ऑटिज्म अवेयरनेस डे: ऑटिज्म वाले बच्चों की देखभाल कैसे करें? जानें एक्सपर्ट की राय

अन्य़ बीमारियांBy Onlymyhealth editorial teamApr 02, 2019

मुग्धा कालरा एक ऐसी मां हैं जिनका बच्चा ऑटिज्म स्पेक्ट्रम का शिकार है। मुग्धा खुद एक ऑटिज्म एक्टिविस्ट हैं और ऑटिज्म के बारे में जागरूता फैलाने का काम कर रही हैं। World Autism Awareness Day यानी विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस पर मुग्धा ने Onlymyhealth.com से खास बातचीज की और बताया कि ऑटिज्म स्पेक्ट्रम वाले बच्चों की देखभाल किस तरह की जानी चाहिए, ताकि वो अपनी जिंदगी में सफल और स्वतंत्र हो सकें।

मुग्धा कहती हैं...

'मेरा बेटा 8 साल का है और वो ऑटिज्म स्पेक्ट्रम में है। ऑटिज्म स्पेक्ट्रम की वजह से उसका मानसिक विकास सामान्य से धीरे है। वो अपनी उम्र के हिसाब से नहीं बोलता है। एक जगह बैठकर कुछ भी करना या पढ़ना उसके लिए बहुत मुश्किल है। शायद इसी वजह से किसी भी चीज में उसका ध्यान नहीं लग पाता है। इसे ही एडीएचडी यानी अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिव डिस्ऑर्डर भी कहा जाता है।'

क्या ऑटिज्म वाले बच्चे सामान्य स्कूलों में जा सकता है?

सच कहूं तो शायद नहीं। मान लीजिए वो बच्चा नॉर्मल स्कूल जैसे सीबीएसई/आईसीएसई में जाए भी, तो एक लेवल के बाद बच्चे से जिस नॉलेज या ज्ञान की उम्मीद की जाती है, उस पर वो खरा नहीं उतरता है। इसीलिए नॉर्मल पढ़ाई की जगह ऐसे बच्चों के लिए स्पेशल एजुकेशन इंस्टीट्यूट हैं। लेकिन ऑटिज्म के बच्चों की पढ़ाई शुरू करने से पहले जरूरी है कि उनको 4 तरह की थेरेपी पहले दी जाए।

  • ऑक्यूपेशनल थेरेपी (जिसमें बच्चों को रोजमर्रा की चीजें सिखाई जाती हैं)
  • स्पीच एंड लैंग्वेज थेरेपी (जिसमें बच्चे को बोलने और भाषा की थेरेपी दी जाती है)
  • बिहैवियरल थेरेपी (बच्चों को सामाजिक व्यवहार और लोगों से मिलने-जुलने की बातें सिखाई जाती हैं)
  • सेंसरी इंटीग्रेशन थेरेपी (बच्चों में संवेदनशीलता बढ़ाने के लिए ये थेरेपी दी जाती है)

ये 4 थेरेपीज किसी भी बच्चे के सीखने की नींव डालती हैं। जांच के बाद जब किसी बच्चे में ऑटिज्म स्पेक्ट्रम की पुष्टि हो जाती है, तो आपके बच्चे का मनोचिकित्सक या थेरेपिस्ट बताएगा कि आपके बच्चे को किस थेरेपी की जरूरत है।

इसे भी पढ़ें:- एडीएचडी सिंड्रोम से प्रभावित बच्चों की कैसे करें देखभाल, जानें एक्सपर्ट की राय

जो बच्चे दूसरे बच्चों से घुलते-मिलते नहीं हैं

अक्सर ऐसा देखा जाता है कि ऐसे बच्चे घुलते-मिलते नहीं है। ऐसे बच्चों को प्ले स्कूल या नर्सरी में डालने से उन्हें अच्छा माहौल मिल जाता है, जहां पर वो लोगों से बातचीत करना और मेलजोल करना सीखें। इसके साथ ही स्पेशल एजुकेशन और थेरेपी की जरूरत भी होती है। जब बच्चा थोड़ा बहुत समझने लगता है, तब उसे ऐसे स्कूल की जरूरत होती है, जो उसके सीखने की स्पीड को समझे और उन लक्षणों को भी समझे, जो ऐसे बच्चों के साथ होते हैं।

ऑटिज्म वाले बच्चों को बनाएं आत्मनिर्भर

आपका लक्ष्य होना चाहिए कि ऑटिज्म के बच्चे को आप ऐसा बनाएं कि उसे किसी काम के लिए किसी दूसरे की जरूरत न हो, यानी वो खुद से सारे जरूरी काम कर सके। इस दौरान यह जरूर ध्यान दें कि उन्हें जिंदगी में किन चीजों की जरूरत है, ताकि उन्हें वो चीजें सिखाई जा सकें, जैसे- जोड़, घटाना, गुणा भाग आदि। ये बेसिक चीजें हैं।

ऑटिज्म वाले बच्चों में होती है खास प्रतिभा

आपको ये देखना चाहिए कि उस बच्चे में क्या कोई हुनर है? अगर वो खुद से किसी चीज में अपनी रूचि दिखा रहा है, तो बहुत अच्छा। नहीं तो आपको खुद उन्हें ऐसे मौके देने चाहिए कि आपको पता चल पाए कि बच्चे का इंटेरेस्ट किसमें है। अक्सर ऐसा देखा जाता है कि जो बच्चे ऑटिज्म का शिकार होते हैं, वो किसी एक चीज में बहुत माहिर होते हैं। ऐसे बच्चों की क्षमता और स्किल अगर उसी दिशा में मोड़ दिया जाए, तो वो अपना मनपसंद काम करते हुए बहुत अच्छी जिंदगी जी सकते हैं और अविश्वसनीय सफलताएं प्राप्त कर सकते हैं।

अंग्रजी में एक कहावत है, "You can not teach a fish to fly" यानी "आप किसी मछली को उड़ना नहीं सिखा सकते हैं"। यही बात ऑटिज्म वाले बच्चों पर भी लागू होती है। यानी आप ऐसे बच्चों से उनकी क्षमता से बहुत अलग चीजों की आशा नहीं कर सकते हैं। अगर आपने उस बच्चे को वो माहौल दिया, जिसमें वो अपनी क्षमता से आगे बढ़ सकता है, तो आपको बेहतर रिजल्ट्स मिलेंगे।

ऐसे अन्य स्टोरीज के लिए डाउनलोड करें: ओनलीमायहेल्थ ऐप

Read More Articles On Autism In Hindi

Disclaimer