प्रत्‍युषा बनर्जी की आत्महत्या है मानसिक स्वास्थ्य के प्रति सचेत होने की चेतावनी

धारावाहिक ‘बालिका बधू’ में आनंदी का किरदार निभाने वाली अभिनेत्री प्रत्‍युषा बनर्जी ने आत्महत्‍या कर ली। सफलता की बुलंदियों को छूने के बाद भी आत्‍महत्‍या करना की वजह जो भी हो, लेकिन इससे सभी को सबक मिलता है, आप भी इन बातों पर गौर करें।

Rahul Sharma
Written by: Rahul SharmaPublished at: Apr 08, 2016

मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य के प्रति जागरुकता

मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य के प्रति जागरुकता
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मशहूर धारावाहिक ‘बालिका बधू’ में आनंदी का किरदार निभाने वाली अभिनेत्री प्रत्‍युषा बनर्जी ने आत्महत्‍या कर ली। कथित तौर पर वे अपने रिलेशनशिप को लेकर डिप्रेशन में थीं। ये किसी मशहूर शख्सियत की आत्महत्या का पहला मामला नहीं है, बीते कुछ सालों में ज़िया खांन, शिखा जोशी, सुनंदा पुष्कर और तेलगु एक्टर उदय किरन ने आत्महत्या कर अपने जीवन का दुखद अंत किया। देश और दुनिया में रोज़ न जानें कितने ही लोग डिप्रेशन के चलते आत्महत्या करते हैं, और ये एक साफ इशारा है कि मानसिक स्वास्थ्य के प्रति हमारा लचर स्वभाव समाज के लिये एक बड़ा खतरा बन चुका है। और हमें समय रहते मानसिक स्वास्थ्य के प्रति सचेत होने, जागरूकता लाने व उपयुक्त कदम उठाने की जरूरत है। चलिये विस्तार से जानें कि क्यों प्रत्युशा बेनर्जी आत्महत्या मानसिक स्वास्थ्य के प्रति सचेत होने की हमें एक नई चेतावनी है, और हमें मानसिक स्वास्थ के प्रति क्या जागरूकता लानी है।  Images source : © Getty Images

बदलाव के साथ उठाए जाएं सही कदम

बदलाव के साथ उठाए जाएं सही कदम
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हमारा समाज तेजी से बदल रहा है। संसार में अनेकों समाजों में नाटकीय, आर्थिक व सामाजिक स्तर पर तेजी से बदलाव हो रहे हैं। तेजी से होता विकास, पलायन, बढ़ती हुई आर्थिक असमानता, बेरोजगारी और हिंसा आदि में होती बढोत्तरी के कारण समुदायों का सामाजिक ताना-बाना बदल रहा है। ये सभी कारण खराब मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े हुए हैं। ऐसे में बेहद जरूरी है कि मानसिक स्वास्थय को लेकर भी उपयुक्त कदम उठाए जाएं। समाज में आज भी मानसिक रोगी से भेदभाव होता है, लोग डिप्रेशन के बारे में बात करने से घबराते हैं। ये स्थिति बदलने की जरूरत है, और बदलाव सामजिक स्तर पर लाना बेहद जरूरी है।  Images source : © Getty Images

सामाजिक होने में है फायदा

सामाजिक होने में है फायदा
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ओरेगन हेल्थ एंड साइंस यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं की टीम ने अपने एक अध्ययन में पाया कि जो लोग अपने परिवार और दोस्तों से नियमित रूप से मिलते हैं, उनमें उनमें अकेले रहने व फोन या ई-मेल के जरिए बात करने वाले लोगों के मुकाबले अवसाद के लक्षण कम पाए गए। तो इसका सीधा  मतलब है हमें लोगों से मिलते-जुलते रहना चाहिए। देखिये हालात हमेशा आपके वश में नहीं होते, बुरी घटनाएं कभी भी घट सकती हैं। मगर आप कुछ कारगर कदम उठा सकते हैं, जिससे निराशा की भावना आप पर हावी न हो। तो ये जरूरी है कि हम डिप्रेशन के बारे में बात करें, और इसका उपचार करें और डॉक्टर से इसमें मदद लें। Images source : © Getty Images

इसे भी स्‍वीकार करें

इसे भी स्‍वीकार करें
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दुर्भाग्यवश मानसिक स्वास्थ्य मे कुछ गड़बड़ी होने पर हम उसे आसानी से स्वीकार ही नहीं करते, ना ही उसका इलाज कराने जाते हैं। स्थिति जब बहुत बिगड़ा जाती है तभी मनोचिकित्सक को दिखाया जाता है। आमतौर पर यह छुपाने की पूरी कोशिश होती है कि परिवार का कोई सदस्य मनोचिकित्सा ले रहा है। देखिये हमें और समाज को समझना होगा कि, बुखार या किसी अन्य शारीरिक बीमारी की तरह, डिप्रेशन या मानसिक रोग को भी इलाज की जरूरत होती है। तो इसके बारे में बात करने या इसका उपचार करने में शरमाने या छोटा महसूस करने जैसी कोई बात नहीं होती। Images source : © Getty Images

कैसे करें पहचान

कैसे करें पहचान
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अस्वस्थ मानसिकता की पहचान आमतौर पर आसानी से नहीं होती। ऐसी स्थिति में कोई बहुत सलीके से रहता है तो कोई एकदम फक्कड़, कोई रोमांटिक होता है कोई बेहद शुष्क। कभी किसी बड़े नुकसान की वजह से तो कभी किसी मामूली सी बात पर भी अवसाद हो सकता है। आमतौर पर कुछ दिनों में सब कुछ पहले की तरह सामान्य हो जाता है। लेकिन यदि निराशा और हताशा अधिक दिनों तक रहे, व्यक्ति की कार्य क्षमता घटे, वह किसी भी बात पर रोने पड़े तो यह डिप्रेशन के लक्षण हो सकते हैं। ऐसे में छोटी-छोटी परेशानियां बहुत बड़ी लगने लगती हैं और आत्महत्या के विचार आते हैं, कई लोग तो आत्महत्या की कोशिश भी करते हैं। डिप्रेशन के लक्षण दिखने पर व्यक्ति का इलाज तुरन्त कराना चाहिये। मामूली डिप्रैशन मनोवैज्ञानिक उपचार से भी ठीक हो सकता है, और कभी कभी दवाओं की ज़रूरत भी पड़ सकती है।Images source : © Getty Images

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