श्वसन प्रणाली से जुड़े रोचक तथ्य

सांस लेना जीवन की सबसे महत्वपूर्ण प्रकिया है। सांस लेने के तरीके का हमारे शरीर और आयु पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है।

Rahul Sharma
Written by: Rahul SharmaPublished at: Jan 09, 2014

क्या होता है सांस लेना

क्या होता है सांस लेना
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जब हम सांस लेते हैं तो हवा में मौजूद ऑक्सीजन हमारे फेफेड़ों तक पहुंचती है और फिर खून के संपर्क में आती है। इसके बाद खून इसे अवशोषित कर लेता है और शरीर के सभी अंगों तक पहुंचाता है। खून कार्बन डाईऑक्साइड को भी पूरे शरीर से फेफड़ों में लाता है, जो उच्छवास के साथ फेफड़ों से बाहर निकाल दी जाती है।

बेहतर सांस लेकर बढ़ाएं जीवन

बेहतर सांस लेकर बढ़ाएं जीवन
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सांस लेना जीवन की सबसे महत्वपूर्ण प्रकिया है। लेकिन क्या आपको पता है कि सांसो का हिसाब-किताब रखना आपके लिए कितना फायदेमंद हो सकता है। जी हां सांस लेने की सही प्रक्रिया अपनाकर व सांसों पर पकड़ बनाकर आप अपने तन और मन दोनों को दुरुस्त रख सकते हैं।

पूरी सांस ही नहीं लेते हैं लोग

 पूरी सांस ही नहीं लेते हैं लोग
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इनसान के फेफड़े एक बार में तीन से चार लीटर हवा अन्दर लेने तथा बाहर निकालने तक के लिए बने हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि अधिकतर लोग आधे से एक लीटर हवा ही अन्दर लेते और बाहर निकालते हैं। इसका सीधा सा मतलब है कि हम अपने फेफड़ों की क्षमता का मात्र एक चौथाई ही प्रयोग करते हैं और लगभग तीन चौथाई क्षमता का उपयोग ही नहीं कर पाते हैं।

क्या फरक है इंसानों और जानवरों के सांस लेने में

क्या फरक है इंसानों और जानवरों के सांस लेने में
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एक सामान्य व्यक्ति हर मिनट 15 बार सांस लेता और छोड़ता है। इस तरह पूरे दिन में कोई व्यक्ति लगभग 21,600 बार सांस लेता और छोड़ता है। जबकी कुत्ते एक मिनट में लगभग 60 बार सांस लेते हैं। वहीं हाथी व सांप और कछुए हर मिनट में 2 से 3 बार सांस लेते व छोड़ते हैं। माना जाता है कि जल्दी सांस लेने और छोड़ने की वजह से ही कुत्तों की आयु 10 से 12 साल ही होती है, जबकि कछुआ, हाथी तथा सांप की आयु सीमा लगभग सौ साल या इससे अधिक होती है। इस प्रकार कहीं न कहीं यह साबित होता है सांस लेने के तरीके का संबंध हमारी आयु सीमा व स्वास्थ्य को प्रभावित करता है।

सांसें मन और भावों को भी करती हैं प्रभावित

सांसें मन और भावों को भी करती हैं प्रभावित
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सांस लेने और छोड़ने की क्रिया का हमारे मन और भावों से गहरा संबंध होता है। इसी लिए, डर लगने पर, गुस्सा आने पर व तनाव या कुंठा की स्थिति में सांसें तेज हो जाती हैं। मन में नकारात्मक विचार आने पर भी सांस लेने और छोड़ने की गति तेज हो जाती है। ऐसे में गहरी तथा धीमी श्वसन प्रक्रिया से मन को शांत, स्थिर व एकाग्र किया जा सकता है। योग और प्रणायाम के लाभ इस बात का जीता जागता प्रमाण हैं।

फेफड़ों के बारे में कुछ रोचक तथ्य

फेफड़ों के बारे में कुछ रोचक तथ्य
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दायां फेफड़ा, बायें की तुलना में थोड़ा बड़ा होता है। फेफड़ों को अगर फैला दिया जाए तो इसका सतह क्षेत्र लगभग एक टेनिस कोर्ट के आकार का होता है। फेफड़े में मौजूद केशिकाओं का विस्तार 1,600 किलोमीटर तक हो सकता है।

सांस से जुड़े कुछ रोचक तथ्य

सांस से जुड़े कुछ रोचक तथ्य
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नाक में मौजूद बाल सांस को साफ करने के साथ इन्हें गर्म करने में मदद करते हैं। अभी तक उच्चतम "छींक गति" 165 किमी प्रति घंटे दर्ज है। हम एक दिन में सांस लेने में आधा लीटर तक पानी खो देते हैं। आमतौर पर एक व्यक्ति आराम से सांस लेने पर, एक मिनट के 12 से 15 बार सांस लेता है। पुरुषों की तुलना में बच्चों और महिलाओं में सांस लेने की दर तेज से होता है।

वक्षीय श्वसन क्रिया से होता है फायदा

वक्षीय श्वसन क्रिया से होता है फायदा
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सांस लेने की इस क्रिया में सांस लेते वक्त बवा छाती में ही भरी जाती है। इसके लिए गहरी सांस अन्दर लेकर फेफड़ों को तानवरहित तरीके से जितना अधिक हो सके फुलाया जाता है। ऐसा करने पर पसलियां, गर्दन व हंसली ऊपर की ओर उठ जाती हैं, परंतु पेट व डायफ्राम को बिल्कुल इससे बिल्कुल अछूते रहते हैं। बाद में सांस बाहर निकालते हुए छाती एवं पसलियों को धीरे-धीरे सामान्य कर लिया जाता है। इसके अभ्यास से स्वास्थ्य ठईक रहता है और आयु भी बढ़ती है। लेकिन इसे पांच मिनट से ज्यादा न करें।

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