गर्भावस्था के दौरान पड़ने वाले कुछ भावनात्मक प्रभाव

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Oct 18, 2013
Quick Bites

  • मानसिक स्वास्थ्य निभाता है गर्भावस्था के दौरान बड़ी भूमिका।
  • खुशी, उदासी और निराशा जैसी भावनाओं का बढ़ जाता है प्रभाव।
  • ज्यादा आराम करने से मिलाती है राहत और सकारात्मकता।
  • समय के साथ बच्चे को लेकर बदलती रहती है गर्भवती स्त्री की भावनाएं।

गर्भावस्‍था के दौरान गर्भवती महिला के जीवन में कई परिवर्तन होते है। इनमें से भावनात्‍मक परिवर्तन भी एक है। गर्भावस्‍था का महिला के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। इस लेख को पढ़ें और इस प्रभावों के बारे में विस्तार से जानें।

Emotions during Pregnancyगर्भावस्था के दौरान ही महिलाओं को इससे सम्बन्धित जटिलताओं के बारे में पता चलता है। इस दौरान उसे कई अहसास पहली बार होते हैं। मानसिक स्वास्थ्य गर्भावस्था के दौरान बड़ी भूमिका निभाता है। क्योंकि इस समय एक महिला बच्चे को जन्म देने वाली होती है। इस दौरान महिला में कई भावनात्मक और शारीरिक परिवर्तन होते है। हालांकि गर्भावस्था की प्रारंभिक समस्याएं थोड़ी जटिल होती है।

 

गर्भावस्था के दौरान भावनात्मक पहलू

गर्भावस्था के दौरान कई तरह की बीमारियों के होने की भी संभावना बनी रहती है। ऐसे में धैर्य से काम लें और इस समय का सुखद अनुभव करें। मानसिक विकार बच्चे के जन्म पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। इसलिए तनाव बिल्कुल ना लें। ऐसे में अगर किसी भी प्रकार की भावनात्मक और शारीरिक परेशानी आए तो अपने डॉक्टर से सलाह जरूर करें।

आमतौर पर गर्भावस्था के दौरान एक महिला कई प्रकार के भावनात्मक पहलूओं से गुजरती है। जैसे खुशी, उदासी और निराशा। कई बार गर्भावस्था के दौरान अवसाद होने की भी संभावना भी बनी रहती है। जो मां और बच्चे दोनों के स्वास्थ के लिए हानिकारक होता है। इसलिए इससे बचने की कोशिश करें।

 

गर्भावस्था में तनाव के कारण

गर्भावस्था के दौरान चिंता और तनाव के अनेक कारण होते हैं। जैसे अपने शिशु के स्वास्थ्य और भविष्य के बारे में चिंता, अगले प्रसव के बारे में या फिर इस बात की चिंता की आप प्रसव के बाद अपने बच्चे और खुद को कैसे संभालेंगी। साथ ही आपको अपनी आर्थिक हालत के बारे में चिंता हो सकती है कि आप अपने बच्चे के साथ जुड़े सारे खर्चों को किस तरह पूरा करेंगी। आपको चिंतित करने वाली बात भले कुछ भी हो, ऐसे अनेक सकारात्मक कदम हैं जो आप इन भावनाओं पर काबू पाने के लिए उठा सकती हैं।

 

जानें सुरक्षित मातृत्व के साथ ही संबंधों को कैसे स्वस्थ बनाया जा सकता है-


•    यदि गर्भवती मां मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ रहती है तो बच्चे पर इसका अच्छा प्रभाव पड़ता है।

•    गर्भ में जैसे-जैसे बच्चे का विकास होता रहता है, वैसे-वैसे गर्भवती मां उसे महसूस करती है। इसके साथ ही गर्भवती स्त्री की भावनाएं बच्चे को लेकर बदलती रहती है।

•    मां बनने जा रही महिला हर पल अपने बच्चे की किलकारियां सुनने के लिए बेचैन रहती है। इतना ही नहीं गर्भस्थ शिशु जब मां को पहली बार पेट में लात मारता है, तो उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहता।

•    गर्भवती मां अकेले में अपने बच्चे से बाते करती है। वह ऐसे बाते करती है जैसे वाकई बच्चा उसे सुन रहा हो, और सही तौर पर गर्भस्थ शिशु पर इसका प्रभाव भी पड़ता है।

•    ऐसे में मां अपने गर्भस्थ शिशु को लेकर बहुत सतर्क हो जाती है। छोटी-छोटी बातों पर चिंता करने लगती है।

•    गर्भवती स्त्री अपने बच्चे की देखभाल में इतना खो जाती है कि उसे किसी और बात की कोई चिंता नहीं रहती।

•    आखिरी समय में गर्भवती महिला इतनी ज्यादा भावुक हो जाती है कि उसे हर समय डिलीवरी होने की कल्पना होती रहती है।

 

इन भावनात्मक प्रभावों से निपटने के लिए यहां हम आपको कुछ उपयोगी और प्राकृतिक सुझाव बता रहे है-



•    हर गर्भवती महिला को गर्भावस्था के दौरान सकारात्मक रवैया अपनाना चाहिए, जिससे उसका होने वाला शिशु स्वस्थ रहे।

•    ज्यादा से ज्यादा आराम करने की कोशिश करें।

•    बाहर घूमने जाएं। दोस्तों से मिले, बाते करें।

•    अपने साथी के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताने की कोशिश करें।
   
•    अपनी चिंताओं के बारे में बात करें।

•    किसी भी प्रकार की भावनात्मक परेशानी होने पर डॉक्टर से सलाह जरूर करें।
 
•    खाली समय में किताबें पढ़े, गाने सुने।

•    प्रसव के लिए पहले से ही तैयारियां करके रखें।  

•    खुश रहें और अपना ख़याल रखें।

 

अंततः यह कहना गलत न होगा कि गर्भावस्था में महिलाओं के ऊपर पड़ने वाले भावनात्म प्रभाव को ठीक प्रकार से समझना चाहिए और इन्हें सकारात्मक तौर पर लेना चाहिए। ऐसी स्थिति में परिवार, खास तौर पर पती के सहयोग की खास जरूरत और विशेष महत्व होता है।

 

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