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परम्परागत प्रथाओं को किस हद तक माना जाये

Onlymyhealth Editorial Team, Date:2015-01-21
हर देश की तरह ही, हमारे देश में भी शिशुओं की देखभाल से जुड़ी कई परंपराएं प्रचलित हैं। बच्चे की पैदाइश से लेकर उसके थोड़ा बड़ा होने तक उसकी देखभाल के दौरान ऐसे बहुत से तरीके अपनाए जाते हैं, जिनके बारे में हमेशा एक बहस चलती है कि वह बच्चे की सेहत के लिए ठीक है या नहीं। बाल विशेषज्ञों की मानें तो, इन प्रचलित परंपराओं में कुछ ऐसी होती हैं जिनसे शिशुओं को फायदा होता है और उनके विकास में मदद मिलती है। लेकिन, कुछ परंपराएं ऐसी भी होती हैं जो शिशुओं की सेहत और विकास के लिए अच्छी नहीं होती। शिशुओं से प्रचलित परंपराएं कुछ इस प्रकार से हैं: डिलीवरी के बाद 40 दिन तक मां और शिशु को घर से बाहर न जाने देना, नवजात को स्तनपान से पहले शहद, जन्मघुट्टी या कुछ अन्य पेय पदार्थ पिलाना, शिशु की आंखों में काजल लगाना, कान में तेल डालना, नाभि में दवाई लगाना, शिशु की रगड़-रगड़ के तेल मालिश आदि। इन परंपराओं में से कुछ परंपराएं शिशु की सेहत के लिए अच्छी हैं और कुछ बुरी। इन परंपराओं के बारे में अच्छी तरह जान-समझकर ही शिशु की देखभाल की जानी चाहिए।
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