स्त्री की गोद में मातृत्व का सुख

By  ,  सखी
Feb 04, 2011

स्त्री की गोद में मातृत्व का सुखमां बनना स्त्री के लिए स्वर्गिक अनुभूति से कम नहीं होता। हर स्त्री की आकांक्षा स्वस्थ-चुलबुले और सुंदर बच्चे की मां बनने की होती है। शिशु जन्म की बात यों तो ऊपर-ऊपर भले ही बहुत आसान सी लगती हो लेकिन चिकित्सकीय भाषा में कहें तो किशोरावस्था के दौरान स्त्री-पुरुष के शरीर में होने वाले अनेकानेक परिवर्तनों की अग्नि परीक्षा तभी होती है जब स्त्री गर्भवती होती और शिशु को जन्म देती है। संतान की इच्छुक महिला पति के साथ शारीरिक संपर्क के बावजूद यदि लंबे समय तक गर्भधारण नहीं कर पाती तो यह पति-पत्‍‌नी दोनों के लिए इनफर्टिलिटी की स्थिति हो सकती है। इसे हरगिज नहीं टालना चाहिए क्योंकि हो सकता है कि इसके लिए इलाज की अविलंब आवश्यकता हो।


प्रजननहीनता की जटिल स्थितियों में कृत्रिम गर्भाधान की आवश्यकता होती है। कृत्रिम गर्भाधान के कई तरीके प्रचलित हैं लेकिन इनमें प्रमुख है- आईवीएफ यानी इन विट्रो फर्टिलाइजेशन। आईवीएफ को चिकित्सा विज्ञान के चमत्कारों में से एक माना जाता है। इसके कारण बांझपन या प्रजननहीनता से ग्रस्त कई पति-पत्‍‌नी को मां-बाप बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। आईवीएफ क्या है और किन परिस्थितियों में यह प्रजननहीनता का अकेला जवाब साबित होता है, इनके बारे में जानने के पहले स्त्री-पुरुष के प्रजनन अंगों की कार्यप्रणाली को जानना बेहतर होगा। 

 

स्त्री के प्रजनन अंगों में ओवरी (अंडाशय), फैलोपियन ट्यूब और गर्भाशय प्रमुख होते हैं। हर महीने स्त्री की ओवरी में करीब 20 डिम्ब पैदा होते हैं लेकिन अंतत: मुख्य तौर पर एक डिम्ब ही जीवित रह पाता है। मासिक चक्र के करीब चौदहवें दिन के चार दिन आगे और चार दिन पीछे की अवधि ओव्यूलेशन (डिम्बोत्सर्ग) की होती है। ओव्यूलेशन के दौरान स्त्री की ओवरी से डिम्ब निकलकर फैलोपियन टयूब में पहुंचता है। ओव्यूलेशन की अवधि में यदि स्त्री का पुरुष से संसर्ग हो तो उसके वीर्य में उपस्थित शुक्राणु फैलोपियन टयूब में उपस्थित डिम्ब से मिलते हैं। यहीं उनका तत्काल निषेचन यानी फर्टिलाइजेशन होता है। करीब 48 घंटे बाद निषेचित एम्ब्रियो अर्थात भ्रूण स्त्री के गर्भाशय में पहुंचकर नौ महीने की अवधि में पूर्ण शिशु के रूप में विकसित होता है।  


यहां यह जान लेना बहुत जरूरी है कि स्त्री के डिम्ब बनने और ओवरी से निकलकर पुरुष के शुक्राणु से मिलकर निषेचित होने की प्रक्रिया अत्यंत जटिल होती है। कई प्रकार के स्त्री (एस्ट्रोजन व प्रोजेस्टेरॉन) और पुरुष हार्मोनों (टेस्टेस्टेरॉन) की बदौलत ही स्त्री में स्वस्थ डिम्ब और पुरुष में स्वस्थ शुक्राणुओं का निर्माण होता है। इस पूरे चक्र में ज़रा सी भी चूक या कमी रह जाए तो स्त्री गर्भधारण नहीं कर पाती है। 

 

विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा निर्धारित मानकों के अनुसार, पुरुष के एक मिलीलीटर वीर्य में न्यूनतम 20 मिलियन शुक्राणु होने चाहिए। इन 20 मिलियन शुक्राणुओं में से कम से कम 30 प्रतिशत शुक्राणुओं को खूब गतिशील होना चाहिए ताकि स्त्री के साथ सहवास के दौरान तेजी से लपकते हुए वे डिंब तक पहुंचकर डिंब की कोशिका को भेदकर निषेचन को अंजाम दें। जानना दिलचस्प होगा कि लाखों-लाख शुक्राणु डिंब तक पहुंचने के लिए मैराथन दौड़ लगाते तो हैं लेकिन अंतत: एक ही शुक्राणु डिंब को भेद पाने में सफल हो पाता है। शेष शुक्राणु रास्ते में ही नष्ट हो जाते हैं। 

 

 
विश्व स्वास्थ्य संगठन के उपरोक्त मानकों के मुताबिक यदि प्रति मिली. शुक्राणुओं की संख्या निर्धारित संख्या से कम है अथवा उनकी गतिशीलता कम है तो स्त्री के स्वस्थ डिंब के बावजूद वह गर्भधारण नहीं कर पाती। ठीक इसी तरह, यदि स्त्री का मासिक धर्म अनियमित और स्त्राव ठीक नहीं हो रहा हो तो उसका डिंब अच्छी क्वालिटी का नहीं हो पाता और पुरुष के स्वस्थ-गतिशील शुक्राणुओं के बावजूद निषेचन की प्रक्रिया संपन्न नहीं हो पाती और गर्भधारण में रुकावट की स्थिति को इनफर्टिलिटी या प्रजननहीनता की संज्ञा दी जाती है। ऐसे समय में इनफर्टिलिटी स्पेशलिस्ट को दिखाए जाने की जरूरत होती है।  
कई मामलों में इनफर्टिलिटी जेनेटिक हो सकती है लेकिन अधिकांश मामलों में अप्राकृतिक जीवन शैली, अत्यधिक मद्यपान, धूम्रपान आदि कारणों से शुक्राणुओं की क्वालिटी सबसे अधिक प्रभावित होती है। प्रदूषण, अधिक तनाव, मानसिक अवसाद, क्रोध, कुपोषण और खास प्रकार की दवाएं भी शुक्राणुओं को कमजोर कर देती हैं। इसलिए संतान के इच्छुक पति-पत्‍‌नी के प्रजनन अंगों की स्थिति जानने के लिए पूरी जांच

 

की जाती है। स्त्रियों में मोटापा भी अच्छी क्वालिटी के डिंब नहीं बनने देता। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि असामान्य शुक्राणुओं की वजह से करीब 30 प्रतिशत पुरुषों में इनफर्टिलिटी होती है। करीब 20 प्रतिशत महिलाओं में ऑव्यूलेशन की समस्या होती है जिनका इलाज हार्मोन चिकित्सा से हो जाता है।  
दिल्ली में इंडिया आईवीएफ सेंटर की संस्थापक प्रमुख व विख्यात इनफर्टिलिटी स्पेशलिस्ट डॉ. नीलम सूद कहती हैं कि संतान के इच्छुक पति-पत्‍‌नी की संपूर्ण जांच सबसे पहले जरूरी है ताकि पता चल सके कि गड़बड़ी कहां है और समस्या कितनी गंभीर है। इसके लिए पुरुष के शुक्राणुओं की जांच की जाती है। कम्प्यूटराइज्ड सीमेन एनालिसिस मशीन से जुड़ी हुई अल्ट्रासाउंड मशीन के माध्यम से शुक्राणुओं की वास्तविक स्थिति का पता चल जाता है।  

 

स्त्री की कुछ हार्मोन जांचें, रक्त जांचें, उसके गर्भाशय फैलोनियन टयूब और ओवरी का अल्ट्रासाउंड आदि किया जाता है। डॉ. सूद का कहना है, 'यदि पति-पत्‍‌नी की जांच रिपोर्ट सामान्य हो तो कई मामलों में संतान के इच्छुक युगल की काउंसिलिंग ही काफी कारगर सिद्ध होती है। कुछेक दवाओं की भी जरूरत पड़ सकती है। लेकिन काउंसिलिंग, दवाओं और कुछेक हिदायतों के बावजूद स्त्री गर्भधारण नहीं कर पाती तो पहले आईयूआई यानी इंट्रा यूटेराइन इनसेमिनेशन किया जाता है।' इसके तहत पुरुष के वीर्य को दवाओं से साफ कर स्त्री की योनि के रास्ते सीधे गर्भाशय तक पहुंचा दिया जाता है। जिन मामलों में महिलाओं में सर्वाइकल म्युकस की मोटाई अथवा अंदरूनी संचरनात्मक गड़बड़ी होती है उनमें यह विधि कारगर साबित होती है और स्त्री गर्भधारण कर लेती है। 
लेकिन यदि पुरुष के शुक्राणुओं की क्वालिटी गर्भाधान के उपयुक्त नहीं हो तो किसी दानकर्ता के स्पर्म लेकर स्त्री के गर्भाशय के मुख तक पहुंचाया जाता। इस सिलसिले में स्पर्म बैंक की भी मदद ली जा सकती है। लेकिन डॉ. सूद यहां इस बात पर जोर देती हैं कि यदि पति के शुक्राणु में कमी है और स्त्री को गर्भाधान के लिए किसी अन्य दानकर्ता के शुक्राणु लेने की आवश्यकता है तो निश्चित तौर पर इलाज कराने वाले पति-पत्‍‌नी को डॉक्टर को पूरी तरह विश्वास में लेना चाहिए और आईयूआई से पहले सारी स्थिति स्पष्ट कर देनी चाहिए। दानकर्ता के शुक्राणुओं का इस्तेमाल कर करीब 50 प्रतिशत मामलों में छठी बार में स्त्री को गर्भाधान हो जाता है। लेकिन आईयूआई से भी बात नहीं बनती हो तो डॉ. सूद के अनुसार, आईवीएफ करने की जरूरत पड़ सकती है। यहां ध्यान देना जरूरी है कि गर्भाधान के लिए स्पर्म बैंक से लिए गए स्पर्म पूरी तरह रोगकारी संक्रमणों से मुक्त हों। डॉ. सूद का कहना है कि हमारे केंद्र के स्पर्म बैंक में किसी दानकर्ता से स्पर्म लेने से पूर्व उसके यौन रोगों, एड्स, एचआईवी, टीबी आदि संक्रमणों की अत्यंत सूक्ष्म जांच की जाती है। ऐसा यदि न किया जाए तो भू्रण के साथ-साथ गर्भवती स्त्री के लिए यह जानलेवा साबित हो सकता है। 

 

 स्त्री-पुरुष के डिंब और शुक्राणुओं की कई प्रकार की खामियों की स्थिति में आईवीएफ किया जाता है। इसके लिए सबसे पहले स्त्री-पुरुष के डिंब और शुक्राणुओं के निर्माण की दर को दवाओं की मदद से बढ़ाया जाता है। इन दवाओं से स्त्री के ओव्यूलेशन की दर बढ़ जाती है और एक से अधिक डिंबों का निर्माण होने लगता है। फिर ओव्यूलेशन के दौरान स्त्री की ओवरी से सभी  डिंबों को ट्रांस वैजाइनल स्कैन की मदद से बाहर निकाल लिया जाता है। इन डिंबों को प्रयोगशाला में पुरुष के शुक्राणुओं के साथ निषेचित कराया जाता है। डॉ. सूद कहती हैं कि निषेचित एम्बि्रयो को प्रयोगशाला में शरीर के तापमान पर 'फोर सेल स्टेज' तक पहुंचने तक करीब 48 घंटों तक रखा जाता है। फोर सेल स्टेज वाली एम्ब्रियो को स्त्री के गर्भाशय में योनि के रास्ते पहुंचा दिया जाता है।

 

कई मामलों में पहली बार में ही स्त्री का गर्भाशय इस निषेचित एम्ब्रियो को स्वीकार कर लेता है और भ्रूण शिशु के रूप में पलने लगता है। लेकिन इसके पूर्व स्त्री के गर्भाशय को प्रयोगशाला में निषेचित एम्ब्रियो को स्वीकार करने के योग्य बनाने के लिए खासतौर से तैयार करना होता है और इस प्रक्रिया में प्रजनन अंगों के रोगों का पहले मुकम्मल इलाज किया जाता है। यों तो आईवीएफ के लिए सामान्यत: एक लाख रुपए का खर्च आता है लेकिन पहले ही चक्र में गर्भाधान होने पर डॉ. सूद के मुताबिक 50 हजार रुपए वापस कर दिए जाते हैं। फोर सेल स्टेज की जगह यदि एम्ब्रियो को पांच दिनों में सिक्स्टी फोर स्टेज सेल तक प्रयोगशाला में विकसित कर दिया जाए तो स्त्री के गर्भाधान की संभावना बहुत बढ़ जाती है। इस प्रक्रिया को ब्लास्टोसिस के नाम से जाना जाता है। ब्लास्टोसिस का खर्च करीब 65 हजार रुपए आता है।

 

कई मामलों में देखा गया है कि मासिक चक्र के दौरान पूरी तरह स्त्राव नहीं होने के कारण रक्त का कुछ अंश हर महीने ओवरी में जमा होता जाता है और यह अंतत: चॉकलेट सिस्ट में रूप में तैयार हो जाता है। डॉ. सूद के अनुसार, चॉकलेट सिस्ट ओवरी के आसपास की कोशिकाओं को भी धीरे-धीरे लपेट लेता है और अच्छी क्वालिटी के डिंब का निर्माण तो प्रभावित होता ही है, गर्भाशय की अंदरूनी लाइनिंग भी क्षतिग्रस्त हो जाती है। आईवीएफ के पूर्व यह भी सुनिश्चित कर लेना आवश्यक है कि स्त्री के दोनों फैलोपियन टयूब पूरी तरह खुले और साफ हैं।  
आईवीएफ के दौरान सबसे अधिक आवश्यक है इलाज लेने वाले पति-पत्‍‌नी का डॉक्टर में विश्वास और धैर्य। संतान के इच्छुक युगल की सकारात्मक प्रवृत्ति भी जल्दी गर्भाधान में बहुत बड़ी भूमिका निभाती है। लेकिन डॉ. सूद का कहना है कि आईवीएफ लेने का मन बनाने से पूर्व युगल को दूसरे केंद्रों का भी तुलनात्मक जायजा ले लेना चाहिए। लेकिन आईवीएफ की पूरी प्रक्रिया के दौरान डॉ. सूद के शब्दों में, 'पूरी पारदर्शिता अपरिहार्य है क्योंकि अपनी संतान की चाहत के पीछे भावनात्मकता अधिक काम करती है।

 

यही कारण है कि हम आईवीएफ करने से पूर्व इलाज के लिए आए दंपती को उनके स्पर्म और डिंब को प्रारंभ में दिखाते और प्रयोगशाला में निषेचित करने के दौरान भी कंप्यूटर पर हर गतिविधि से अवगत कराते रहते हैं। उनके शत-प्रतिशत सहमत होने पर ही हम आगे की प्रक्रिया संपन्न करते हैं।' आईवीएफ से जुड़ा एक दिलचस्प तथ्य आप भी जान लीजिए, आखिर क्यों इसे आईवीएफ कहा जाता है? लैटिन भाषा में इन विट्रो का अर्थ होता है- तश्तरी में।

 

चूंकि स्त्री के डिंब और पुरुष के शुक्राणु का निषेचन स्त्री के शरीर में नहीं होकर प्रयोगशाला में ग्लास टयूब में होता है अत: इसे इन विट्रो या टेस्ट टयूब बेबी भी कहा जाता है। आईवीएफ के लिए वैसे कोई समय सीमा निर्धारित नहीं है फिर भी स्त्री के अच्छी क्वालिटी के डिंब और पुरुष के क्वालिटी शुक्राणुओं के लिहाज से अधिकतम 40-45 वर्ष की उम्र उपयुक्त मानी जाती है। डॉ. सूद कहती हैं कि कई बार आईवीएफ का प्रयास करने के बाद भी यदि स्त्री गर्भधारण नहीं कर पाती तो काउंसिलिंग के द्वारा बच्चे को गोद लेने के लिए युगल को मानसिक रूप से तैयार करने की जिम्मेदारी इनफर्íटलिटी स्पेशलिस्ट की होती है। यह बहुत कठिन समय होता है डॉक्टर और संतान की लालसा में समय, मेहनत व हजारों रुपए खर्च करने वाले दंपती के लिए।


 
पूरा हुआ ख्वाब 


लखनऊ में पेशे से चिकित्सक महावर दंपती ने भी किसी अन्य दंपती की तरह ही अपनी संतान के ख्वाब संजोए थे। लेकिन विवाह के चार-पांच वर्ष गुजर जाने के बाद भी डॉ. नमिता महावर गर्भधारण नहीं कर पा रही थीं। मां बनने की बात तो दूर। दूसरों का इलाज करने वाले इस डॉक्टर दंपती को स्वयं डॉक्टरों के चक्कर लगाने पड़े। एक दो डॉक्टर नहीं बल्कि अनेक डॉक्टरों के क्लीनिक और ढेरों जांचों व इलाज में सात वर्ष गुजर गए। अथक परिश्रम और लाखों रुपए फूंकने के बाद भी आशा की नन्ही किरण भी दूर-दूर तक नजर नहीं आ रही थी।

 

लेकिन अपनी संतान की लालसा ने महावर दंपती के पांवों को थमने नहीं दिया था। लखनऊ और दिल्ली तक दसियों डॉक्टरों के चक्कर लगाने वाले इस दंपती की गोद में पुत्ररत्‍‌न आया तो उनकी मनोदशा जानने के लिए किसी को भी शब्दों की आवश्यकता नहीं थी। उनकी आंखें सहज ही सब कुछ बयान कर रही थीं।  
सुनिए स्वयं डॉक्टर नमिता के शब्दों में। 'मेरी ओवरी में दोनों ओर काफी बड़ी-बड़ी चॉकलेट सिस्ट थी जिसके कारण डिंब निर्माण में गंभीर बाधा आ रही थी। इसको निकालने के लिए मुझे लैप्रोस्कोपी सर्जरी करानी पड़ी।' लेकिन समस्या खत्म होने के बजाय डॉ. नमिता समस्याओं के  चक्रव्यूह में ही फंस गई। लैप्रोस्कोपी के दौरान ऑपरेशन में प्रयुक्त संक्रमित उपकरणों के कारण डॉक्टर नमिता को टीबी का संक्रमण हो गया।

 

आहिस्ता-आहिस्ता फैलते हुए संक्रमण ने आमाशय और प्रजनन तंत्र को भी अपनी चपेट में ले लिया। स्थिति यहां तक पहुंच गई थी कि डॉ. नमिता के पेट से लगातार मवाद निकलने लगा। डॉ. नमिता कहती हैं, 'मुझे इस संक्रमण से छुटकारा पाने के लिए करीब ढाई वर्षो तक टीबी का इलाज कराना पड़ा। इंफेक्शन के कारण पेल्विक क्षेत्र भी इस कदर प्रभावित हो गया कि उनकी दोनों फैलोपियन टयूब बंद हो गई थीं। वहीं के क्षेत्र में उग गई गांठों को भी निकालने के लिए लेप्रोटॉमी करनी पड़ी और संक्रमण के कारण उत्पन्न मवाद को ड्रेन आउट करना पड़ा। इसके बाद लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज में मैंने इंट्रा यूटेराइन इनसेमिनेशन करवाया जो असफल रहा। मैंने गर्भधारण नहीं किया।  

 

'इसके बाद हमने इन विट्रो फíटलाइजेशन कराने का मन बनाया और दिल्ली आ गए। यहां भी हमने किसी इनफíटलिटी क्लीनिक में आईवीएफ कराया लेकिन कोई सुखद परिणाम नहीं मिला। हम निराश होकर लखनऊ वापस आ गए और अपनी ननद के होने वाले बच्चे को गोद लेने की सोचने लगे। लेकिन किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज में स्त्री रोग विभागाध्यक्ष डॉ. चंद्रावती ने मुझे दिल्ली में डॉ. नीलम सूद के पास जाने को कहा। बहुत थक गई थी लेकिन डॉ. सूद से पहली बार मिलकर ही उनके सकारात्मक और उत्साही व्यवहार से मुझमें फिर से आशा जगी। डॉ. सूद ने मेरी हिस्टेरेस्कोपी की और पाया कि गर्भाशय की अंदरूनी दीवारें सही-सलामत हैं। गर्भाशय की मांसपेशियों में छोटी-छोटी गांठें भी थीं लेकिन वे अंदर की ओर नहीं थीं इसलिए उन्हें यों ही छोड़ दिया गया। टीबी की जांच के लिए एलाइजा, हार्मोन टेस्ट, रक्त की सामान्य जांचें, पीसीआर और सीए 125 नामक जेनेटिक मार्कर जांच भी की गई। जब डॉ. सूद सभी जांच परिणामों से संतुष्ट हो गई तो उन्होंने हमारा आईवीएफ किया। भगवान की कृपा देखिए, पहली ही बार में मैंने गर्भधारण कर लिया।'

 

डॉ. नमिता भरे गले से कहती हैं, 'आज मुझसे ज्यादा खुश कोई नहीं।' आंखें पोंछती हुई कहती हैं, 'बड़ी मुश्किलों से मिला था इसलिए डॉ. सूद ने जो भी हिदायतें दीं, मैंने मानीं। पहले तीन महीने मैंने बेडरेस्ट किया। और फिर लखनऊ वापस चली गई। आठ महीने बाद दिल्ली आ गई। जांच में सब कुछ सामान्य रहने पर नौ महीने बाद जी. टी. बी. अस्पताल में स्त्री रोग सर्जन डॉ. गीता राधाकृष्णन और डॉ. सूद की आपसी सहमति से सिजेरियन की तारीख निर्धारित की गई और मुझे मेरा बेटा मिल गया। मेरे घर-ससुराल वालों ने मुझे बहुत सहयोग दिया है। उनकी सांत्वना और दुलार की बदौलत मेरे दिल में उम्मीद की लौ जलती रही और सात सालों के अथक परिश्रम के बाद मैं सफल भी रही।' डॉ. नमिता की बातों में ज्यादातर डॉ. सूद के प्रति आभार के ही शब्द होते हैं। वह कहती हैं, 'उनके उत्साहव‌र्द्धन, प्रेरणा और पुचकार ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई है। उनके इलाज के तरीके में कोई दुराव-छिपाव नहीं है और हर कदम पर सारी बातों को सामने रखती हुई ही वह आगे बढ़ती हैं।' डॉ. नमिता की बड़ी बहन स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. संगीता तिवारी ने कहा, 'आईवीएफ का मामला इलाज करने और करवाने दोनों के लिए ही बड़ा नाजुक होता है। लेकिन डॉ. सूद की एप्रोच बहुत सकारात्मक है। नमिता को पहली बार जब जीजाजी ने गर्भधारण की सूचना दी तो वह हमसे लिपटकर रो पड़ी थी।' 


रंग लाया इंतजार  


नेपाल की जया सेन पर शादी के कुछ महीनों बाद ही गर्भधारण नहीं करने के कारण इलाज कराने का दबाव पड़ने लगा था। बिहार के मुजफ्फरपुर शहर में 4-5 महीने इलाज चला लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। इस बीच पति को गिलवर्ट सिंड्रोम हो गया और उनका दिल्ली आकर अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में ऑपरेशन कराना पड़ा। 'मुझे मालूम नहीं था कि मेरी समस्या इतनी बड़ी है। मैं जमशेदपुर में ननद के यहां गई। वहां के सर्वाधिक प्रसिद्ध स्त्री रोग शल्य चिकित्सक डॉ. देबल दासगुप्ता को दिखाया। उन्होंने मेरे प्रजनन तंत्र की स्थिति जानने के लिए लैप्रेस्कोपी की। पेट में छोटी गांठ के भीतर के द्रव को निकालकर कैंसरकारी कोशिकाओं की जांच की गई। हालांकि बाद में उन्होंने गांठ को ऑपरेशन कर निकाल दिया लेकिन जांच में कोई मैलिगनैंसी नहीं पाई गई। डॉ. देबल दास ने पाया कि मेरी दोनों फैलोपियन टयूब बंद हैं और ओवरी में चॉकलेट सिस्ट है। उन्होंने फैलोपियन टयूब को खोलने के लिए ट्यूबोप्लास्ट सर्जरी की।

 

एक महीने बाद एएचएस टेस्ट किया। वह मेरे पति का वीर्य लेकर मेरे गर्भाशय में डालते थे और हर महीने फॉलोअप अल्ट्रासाउंड करते थे। मेरी ओवरी में अच्छी क्वालिटी के डिंब बनने के बाद भी दो सालों तक यह क्रम चला लेकिन मैं गर्भधारण नहीं कर पाई। मैं काफी परेशान हो गई थी। अप्रैल, 2001 तक मैं डॉ. देबल दास के पास गई। निराशा के क्षणों में मैं और मेरे पति वैष्णो देवी के दर्शन के लिए गए, मनौतियां मानीं। डॉ. देबल दास ने ही कोलकाता के मशहूर इनफर्टिलिटी विशेषज्ञ डॉ. वैद्यनाथ चक्रवर्ती के पास जाने को कहा। लेकिन चूंकि उनके यहां काफी लंबी लाइन होती है अत: एक साल और इंतजार करने की बजाय मैंने नेपाल में ही अपनी पड़ोसन से डॉ. नीलम सूद का नंबर लिया। मैं सितंबर, 2001 में डॉ. नीलम सूद के पास आई।

 

उन्होंने जांच में पाया कि मुझे एंडोमीट्रियॉसिस की समस्या है। डॉ. सूद ने साफ तौर पर कहा कि डॉ. देबल दास द्वारा बंद फैलोपियन टयूब खोलने की पद्धति ही गलत थी और चॉकलेट सिस्ट का कोई इलाज नहीं हो पाया था जो गर्भधारण नहीं करने की मूल समस्या था। डॉ. सूद ने प्रजनन तंत्र की स्थिति अच्छी तरह देखने के लिए लैप्रोस्कोपिक सर्जरी आजमाई लेकिन अगले ही क्षण ऑपरेशन थियेटर से बाहर आकर मेरे पति से कहा कि अंदर की आंतें उलझी हुई हैं और कुछ भी दिख नहीं रहा। उसी दिन पति की सहमति से बड़ा ऑपरेशन किया गया। उलझी आंतों को सुलझाया और एंडोमीट्रियॉसिस के इलाज के तौर पर चॉकलेट सिस्ट को पांच दिनों में ड्रेन आउट किया गया।

 

मेरी ओवरी और फैलोपियन टयूब बुरी तरह चिपक गए थे। तीसरे-चौथे दिन अस्पताल से डिस्चार्ज किया गया और आठवें-नौवें दिन टांके काट दिए गए। फिर अपोलो की ही डॉ. ललिता बधवार से अनुमति लेकर मैं वापस नेपाल चली गई। इस बीच डॉ. सूद इंग्लैंड चली गई। नवंबर, 2001 में जब वापस आई तो मुझे आईवीएफ के लिए तैयार किया। चॉकलेट सिस्ट को ड्रेन आउट करने के बाद भी हर महीने मासिक स्त्राव के बाद इसका थोड़ा हिस्सा ओवरी में जमा रह जाता था। इससे छुटकारा पाने के लिए डॉ. सूद ने मुझे एक नैजल ड्रॉप दिया जिसकी एक बूंद सूंघने मात्र से नाक के रास्ते अंदर जाकर ओवरी के सिस्ट को साफ करती थी। उनकी हिदायत थी कि भले ही खाना भूल जाओ लेकिन यह दवा लेना न भूलना। इसके अलावा उन्होंने कैल्शियम और आयरन की टैबलेट दीं। करीब 5-6 महीने इस दवा के प्रयोग के बाद स्वैब टेस्ट में इंफेक्शन पाए जाने पर करीब 15 दिन तक इसको दूर करने के लिए इलाज चला।

'31 मई, 2002 तक मैं आईवीएफ के लिए पूरी तरह तैयार हो गई। 15 जून तक उन्होंने आईवीएफ कर दिया और 4-5 दिन बाद मैं नेपाल चली गई। 10 जुलाई को यूरिन टेस्ट कराने पर पॉजिटिव रिपोर्ट आई। विश्वास नहीं हुआ तो दूसरी लैब में दोबारा  जांच कराई और जांच परिणाम पॉजिटिव आने पर तो मेरी खुशी की सीमा नहीं रही। मैंने तत्काल डॉ. सूद से बात की तो उन्होंने अविलंब मिलने को बुलाया। 17 जुलाई को डॉ. सूद से मिलने के बाद उन्होंने मुझे तीन महीने की दवाएं दीं। उसके बाद उन्होंने मुझे स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. खन्ना से आगे के लिए मिलने का सुझाव दिया और कहा कि मेरी भूमिका यहीं तक थी। मैं डॉ. खन्ना से मिली, मुझे करीब एक सप्ताह तक चिकित्सीय निगरानी में रखा गया, कई जांचें की गई और सभी रिपोर्ट सामान्य आने पर मुझे यहीं दिल्ली में रुकने को कहा गया। मैं तब से यहीं हूं। मेरा प्लेसेंटा लो था और बेबी भी रिवर्स थी इसलिए गर्भपात की आशंका को टालने के लिए बेडरेस्ट का सुझाव दिया गया। नौ महीने बाद शांति मुकुंद अस्पताल में डॉ. एम. भूटानी   और डॉ. अनीता अग्रवाल की देखरेख में 22 फरवरी को मेरा इलेक्टिव सिजेरियन कर प्रसव कराया गया।' बात समाप्त करने के साथ ही जया सेन की आंखों से वात्सल्य टपकने लगा था।

 

छाया: सखी

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