'तारक मेहता का उल्‍टा चश्‍मा' से बच्‍चों को मिलती है ये 5 सीख

तारक मेहता चले गए .... लेकिन उनका 'तारक मेहता का उल्‍टा चश्‍मा' उन्हें हमेशा हर भारतीय के दिल में जिंदा रखेगा जो बच्चों के साथ अभिभावकों को हर दिन कुछ नई बातें सीखाता है।

Gayatree Verma
Written by: Gayatree Verma Published at: Mar 01, 2017

'तारक मेहता का उल्‍टा चश्‍मा'

'तारक मेहता का उल्‍टा चश्‍मा'
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पद्मश्री से सम्मानित तारक मेहता ने मार्च की पहली तारीख को आंखें मूंद लीं। लेकिन उनका 'तारक मेहता का उल्टा चश्मा' पिछले आठ साल से लोगों को हंसाते आ रहा है और आगे भी हंसाते रहेगा। आज के समय में जब मां-बाप और बच्चे साथ में बैठकर टीवी नहीं देख पा रहे थे उस समय तारक मेहता ने हम भारतीयों को ऐसी सीरियल दिया जो हम अपने बच्चों के साथ देख पा रहे हैं और बच्चे उनसे सीख भी ले रहे हैं। इस कारण पिछले आठ साल से 'तारक मेहता का उल्‍टा चश्‍मा' देश का नम्बर वन सीरियल पर जमा हुआ है। आइए आज हम ऐसी 5 सीखों के बारे में बात करते हैं जो हमें और हमारे बच्चों को 'तारक मेहता का उल्‍टा चश्‍मा' से प्राप्त होती है।

मिल-जुलकर काम करना

मिल-जुलकर काम करना
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'तारक मेहता का उल्‍टा चश्‍मा' में एक टप्पू सेना है जो हमेशा एक साथ काम करती है। इस सेना से बच्चे मिल-जुलकर काम करने की सीख ले सकते हैं। कोई भी काम अगर मुश्किल होता है तो उसे टप्पू सेना मिलजुलकर आसान बना देते हैं।

बड़ों की इज्जत करना

बड़ों की इज्जत करना
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सबसे जरूरी चीज जो 'तारक मेहता का उल्‍टा चश्‍मा' से सीखने को मिलती है, वो है - बड़ों की इज्जत करना। जिस तरह से एक एपिसोड में टप्पू सेना परीक्षा में पास होने का सारा श्रेय अपने टीचर आत्माराम भीड़े और उसके बाद अपने अभिभावकों को देते हैं वो पल काफी अतुल्नीय होता है। इज्जत पाना हर किसी की ख्वाहिश है और हर बड़ा चाहता है कि बच्चे उनकी इज्जत करें। इसलिए बच्चों के साथ बैठकर 'तारक मेहता का उल्‍टा चश्‍मा' देखें और खुद ही आप बच्चों में इस गुण को महसूस करने लगेंगे।

ऐसे करें बच्चों की परवरिश

ऐसे करें बच्चों की परवरिश
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आज मां-बाप के पास बच्चों के लिए टाइम नहीं है। बच्चों को अच्छी लाइफ देने के लिए माता-पिता दोनों काम कर रहे हैं। लेकिन इस अच्छी लाइफ ने बच्चों को अकेला कर दिया है। इसका मतलब है कि बच्चों की परवरिश में कहीं न कहीं मां-बाप गलती कर रहे हैं। इस गलती को सुधारने की सीथ 'तारक मेहता का उल्‍टा चश्‍मा' आपको देता है।

समाज की कुरीतियों से लड़ना

समाज की कुरीतियों से लड़ना
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चाहे भूत-पिशाच की घटना हो या कोई जादू-टोना... 'तारक मेहता का उल्‍टा चश्‍मा' में हर तरह की सामाजिक कुरीतियों पर एपीसोड्स बने हुए हैं। इनके बारे में अगर आप अपने बच्चों को समझाने में असमर्थ हैं तो बच्चों के साथ बैठकर ये सीरियल देखें। बच्चे खुद ब खुद इन सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ जागरुक हो जायेंगे।

दादाजी की पिता को डांट

दादाजी की पिता को डांट
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एक चीज जो हमें 'तारक मेहता का उल्‍टा चश्‍मा' सीखाती है वो है- अधेड़ उम्र के बेटे को सबके सामने उसके पिता का डांटना। 'तारक मेहता...' में जेठालाल को उसके पिताजी सबके सामने कभी भी डांट देते हैं और वो उनसे बहुत डरता भी है। ये बात जेठालाल का बेटा टप्पु भी जानता है लेकिन ये कोई बड़ी बात नहीं है। नहीं तो, आज के समय में बच्चों के बड़े हो जाने पर मां-बाप उन्हें अकेले में ही नहीं डांट पाते। क्योंकि इससे उनके ईगो को ठेस पहुंच जाती है जिसके कारण ही आज परिवार छोटे होते जा रहे हैं और दादाजी दूर गांव में रह रहे हैं।

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