गलत हरकत करता है तो उसे झूठी परिवार की इज्जत और खोखले सामाजिक आदर्शों को मानने के बजाय अपराधी के खिलाफ खुलकर शिकायत दर्ज करानी चाहिए। इसके साथ पीड़ित के परिवार वालों को भी उसका साथ देना चाहिए और अपराधी के चेहरे को बेनकाब करना चाहिए।

महिलाओं को अपराध के खिलाफ क्या करना चाहिए?

अगर किसी महिला का यह फील होता है कि वर्कप्लेस में काम के दौरान उसके साथ गलत व्यवहार हो रहा है तो उसे बिना देरी किए अपनी कंपनी के इंटरनल कम्प्लेंट्स कमिटी (ICC) के पास जाकर शिकायत दर्ज करानी चाहिए। पीड़ित 3 महीने के अंदर शिकायत दर्ज करवा सकती है। अगर कंपनी में ICC की व्यवस्था नहीं है तो पीड़ित महिला को लोकल कमिटी के पास जाकर अपनी शिकायत दर्ज करवानी चाहिए। जांच के दौरान यदि पीड़िता आॅफिस आने में असहज महसूस कर रही है तो वह चाहे तो 3 महीने की छुट्टी ले सकती है। सेक्शुअल हैरसमेंट ऐक्ट 2013 के सेक्शन 12 के तहत आॅफिस मेनजमेंट पीड़िता को छुट्टियां लेने से मना नहीं कर सकता है साथ ही उसे पूरी सैलेरी भी मिलेगी।?ले सकती है। इस ऐक्ट के तहत पीड़ित को 3 महीने तक छुट्टियां लेने का अधिकार है। 

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