वैज्ञानिकों ने खोजी कोरोना के खिलाफ 99% प्रभावी नयी एंटीवायरल थेरेपी

ऑस्ट्रेलिया के ग्रिफ़िन यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने कोरोनावायरस के खिलाफ 99 प्रतिशत प्रभावी एक नई एंटीवायरल थेरेपी की खोज की है।

Prins Bahadur Singh
Written by: Prins Bahadur SinghPublished at: May 20, 2021
वैज्ञानिकों ने खोजी कोरोना के खिलाफ 99% प्रभावी नयी एंटीवायरल थेरेपी

दुनियाभर में कोरोनावायरस (Covid-19) संक्रमण की वजह से हजारों लोगों की मौत प्रतिदिन हो रही है। पूरे विश्व में इस घातक बीमारी के खिलाफ टीकाकरण अभियान चलाया जा रहा है लेकिन इस महामारी को रोकने में अभी भी कुछ खास सफलता नहीं मिली है। एक साल से अधिक समय से चल रहे कोरोनावायरस संक्रमण के खिलाफ पूरी दुनिया के वैज्ञानिक काम कर रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया ग्रिफिथ यूनिवर्सिटी (Griffith University) के वैज्ञानिकों की एक टीम ने इस घातक वायरस के खिलाफ एक एंटीवायरल थेरेपी ईजाद की है जिसके बारे में कहा जा रहा है कि यह वायरस के खिलाफ 99 प्रतिशत तक प्रभावी होगी। वैज्ञानिकों ने यह दावा किया है कि यह एंटीवायरल थेरेपी (Antiviral Therapy) फेफड़ों में मौजूद कोरोनावायरस के संक्रमण को 99 प्रतिशत तक खत्म करने में सफल है। आपको बता दें कि कोरोना का संक्रमण सबसे ज्यादा फेफड़ों को ही अपने चपेट में लेता है। ऑस्ट्रेलियाई वैज्ञानिकों की टीम द्वारा ईजाद की गयी यह नई एंटीवायरल थेरेपी (Antiviral Therapy for Coronavirus) वायरल लोड को कम करने में बेहद प्रभावी बताई जा रही है। 

ग्रिफिथ यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने खोजी एंटीवायरल थेरेपी (Griffith University Scientists Develop Antiviral Therapy)

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ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के वैज्ञानिकों की एक टीम ने ग्रिफ़िथ यूनिवर्सिटी के मेंजीज हेल्थ इंस्टीट्यूट क्वींसलैंड (MHIQ) की तरफ से इस नए एंटीवायरल थेरेपी को विकसित किया है। ह्यूमन ट्रायल होने के बाद इस थेरेपी को कोरोना के खिलाफ एक नए उपचार के रूप में  लिया जा सकता है। इससे पहले कोरोना के इलाज में एंटीवायरल ड्रग्स टैमीफ्लू, ज़ानामिविर और रेमेडिसविर को शामिल किया जा चुका है, ये दवाएं भी इलाज में प्रभावी तरीके से काम करती हैं। लेकिन वैज्ञानिकों द्वारा खोजी गयी यह नयी एंटीवायरल थेरेपी फेफड़ों में 99 प्रतिशत तक कोरोनावायरस के कणों खत्म करने में कारगर बताई जा रही है। यह नयी एंटीवायरल थेरेपी फेफड़ों के अंदर कोरोनावायरस के कणों का पता लगाकर उन्हें नष्ट करने का काम करेगी जिससे शरीर में दोबारा यह वायरस बन नहीं पायेगा।

कैसे काम करती है यह एंटीवायरल थेरेपी? (How this Antiviral Therapy Works)

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ऑस्ट्रेलिया के ग्रिफ़िथ यूनिवर्सिटी के मेंजीज हेल्थ इंस्टीट्यूट क्वींसलैंड की अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों की टीम द्वारा विकसित की गयी यह एंटीवायरल थेरपी जीन साइलेंसिंग आरएनए तकनीक से काम करती है। यह नयी एंटीवायरल थेरेपी वायरस के जीनोम पर सीधे हमला करने के लिए जीन-साइलेंसिंग आरएनए तकनीक का इस्तेमाल करती है। इसमें सीआरएनए के जरिये वायरस को दोबारा बनने से रोका जाता है, साथ ही ग्रिफिथ विश्वविद्यालयद्वारा निर्मित लिपिड नैनोकणों को सीआरएनए को फेफड़ों तक पहुंचाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

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गौरतलब हो जीन साइलेंसिंग आरएनए तकनीक को ऑस्ट्रेलिया में ही सबसे पहले 1990 में विकसित किया गया था। इस तकनीक के माध्यम से सांस से जुड़ी बीमारियों का इलाज करने में सफलता मिली थी। एमएचआईक्यू के शोधकर्ता प्रोफेसर निगेल मैकमिलन ने इस थेरेपी के बारे में जानकारी देते हुए बताया है कि, "इस थेरेपी में siRNA के उपयोग से वायरल लोड को 99.9 प्रतिशत तक कम किया जाता है। नैनोकणों को फेफड़ों की कोशिकाओं और साइलेंस वायरल जीन की एक विस्तृत श्रृंखला तक पहुंचाया जाता है जो वायरस के कणों को नष्ट करने का काम करते हैं।" आपको बता दें कि इस दवा को इंजेक्शन के माध्यम से कोशिकाओं में भेजा जाता है जिसे नैनोपार्टिकल कहा जाता है।

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कोरोनावायरस के सभी स्ट्रेन पर होगी प्रभावी (Effective on Every Strain of Coronavirus)

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वैज्ञानिकों द्वारा खोजी गयी इस एंटीवायरल थेरेपी का सबसे पहले चूहों पर परीक्षण किया गया था। इस परीक्षण के परिणामों को लेकर जर्नल मॉलिक्यूलर थेरेपी में प्रकाशित जानकारी के मुताबिक जब SARS-Cov-2 संक्रमित चूहों में इसका परीक्षण किया गया तो इस थेरेपी के बाद उनके जीवित रहने की संभावना में सुधार देखा गया था। इस नए एंटीवायरल थेरेपी के उपचार के बाद जिन संक्रमित चूहों का इलाज किया गया उनके फेफड़ों में किसी भी प्रकार के वायरस के कण नहीं मिले।

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केविन मॉरिस, सिटी ऑफ़ होप में सेंटर फॉर जीन थेरेपी के प्रोफेसर और एसोसिएट डायरेक्टर के मुताबिक, "यह उपचार सभी बीटा कोरोनावायरस जैसे SARS वायरस (SARS-CoV-1) के साथ-साथ SARS-CoV-2 और भविष्य में उत्पन्न होने वाले किसी भी नए वैरिएंट पर काम करने के लिए डिज़ाइन किया गया है क्योंकि यह अल्ट्रा-संरक्षित वायरस के जीनोम पर काम करता है।" इसके अलावा, शोधकर्ताओं ने यह भी बताया कि नैनोकण 12 महीनों के लिए 4 डिग्री सेल्सियस पर और कमरे के तापमान में एक महीने से अधिक समय तक स्थिर रहते हैं। इसका मतलब है कि इस एजेंट का इस्तेमाल संक्रमित मरीजों के इलाज के लिए बेहद आसानी से किया जा सकता है।

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भविष्य में होने वाले कोरोना संक्रमण के इलाज में भी कर सकते हैं इस्तेमाल (Can be Used to Treat Future Coronavirus Infections)

वैज्ञानिकों के मुताबिक इस नए एंटीवायरल के इलाज के परिणाम बताते हैं कि सीआरएनए-नैनोपार्टिकल फॉर्मूलेशन को कोरोनावायरस (Covid-19) से संक्रमित रोगियों के इलाज के लिए एक चिकित्सा के रूप में विकसित किया जा सकता है। इसके साथ ही इस तकनीक से वायरस के जीनोम को सीधे तौर पर टारगेट करके भविष्य में होने वाले कोरोनावायरस संक्रमण के लिए भी उपयोग किया जा सकता है। प्रोफसर मॉरिस के मुताबिक, "इन नैनोकणों का अधिक मात्रा में उत्पादन स्केलेबल, अपेक्षाकृत कम लागत वाला और प्रभावी है।' प्रोफेसर मैकमिलन ने इस खोज के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि, "इस काम को मेडिकल रिसर्च फ्यूचर्स फंड द्वारा एक तत्काल कॉल के रूप में वित्त पोषित किया गया था और यह आरएनए (RNA) दवा का प्रकार है जिसे ऑस्ट्रेलिया में स्थानीय रूप से निर्मित किया जा सकता है।"

इस्तेमाल से पहले होगी ह्यूमन ट्रायल की जरूरत (Human Clinical Trials Needed Before Use)

हालांकि ऑस्ट्रेलिया के ग्रिफ़िन यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों की टीम ने इस नई एंटीवायरल थेरेपी को लेकर बहुत आशा व्यक्त की है लेकिन इसके इस्तेमाल से पहले इंसानों पर भी इसके क्लीनिकल ट्रायल की आवश्यकता होगी। ग्रिफ़िन यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफेसर पॉल ग्रिफिन ने इस खोज को लेकर कहा कि, "वैज्ञानिकों की टीम द्वारा की गयी यह खोज आशाजनक है। फिलहाल हमारे पास कोरोना के खिलाफ कोई प्रभावी एंटीवायरल थेरेपी नहीं है, इसलिए इस तरह के एक आशाजनक थेरेपी का खोज करना बेहद रोमांचक है।" उन्होंने कहा कि, "मुझे लगता है कि हमें यह ध्यान रखना होगा कि हमें इसके इस्तेमाल से पहले इंसानों पर और फेज 1 के क्लीनिकल ट्रायल को पूरा करना होगा इसके बाद ही इसके प्रभावशाली होने का पता चल पायेगा।"

गौरतलब हो कि यह थेरेपी अभी तह सिर्फ चूहों पर इस्तेमाल की गयी है जिसके परिणामों के आधार पर यह जानकारी दी गयी है। कोरोनावायरस के उपचार के लिए इसके इस्तेमाल से पहले इस थेरेपी का ह्यूमन और फेज 1 का क्लीनिकल ट्रायल किया जाना बाकी है।

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