लाइलाज है मलेरिया का यह जीवाणु

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
May 01, 2013

lailaaj hai malaria ka ye jiwanu

मलेरिया एक खतरनाक बीमारी है और तमाम वैज्ञानिक अनुसंधानों के बावजूद इस पर जीत हासिल नहीं की जा सकी है। इससे भी बड़ी खतरे की बात यह है कि वैज्ञानिकों के सामने मलेरिया का ऐसा परजीवी आया है जिस पर मलेरिया की सबसे कारगर दवा का भी असर नहीं होता।

 

आर्टीमिसिनिन जो मलेरिया की सबसे कारगर दवा है। इस दवा का इस्‍तेमाल पूरी दुनिया में किया जाता है।

 

वैज्ञानिकों ने पश्चिमी कम्‍बोडिया में इस परजीवी की खोज की है। वैज्ञानिकों का कहना है कि मलेरिया के जीवाणुओं की ये प्रजाति दुनिया मे पाई जाने वाली दूसरी प्रजातियों से अनुवांशिक रूप से अलग है।

 

पहली बार इस इलाके में मलेरिया की दवाओं के असर न होने की घटना 2008 में सामने आई थी। इसके बाद से ये समस्या दक्षिण-पूर्व एशिया के दूसरे हिस्सों में भी फैल गई। इस खोज से संबंधित अध्ययन को "नेचर जेनेटिक्स" में प्रकाशित किया गया है।

प्रमुख शोधकर्ता, ऑक्सफोर्ड विश्विद्यालय के डॉक्टर ओलियो मियोतो का कहना है कि पिछले कुछ दशकों में मलेरिया की जो भी सबसे असरदायक दवाइयां हमारे पास थीं वो सब एक के बाद एक बेअसर साबित होती जा रही हैं। मलेरिया के जीवाणुओं में दवाओं के लिए प्रतिरोध विकसित करने की गजब की क्षमता है। लेकिन आर्टीमिसिनिन अभी तक पूरा तो असर कर रही है। ये ऐसा हथियार है जिसे हमें बनाए रखने की जरूरत है।

 

वैज्ञानिकों ने पश्चिमी कंबोडिया को मलेरिया के प्रतिरोधी जीवाणुओं के लिए हॉटस्पॉट घोषित किया है। हालांकि इसके पीछे की वजह अभी तक वैज्ञानिकों को समझ नहीं आई है। वजह क्या है इसे वैज्ञानिक भी नहीं समझ पाए हैं। 1950 के बाद से ही इस इलाके में पाए जाने वाले मलेरिया के परजीवियों ने दवाओं के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर ली थी। अब वैज्ञानिकों को यही डर सता रहा है कि  आर्टीमिसिनिन के साथ भी ऐसा ही होगा।

 

इस दवाई का मच्छरों से होने वाली बीमारियों के खिलाफ़ पूरी दुनिया में इस्तेमाल किया जाता है। दूसरी दवाओं के साथ मिलाकर जब इसकी ख़ुराक मरीजों को दी जाती है तो ये कुछ ही दिनों में संक्रमण को खत्म कर सकती है।

 

आगे के शोध के लिए वैज्ञानिकों ने दुनिया भर में मलेरिया फैलाने वाले 800 प्रकार के जीवाणुओं के जीनोम को जमा किया है। जीनोम जीन के समूह को कहते हैं।

 

डॉक्टर मियोतो का कहना है,“जब हमने कंबोडिया में पाए जाने वाले मच्छरों के डीएनए के साथ इनकी तुलना की तो पता चला कि उन मच्छरों ने एक अलग ही प्रजाति विकसित कर ली है जिसे हमने अभी तक नहीं देखा था।”

 


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