मस्तिष्क के दोनों भागों को सक्रिय करने के तरीके

यह सभी जानते हैं कि हम अपने दिमाग का प्रयोग पूरी तरह से नहीं कर पाते, लेकिन अगर इसके दोनों हिस्‍से सक्रिय हों तो आप और क्रिएटिव बनते हैं, इसे ऐसे सक्रिय करें।

Aditi Singh
Written by: Aditi Singh Published at: Aug 31, 2015

मस्तिष्क की सक्रियता

मस्तिष्क की सक्रियता
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एक अवधारणा रही है कि मनुष्‍य अपने दिमाग का प्रयोग शत-प्रतिशत नहीं कर पाता है। लेकिन ए‍क सिद्धांत की मानें तो मस्तिष्‍क के दो भाग होते हैं, दोनों भाग स्वतंत्र रूप से कार्य करते हैं तथा आपस में लगभग 200 मिलियन नर्व फाइबर्स से जुड़े होते हैं, इसे 'कारपस केलोसम’ नाम से जाना जाता है। इसका मुख्य कार्य है मस्तिष्क के एक भाग से दूसरे भाग को यह कहना है कि वह क्या कर रहा है। मस्तिष्क के ये दोनों भाग देखने में एक-दूसरे के प्रतिबिम्ब लगते हैं, परन्तु उनके कार्यों में काफी अंतर होता है। सामान्‍यतया मस्तिष्‍क के दोनों अंग सक्रिय नहीं होते हैं, इसे सक्रिय करने के लिए ये तरीके आजमायें।

शांत और स्थिर मन

शांत और स्थिर मन
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मस्तिष्क के दांयें और बांयें हिस्सों के बीच सामंजस्य बढ़ाने का एक सबसे अच्छा तरीका यह है कि अगर कोई इंसान अपने स्थूल शरीर को शांत और स्थिर रख सकता है, तो शरीर की निश्चलता की इस स्थिति में मस्तिष्क एक बड़े पैमाने पर जुड़ जाता है। इससे किसी भी चीज को जल्दी और आसानी से सीखा जा सकता है।

सिल्वा ध्यान

सिल्वा ध्यान
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उन्होंने 'सिल्वा ध्यान' विधि का प्रचार किया था। उन्होंने बाएँ हाथ से काम करने वालों को मस्तिष्क के बाएँ हिस्से पर चेतन मन को आँखें बंद करके पहुँचाने और एकाग्रता करने के लिए सचेत किया था। उसी प्रकार जो व्यक्ति दाहिने हाथ से कार्य करते हैं, उन्हें दाहिने मस्तिष्क के भाग पर चेतन मन को केंद्रित करके ध्यान करने की विधि बताई थी जिससे मस्तिष्क के दोनों भाग सक्रिय हो सकें। इस क्रिया से पंद्रह हजार करोड़ न्यूरॉन सक्रिय होते हैं।

प्राणायाम

प्राणायाम
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प्राणायाम करते समय दोनों स्वर (नाक के भाग) चलने स मस्तिष्क के दोनों भागों को प्राणवायु का संचार होने लगता है और ‍मस्तिष्क के दोनों भाग समान रूप से उन्नत होते हैं। प्राणायाम में अनुलोम-विरोम, सूर्यभेदि प्राणायाम, भ्रामरी प्राणायाम एवं उज्जयी प्राणायाम मस्तिष्क के विकास में अत्यधिक मदद करते हैं।

ध्यान के फायदे

ध्यान के फायदे
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ध्यान से मस्तिष्क दोनों के भाग का संपूर्ण विकास होकर तनाव निर्माण करने वाले हार्मोंस कम बनते हैं और उपयुक्त हार्मोन्स जैसे मेलाटोनीन, सायटोसीन, डोपामीन और ऑक्सीटोसिन का अधिक निर्माण होने से क्रियाशीलता, नूतन विचार, समस्याओं का हल, प्रेमभाव, समझने की शक्ति, कार्य करने की इच्छा आदि बढ़ने लगती है। Image Source- Getty

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