एलीवेटर्स में लगे शीशे है सजावट या है साइकोलॉजी इफेक्ट

यह कहने की जरूरत नहीं है कि एलीवेटर यानी लिफ्ट मौजूद समय में एक महत्वपूर्ण आविष्कार है। यह न सिर्फ चंद सेकेंडों में हमें ग्राउंड फ्लोर से पचासवे माले तक पहुंचाता है बल्कि हमारा कीमती समय भी बचाता है।

Meera Roy
Written by: Meera RoyPublished at: Mar 12, 2017

एलिवेटर्स का राज

एलिवेटर्स का राज
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यह कहने की जरूरत नहीं है कि एलीवेटर यानी लिफ्ट मौजूद समय में एक महत्वपूर्ण आविष्कार है। यह न सिर्फ चंद सेकेंडों में हमें ग्राउंड फ्लोर से पचासवे माले तक पहुंचाता है बल्कि हमारा कीमती समय भी बचाता है। इतना ही नहीं लिफ्ट की बदौलत हमें सीढ़ियों पर चलने की जहमत भी उठाने की जरूरत नहीं पड़ती। यह भी सर्वविदित है कि पहले माले से पचास वें माले तक सीढ़ियां चढ़ते चढ़ते किसी भी व्यक्ति की कितनी हालत खराब हो सकती है। अतः लिफ्ट की तमाम किस्म की खासियत है, जिन्हें नजरंदाज नहीं किया जा सकता। बहरहाल सवाल ये नहीं है कि लिफ्ट हमारे लिए जरूरी है या नहीं। सवाल ये है कि आखिर तमाम एलीवेटरों में शीशे क्यों लगाए जाते हैं? क्या कभी आपने इस पर विचार किया है? क्या कभी आपने एलीवेटर में लगे शीशों के पीछे का विज्ञान जानने की कोशिश की है? आइए जानते हैं।

डर से बचाव

डर से बचाव
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दरअसल लिफ्टमें लगे शीशे लगाने के पीछे एक वैज्ञानिक और महत्वपूर्ण सोच है। लोगों को लग सकता है कि यह शीशे सिर्फ और सिर्फ खुद को देखने के लिए, निहारने के लिए है। जबकि ऐसा नहीं है। पहले पहल जब लिफ्ट का आविष्कार हुआ था, उन दिनों लोगों को लिफ्ट में बैठने से डर लगता था। उन्हें लगता था कि कहीं लिफ्ट बीच रास्ते में रुक न जाए या फिर वे लिफ्ट से गिर न जाएं। यही कारण है कि लिफ्ट में शीशे लगाकर उनका ध्यान भटकाने की कोशिश की गई थी। इससे लोग लिफ्ट के अंदर लगे शीशों में खुद को देखने लगे और नीचे गिरने का डर या लिफ्ट के अटकने का डर कम होने लगा।

मनोवैज्ञानिक प्रभाव

मनोवैज्ञानिक प्रभाव
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लिफ्ट में शीशे सिर्फ इस वजह से नहीं लगाए गए कि लोगों को लिफ्ट से गिरने का डर लगता था। इसके पीछे एक और मनोवैज्ञानिक वजह छिपी है। असल में लोगों को लिफ्ट के शुरुआती दिनों में यह भी लगता था कि लिफ्ट धीमी चल रही है। उन्हें लगता था कि वे इससे जल्दी सीढ़ियां चढ़कर जा सकते थे। जबकि विशेषज्ञ इस तथ्य को जानते थे कि ऐसा नहीं है। कोई भी व्यक्ति लिफ्ट से तेज सीढ़ियां नहीं चढ़ सकता। अब सवाल ये उठता था कि आखिर लोग लिफ्ट के धीमे चलने की शिकायत क्यों करने लगे? इस सवाल को मनोवैज्ञानिक स्तर पर सुलझाया गया। लिफ्ट में शीशे लगने से लोगों का ध्यान खुद पर ही होने लगा। इससे वे कब एक माले से दसवें माले तक पहुंच जाते, उन्हें पता ही नहीं चलता।

शीशा महज एक भटकाव

शीशा महज एक भटकाव
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असल में गौर किया जाए तो शीशे महज एक भटकाव के रूप में लगाए गए थे। लेकिन सही मायनों में देखा जाए तो अगर भटकाव के रूप में लिफ्ट में यदि शीशे न लगाए जाते तो इससे न तो लोगों का डर कम होता और न ही वे लिफ्ट में चढ़ने को तरजीह देते। ऐसे में एक ऐसे भटकाव की जरूरत थी जो लोगों के डर को कम करे। साथ ही यह भी समझाए कि उन्हें लिफ्ट के जरिए किसी भी माले  तक जाने में बहुत कम समय लगता है। इसके अलावा लोगों को यह भी फायदा हुआ कि लिफ्ट में लगे शीशे को देख वे अपने बाल संवारने लगे, मेकअप सेट करने लगे।

सर्वेक्षण

सर्वेक्षण
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लिफ्ट में लगे शीशे के बाद लोगों का ध्यान भटका और उन्हें लिफ्ट की स्पीड तेज लगने लगी। इस पर एक अध्ययन किया गया। उस अध्ययन के जरिए इस बात का खुलासा हुआ है कि लोगों ने धड़ल्ले से लिफ्ट का उपयोग किया और उसकी खूबियों को पहचाना।

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