
‘मां’ - छोटे से इस शब्द का हर किसी के जीवन में बड़ा महत्व है और एक महिला के लिए मां बनने का सफर उसके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव होता है। इस दौरान शारीरिक और मानसिक बदलावों का दौर उसकी जिंदगी में कई परिवर्तन लाता है। प्रेग्नेंसी के दौर में एनीमिया की कमी, हाइपरटेंशन, जेस्टेशनल डायबिटीज से लेकर शरीर में पानी भरने तक कई परेशानियां महिलाओं को झेलनी पड़ती हैं। महिलाएं अक्सर सोचती हैं कि एक बार डिलीवरी हो जाए, तो शरीर से जुड़ी परेशानियां कम हो जाएंगी, लेकिन डिलीवरी के बाद पोस्टपार्टम डिप्रेशन, ब्रेस्टफीड कराने में दिक्कत से लेकर बाल झड़ने और मोटापे जैसी कई दिक्कतें आने लगती हैं। डॉ. रेनू रैना सहगल से जानते हैं प्रेग्नेंसी के दौरान और बाद में आने वाली आम समस्याएं, जो महिलाओं को आमतौर पर प्रभावित करती हैं।
आमतौर पर प्रेग्नेंसी में जेस्टेशनल डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, एनीमिया, यूरिनेरी ट्रैक्ट इंफेक्शन (UTIs) और स्ट्रेस लेने जैसी समस्याएं ज्यादा देखने को मिलती हैं। अगर इन दिक्कतों को समय रहते मैनेज न किया जाए, तो कई बार जेस्टेशनल डायबिटीज की वजह से शिशु को मोटापे और टाइप 2 डायबिटीज का रिस्क, हाई बीपी के कारण समय से पहले डिलीवरी या जन्म के समय शिशु का वजन कम होने जैसी समस्याएं हो सकती हैं। एनीमिया यानी खून की कमी से मां को थकान और समय से पहले डिलीवरी का रिस्क बढ़ सकता है। स्ट्रेस से रोजमर्रा के व्यवहार में बदलाव देखने को मिलता है।
वैसे देखा जाए तो 60 के दशक में महिलाएं औसतन पांच से ज्यादा बच्चों को जन्म देती थीं, इसलिए कई बार समस्याएं गंभीर हो जाती थीं। हालांकि, साल 2024 तक आते-आते महिलाएं औसतन दो बच्चों को जन्म देने लगी हैं, इसके बावजूद उनकी प्रेग्नेंसी का सफर आज भी मुश्किलों भरा ही है। आइये, एक नजर डालते हैं, इस संदर्भ में दुनिया के साथ भारत के आंकड़ों पर -
चाहे मौजूदा दशक में महिलाओं में बच्चे के जन्मदर का आंकड़ा कम हुआ है, लेकिन यह मानना होगा कि प्रेग्नेंसी का सफर हर मां के लिए ज्यादा मुश्किल हुआ है। नौ महीने के इस सफर को पार करते हुए जब वह एक स्वस्थ बच्चे को अपनी गोद में लेती है, तो खुद को ‘Maa Strong’ महसूस करती है। ओनली माय हेल्थ का ‘Maa Strong’ कैंपेन शुरुआत करने का मकसद है कि किस तरह महिलाओं ने प्रेग्नेंसी से लेकर मां बनने और इसके बाद के सफर को मजबूती से तय किया है। इसी कड़ी में हम 9 ऐसी मांओं की कहानी लेकर आए हैं, जिन्होंने अपनी प्रेग्नेंसी में या फिर डिलीवरी के बाद आने वाली सभी चुनौतियों का सामना हिम्मत और हौसले से किया है।
गाजियाबाद की रहने वाली 29 साल की नेहा गोयल की प्रेग्नेंसी बहुत ज्यादा दिक्कत वाली थी। कभी बहुत ज्यादा उल्टियों ने परेशान किया, तो कभी शरीर में किसी न किसी पोषक तत्व की कमी रही। हर बार अल्ट्रासाउंड होने पर डॉक्टर किसी न किसी समस्या का जिक्र कर देते थे। लेकिन नेहा को सबसे ज्यादा परेशानी यह थी कि बच्चे की ग्रोथ सही तरीके से नहीं हो रही थी। शुरुआत में तो नेहा काफी डर गई थीं, लेकिन डॉक्टर ने घबराने की बजाय उन्हें घर का संतुलित और पौष्टिक भोजन खाने, डेयरी प्रोडेक्ट जैसे दूध, पनीर, दही लेने की सलाह दी। साथ ही उन्होंने नेहा को डाइट में हरी सब्जियां और प्रोटीन की मात्रा बढ़ाने की सलाह दी। इसका फायदा यह हुआ कि बेटी जब हुई तो उसका वजन 2.5 किलो था, जो कि एक स्वस्थ बच्चे का औसत वजन होता है।
मुम्बई की रहने वाली प्रिया पानवेकर को दूसरी प्रेग्नेंसी में कई परेशानियां हुईं। साल 2022 में प्रिया की दूसरी प्रेग्नेंसी की पहली तिमाही सिर्फ उल्टियों में ही गुजरी। उल्टियां इतनी ज्यादा थीं कि प्रिया को कमजोरी रहने लगी। कई बार उल्टियों के कारण उनका कुछ खाने को भी मन नहीं करता था। दूसरी तिमाही शुरू हुई तो प्रिया को बेहतर महसूस होने लगा और फिर एक दिन उन्हें बुखार आ गया। साल 2022 में कोविड भी चल रहा था, तो कोरोना का टेस्ट कराने पर पता चला कि उन्हें कोविड हो गया था। प्रेग्नेंसी में कोरोना होने के कारण प्रिया ने दवाइयों के साथ अपनी डाइट पर खास ध्यान देना शुरू किया।
लगातार उल्टियां होने और कोविड के कारण मेरे शरीर में कमजोरी आ गई थी। इस कारण मैंने अपनी डाइट पर ध्यान दिया। मैं रोज रात को किशमिश भिगोकर सुबह खाने लगी थी। तला-भुना खाना बिल्कुल बंद कर दिया और रोजाना वॉक शुरू कर दी। मूड स्विंग्स के लिए मैंने ब्रीदिंग एक्सरसाइज की और ये बदलाव करके मुझे प्रेग्नेंसी में काफी फायदा मिला।
31 साल की मनीषा गुप्ता को प्रेग्नेंसी में हाई बीपी की समस्या बहुत ज्यादा थी और इसी के साथ जेस्टेशनल डायबिटीज की भी समस्या उभरकर आ गई। डॉक्टर ने उन्हें बाहर का खाना बिल्कुल मना कर दिया और खाने में नमक कम लेने के साथ फल-सब्जियां खाने की सलाह दी। डॉक्टर ने मनीषा को वॉक करने के लिए भी कहा। मनीषा ने कहा कि उन्होंने डॉक्टर की बताई सलाह पर अमल किया और प्रेग्नेंसी में ही उनके बीपी और डायबिटीज दोनों नार्मल हो गए। आज उनकी बेटी एक साल की है और उन्हें डायबिटीज और बीपी दोनों की ही समस्या नहीं है।
पुणे में टीचर आरती जब दूसरी बार प्रेग्नेंट हुईं, तो उनके पहले सात महीने तो काफी अच्छे रहे थे। दरअसल, आरती को मीठा खाना बहुत पसंद है और प्रेग्नेंसी के दौरान भी आरती ने काफी मीठा खाया। इसका नतीजा यह हुआ कि आरती के शरीर में पानी बढ़ गया। यह सब प्रेग्नेंसी के सातवें महीने में हुआ था, तो उस समय दवाइयां लेना भी सुरक्षित नहीं था। इसलिए डॉक्टर ने आरती को डाइट और लाइफस्टाइल में बदलाव करने की सलाह दी।
अगर शरीर में पानी ज्यादा बढ़ जाता, तो वॉटर बैग जल्दी फटने का डर था। इसलिए डॉक्टर ने मुझे सबसे पहले डाइट में शुगर बिल्कुल कम करने को कहा और दालें ज्यादा खाने की सलाह दी। इसके अलावा, मैंने सुबह और शाम वॉक की ताकि शरीर में जमा पानी कम हो सके।
दिल्ली की रहने वाली 29 साल की सृष्टि उज्जैनवाल का पहला मिसकैरेज होने के बाद जब वह दोबारा प्रेग्नेंट हुईं, तो उन्होंने बहुत एतिहयात बरती। हालांकि उनकी पूरी प्रेग्नेंसी काफी दिक्कतों भरी थी, लेकिन प्रेग्नेंसी की दूसरी तिमाही में सृष्टि को अचानक नाक में दर्द शुरू हो गया। यह दर्द इतना ज्यादा था कि सृष्टि के लिए सहन करना मुश्किल हो गया था। डॉक्टर ने चेकअप करके बताया कि यह दर्द हार्मोन में बदलाव की वजह से है, जो डिलीवरी के बाद खत्म हो जाएगा, लेकिन दर्द डिलीवरी के बाद भी रहा। सृष्टि ने कई डॉक्टरों से इलाज कराया और अंत में दर्द चला गया।
जो परेशानियां इन महिलाओं को हुई हैं, आमतौर पर किसी न किसी महिला को ये समस्याएं प्रेग्नेंसी के दौरान होती ही हैं। इन दिक्कतों के पीछे फैमिली हिस्ट्री, लाइफस्टाइल या फिर हार्मोन जैसे कारण शामिल हो सकते हैं। इनके पीछे के कारणों की खास वजह डॉक्टर से जानते हैं ताकि महिलाएं इन चुनौतियों को बेहतर ढंग से समझकर उसका समाधान तलाश सकें।
नेशनल हेल्थ मिशन (NHM) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में जेस्टेशनल डायबिटीज होने की दर 10 से 14 फीसदी है, जो किसी भी उच्च आय वाले देश की तुलना में काफी ज्यादा है।
नई दिल्ली के क्लाउडनाइन ग्रुप ऑफ हॉस्पिटल्स के स्त्रीरोग विभाग की सीनियर कंसल्टेंट डॉ. साधना सिंघल विश्नोई ने बताया कि प्रेग्नेंसी में हाई ब्लड प्रेशर होने की स्थिति को जेस्टेशनल हाइपरटेंशन कहते हैं, जो आमतौर पर गर्भावस्था के 20वें हफ्ते के बाद शुरू होती है। यदि इसका समय पर इलाज न किया जाए, तो यह प्री-एक्लेम्पसिया जैसी गंभीर स्थिति में बदल सकता है। हाई बीपी होने के मुख्य कारण हैं -
डॉ. साधना विश्नोई ने बताया कि जेस्टेशनल डायबिटीज एक ऐसी स्थिति है जिसमें प्रेग्नेंसी के दौरान पहली बार महिला के ब्लड शुगर का स्तर सामान्य से अधिक हो जाता है। यह स्थिति आमतौर पर गर्भावस्था के दूसरे या तीसरे तिमाही में होती है। इसके कई कारण हैं -
महिलाओं को आमतौर पर प्रेग्नेंसी की पहली तिमाही में मतली और उल्टियां होती हैं। इसकी वजह बताते हुए सर्वोदय अस्पताल की स्त्रीरोग विशेषज्ञ डॉ. निधि शर्मा कहती हैं, “प्रेग्नेंसी में हो रही मतली या उल्टी को मॉर्निंग सिकनेस कहते हैं। इस दौरान एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टरोन हार्मोन्स में बढ़ोतरी होने के कारण पाचन तंत्र पर इसका असर पड़ता है। पाचन तंत्र धीमा होने से उल्टी या मतली महसूस होती है। उल्टियां ज्यादा होने की वजह से महिलाएं खाना पीना कम कर देती हैं। इससे उल्टियां और ज्यादा बढ़ जाती है और उन्हें डिहाइड्रेशन हो जाता है।"
डॉ. मुक्ति हरणे पैठंकर कहती हैं, “कई महिलाओं को तीसरी तिमाही में नाक में दर्द होता है। इस दौरान नाक में कंजेशन और नाक के इस दर्द को प्रेग्नेंसी राइनाइटिस कहते हैं। इस स्थिति में नाक की म्यूकस मेम्ब्रेन में सूजन होने के कारण नाक बंद, छींकें या जुकाम लग जाता है। यह दिक्कत महिलाओं को प्रेग्नेंसी की दूसरी-तीसरी तिमाही में होती है, जो डिलीवरी के कुछ हफ्तों तक बनी रहती है। इसकी वजह हार्मोनल बदलाव है। प्रेग्नेंसी के समय एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टरोन हार्मोन बहुत ज्यादा बढ़ जाते हैं और इस वजह से नाक में सूजन हो जाती है।”
डिलीवरी के बाद चौथी तिमाही शुरू होती है। इस दौरान मां में शारीरिक, मानसिक और इमोशनल कई तरह के बदलाव देखने को मिलते हैं। आमतौर पर बच्चा होने पर सभी का ध्यान शिशु की देखभाल पर ज्यादा रहता है और मां की रिकवरी अनदेखी हो जाती है। पोस्टपार्टम डिप्रेशन का यह कारण भी हो सकता है। पोस्टपार्टम डिप्रेशन शिशु के जन्म के दो से आठ हफ्ते के बाद महिलाओं को महसूस होता है। इसके कई कारण हैं, जिसे डॉ. गुरप्रीत बत्रा ने विस्तार से बताया है।
बेंगलुरु में जॉब करने वाली पल्लवी जैन से जब प्रेग्नेंसी से जुड़ी बात की गई, तो उन्होंने बताया कि पोस्टपार्टम डिप्रेशन से वह काफी परेशान रहीं। ब्रेस्टफीड कराने में दिक्कत, बाल झड़ना, सर्जरी के कारण शरीर में दर्द के चलते पल्लवी सारा दिन रोती रहती थीं। बच्ची की देखभाल में सारा दिन निकल जाने के कारण उन्हें अपने लिए समय ही नहीं मिल पाता था। कई दिनों तक रोने और परेशान होने के बाद उन्होंने अपनी इस दिक्कत को समझना शुरू किया, तो पता चला कि वह पोस्टपार्टम डिप्रेशन से गुजर रही थीं।
डिलीवरी के बाद महिलाएं सारा दिन अपने बच्चे की देखभाल में लगा देती हैं और अपने इस मानसिक बदलाव को समझ नहीं पातीं। इससे उनमें स्ट्रेस और चिंता बढ़ती रहती है। अगर किसी महिला को ये लक्षण नजर आएं, तो उसे ध्यान रखना चाहिए कि वह पोस्टपार्टम डिप्रेशन से गुजर रही है। आर्टेमिस अस्पताल की मनोवैज्ञानिक डॉ. दीक्षा कालरा ने पोस्टपार्टम डिप्रेशन के कुछ सामान्य और गंभीर लक्षण बताए हैं।
वनु बंसल का बेटा अभी डेढ़ साल का है। जब वह डिलीवरी के बाद अस्पताल से घर आईं, तो उन्हें लगा कि अब कोई मुश्किल नहीं होगी, लेकिन फिर एक नई परेशानी ने दस्तक दी। दरअसल, कुछ भारतीय घरों की तरह वनु के घर में भी नई मां को बाहर घूमने या निकलने नहीं दिया जाता। फोन का इस्तेमाल करने की मनाही थी। बच्चे को संभालने के लिए भी नैनी के साथ पूरा परिवार था। ऐसे में वनु खुद को अकेला महसूस करने लगीं। कई सालों से नौकरी के चलते वह कभी खाली घर नहीं बैठी थीं, तो ऐसे समय में वह मेंटली परेशान होने लगीं।
कई दिनों तक परेशान रहने के बाद मैंने महसूस किया कि मैं पोस्टपार्टम डिप्रेशन से गुजर रही हूं। जब मैंने समझा कि इस तरह मैं खुद को मानसिक रुप से कमजोर कर रही हूं, तो मैंने इसका समाधान सोचना शुरू किया। मुझे किताबें पढ़ने का शौक था और यही शौक मेरे इस अकेलेपन का साथी बना। मेरे पति ने मुझे सपोर्ट किया। वह मेरे लिए मनपसंद किताबें लेकर आए। किताबों ने मुझे पोस्टपार्टम डिप्रेशन से निकलने में बहुत मदद की। मैं सभी नई मांओं से कहना चाहूंगी कि खाली समय में अपना मनपसंद काम करें। इससे स्ट्रेस कम होता है और खुद को बहुत अच्छा लगता है।
अक्सर घर में अगर एक बड़ा बच्चा हो, तो दूसरे बच्चे की डिलीवरी के बाद मां उसकी देखभाल में इतना व्यस्त हो जाती है कि पहला बच्चा अकेलेपन का शिकार होने लगता है। कुछ ऐसी ही समस्या सूरत की रहने वाली सुरभि मिस्त्री को हो रही थी। उन्हें अपनी बड़ी बेटी की बहुत ज्यादा चिंता थी कि कहीं डिलीवरी के बाद उनकी बेटी अकेला महूसस न करे। उन्हें इस बात का बहुत ज्यादा मेंटल स्ट्रेस था।
कई स्टडीज से पता चलता है कि दूसरा शिशु होने पर पहले बच्चे में स्ट्रेस, नींद पूरी न होना, जलन, दुख या फ्रस्टेशन जैसे इमोशनल बदलाव देखने को मिलते हैं। इसलिए सुरभि का भी अपनी बेटी को लेकर परेशान होना लाजिमी था।
जैसे सुरभि ने अपनी बेटी को प्रेग्नेंसी के दौरान ही समझाना शुरू कर दिया था, वैसे ही पैरेंट्स को अपने बड़े बच्चों को नए मेहमान के बारे में बताना चाहिए। इसके अलावा, हैदराबाद के सिटीजन्स स्पेशलिटी अस्पताल में मनोवैज्ञानिक डॉ. दीप्ति रेड्डी नल्लू ने कुछ खास टिप्स दिए हैं, जो दूसरी बार बन रहे पैरेंट्स को अपनाने चाहिए।
पेशे से न्यूट्रिशनिस्ट इशांका वाही जब खुद पोस्टपार्टम के दौर से गुजर रही थीं, तब उन्होंने जल्द ही इस समस्या को समझ लिया। पोस्टपार्टम जर्नी को बेहतर बनाने के लिए उन्होंने सबसे पहले अपनी डाइट पर ध्यान दिया। डिलीवरी के बाद उन्होंने देसी घी में बने खाने से परहेज किया। चीनी की बजाय खाने में खजूर और शहद का इस्तेमाल किया। डाइट में सूखे मेवे, सीड्स और प्रोटीन की मात्रा बढ़ा दी। इसके अलावा, खाने में बहुत सारी सब्जियों को शामिल किया।
9 महिलाओं की ये कहानियां अलग-अलग जरूर हैं, लेकिन सभी ने पूरे हौसले के साथ अपनी परेशानियों का सामना किया था। इन सभी महिलाओं की जर्नी से पता चलता है कि प्रेग्नेंसी में होने वाले बदलाव सिर्फ 9 महीने के ही नहीं होते, बल्कि ये जीवनभर रहते हैं। डिलीवरी के बाद एक महिला न सिर्फ अपने शरीर और मन को संभालती है, बल्कि बच्चे की भी जिम्मेदारी को भी बखूबी निभाती है। अपने लिए समय निकालकर पोस्टपार्टम जर्नी को आसान बनाया जा सकता है।
इन कहानियों को शेयर करके हम नई मांओं को उनकी सेहत के प्रति जागरूक कराना चाहते हैं और हमारे ‘Maa Strong’ कैंपेन का भी यही मकसद है। इस कैंपेन में प्रेग्नेंसी और डिलीवरी से जुड़ी समस्याओं को महिलाओं के प्रति जागरूक कराना है ताकि उनका मातृत्व का यह सफर आसान हो सके। उम्मीद है कि आप हमारे साथ Maa Strong के इस सफर में जुड़कर इसे और ज्यादा मजबूती देंगे।