विश्व मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य दिवस : जागरुक रहें स्वस्थ रहें

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Oct 10, 2012

jagruk rahe swastha rahe

काम का बोझ और तेज रफ्तार जिंदगी के साथ कदमताल करने की कोशिशों ने नमन (परिवर्ति‍त नाम) से कहीं कुछ छीन लिया था। टारगेट पूरा करने का दबाव और भीड़ में खुद को बचाए रखने की कवायद में अपने आसपास की जिंदगी से बिल्‍कुल कट गया था नमन। हालात यह हो गयी थी कि परिवार और दोस्‍तों से भी मिलने में उसकी कोई दिलचस्‍पी नहीं रह गयी थी। हालात यहां तक पहुंच गए थे कि उसका निजी जीवन कहीं खो गया था। जरा सा काम भी उसे मुश्किल लगने लगा था। कुल मिलाकर उसकी जिंदगी पटरी से उतर चुकी थी। 




बात जब दफ्तर जाने की होती तो वह बामुश्किल खुद को तैयार कर पाता। अक्‍सर दफ्तर देर से पहुंचता। जरा सा काम भी उसे बो‍झ लगने लगता। अपने साथियों के साथ उसका बर्ताव बेहद खराब हो गया था। ना घूमने का मन करता और न ही किसी से मिलने का। उसकी इस हालत को देखकर एक दोस्‍त ने उसे मनोचिकित्‍सक के पास जाने की सलाह दी। वहीं उसे पहली बार इस बात का अहसास हुआ कि वह अवसाद के लक्षणों से गुजर रहा है। 


[इसे भी पढ़े: डिप्रेशन के लक्षण]


नमन का कहना है कि डॉक्‍टर से मिलने से पहले तक उन्‍हें अपनी इस स्थिति के बारे में अंदाजा नहीं था। उन्‍हें तो इस बात की भनक तक नहीं थी कि हालात कितने गम्‍भीर हो सकते हैं। 'जब डॉक्‍टर ने मुझे बताया कि अधिक अवसाद के चलते कई लोग आत्‍महत्‍या तक कर लेते हैं तो मेरे पांव तले से जमीन खिसक गयी।' मैंने ऊपर वाले का शुक्र अदा किया मैं बच गया। 



मौजूदा दौर में तनाव जिंदगी का अहम हिस्‍सा बन गया है। अवसाद या मानसिक समस्‍याएं आम सी बात हो गयी हैं। लेकिन, परेशानी यह है कि इसे लेकर लोगों के मन में कई पूर्वाग्रह हैं। इसे लेकर जागरुकता का अभाव साफतौर पर नजर आता है। बहुत कम लोग ही अपनी मा‍नसिक परेशानियों को लेकर डॉक्‍टर के पास जाते हैं। अधिक लोग मानसिक समस्‍या को लेकर डॉक्‍टर के पास जाने को 'पागलपन' से जोड़कर इसे सामाजिक रूप से अभिशप्‍त मान लेते हैं। 






हालांकि जानकार यही कहते हैं कि मानसिक बीमारी भी शारीरिक बीमारियों की तरह ही है। इसका इलाज हो सकता है और जरूर किया जाना चाहिए। इसके इलाज का सकारात्‍मक असर शुरू में ही नजर आने लगते हैं। और अगर बीमारी के लक्षणों को नजरअंदाज किया जाए तो गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं। लेकिन, साथ ही चिकित्‍सक यह भी मानते हैं कि इसे लेकर समाज में जागरुकता का होना बहुत जरूरी है। लोगों को इसे सामाजिक कलंक और बुराई नहीं समझना चाहिए। हमारे मानसिक बीमारी से ग्रस्‍त व्‍यक्ति को सामाजिक उपेक्षाओं का सामना करना पड़ता है यह भी ठीक नहीं है। 



जहां तक पश्चिमी देशों की बात है कि वहां इस बीमारी को लेकर लोगों में व्‍यापक जागरुकता है। लोग इस तरह की बीमारियों का इलाज करवाने में शर्म महसूस नहीं करते। साथ ही समाज भी इसे लेकर अधिक गंभीर और जागरुक है। इसी तरह का माहौल हमारे देश में भी होना जरूरी है।



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