मैं ऐसी क्यों हूं

By  ,  सखी
Jul 28, 2010
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पडोसन लंबी गाडी में घूमती है-मैं नहीं, छोटी बहन मुझसे ज्यादा खूबसूरत है, कलीग को हर साल प्रमोशन मिलता है-मुझे नहीं...या फिर पत्नी स्मार्ट है-ज्यादा कमाती है, दोस्त पढाई में मुझसे अच्छे हैं, कोई लडकी मुझसे बात क्यों नहीं करती? लोग मुझे महत्व नहीं देते..। बच्चों, युवाओं, पुरुषों-स्त्रियों सभी में हो सकती है ऐसी भावना। दरअसल ऐसे विचार पैदा होते हैं हीन भावना के कारण। किन्हीं खास स्थितियों में हम सभी खुद को हीन महसूस करते हैं। मगर जब यह भावना मनोरोग में बदल जाए, व्यक्ति अपने भीतर मौजूद तमाम सकारात्मक गुणों को भूल जाए तो जिंदगी नर्क बन जाती है।

क्या है हीन भावना

मनोविज्ञान या मनोविश्लेषण की भाषा में हीन भावना वह है, जिसमें व्यक्ति खुद को दूसरे की तुलना में हीन महसूस करता है। इस शब्द का प्रयोग सबसे पहले डॉ. अल्फ्रेड एडलर (1870-1937) ने किया, जो डॉ. सिगमंड फ्रायड के शिष्य थे। सामान्य स्थिति में इस भावना से ग्रस्त व्यक्ति को प्रोत्साहन दिया जाए तो वह बेहतर परफॉर्मेस दे सकता है। बचपन में प्रोत्साहन या तारीफ पाने, थोडा हीन महसूस करने की भावना लगभग सभी में होती है। बढती उम्र में माता-पिता, रिश्तेदारों, शिक्षकों और समाज का प्रोत्साहन व सहयोग आत्मविश्वास के लिए जरूरी होता है। नकारात्मक, आलोचनात्मक, तुलनात्मक दृष्टिकोण टीन-एजर्स में हीन भावना पैदा कर सकता है। सामाजिक-आर्थिक-शैक्षिक और सांस्कृतिक परिवेश का भी व्यक्ति पर प्रभाव पडता है।

क्यों पैदा होती है यह भावना

  • बच्चों के प्रति पेरेंट्स का नकारात्मक नजरिया इसका बडा कारण है। नेगेटिव कमेंट बच्चों में हीन-भावना पैदा करते हैं।
  • फिगर ठीक न होना, असाध्य रोग, ओबेसिटी, कद कम होना, बोलने में समस्या, स्कि्वंट जैसी कई शारीरिक-मानसिक कमियों से भी व्यक्ति में हीन भावना पैदा हो सकती है।
  • मानसिक क्षमता या योग्यता पर उठे सवाल भी इस मनोरोग को जन्म देते हैं। उदाहरण के लिए अगर परिवार या समाज में कोई करीबी अचीवर हो और जाने-अनजाने लोग व्यक्ति की तुलना उससे करने लगें तो भी यह भावना जन्म ले सकती है।
  • सामाजिक हैसियत, पारिवारिक पृष्ठभूमि, जाति, नस्ल, धर्म, रंग जैसी बातें भी व्यक्ति में हीन भावना पैदा कर सकती हैं।

खास लक्षण

हीन भावना से ग्रस्त बच्चों में आत्मविश्वास की कमी होती है। वे शर्मीले, डरपोक, संकोची, अकेले रहने वाले या अति-संवेदनशील होने लगते हैं। कम उम्र के ऐसे बच्चे माता-पिता से चिपके रहते हैं या लोगों से दूर भागते हैं। दूसरी ओर कई बार हीन भावना आक्रामक बनाती है। इससे स्वभाव में चिडचिडापन आने लगता है। व्यक्ति बहस या तर्क करता है, बात-बात पर झगडा कर सकता है। इस भावना से ग्रस्त बच्चे लोगों का ध्यान आकृष्ट करने के लिए बेवजह जिद करने, चीजें फेंकने, भीडभाड वाली या फिर सार्वजनिक जगहों पर जोर-जोर से बोलने या चिल्लाने जैसी हरकतें भी करते हैं।

असुरक्षा की भावना, फोबिया, गुस्सा, हिंसा, ईष्र्या, संदेह, सिब्लिंग राइवलरी, अकेलापन जैसे कई लक्षण इस रोग के हो सकते हैं।

ओवर कंपन्सेटरी बिहेवियर

कई बार हीन भावना से ग्रस्त व्यक्ति में ओवर कंपन्सेटरी बिहेवियर (कमी की क्षतिपूर्ति) भी देखने को मिलता है, जिससे उसमें सुपीरियॉरिटी कॉम्प्लेक्स पनपने लगता है। कहा तो यह जाता है कि नेपोलियन बोनापार्ट अपने छोटे कद के कारण हीन भावना से ग्रस्त थे, लेकिन इस कमी को उन्होंने विजयी योद्धा बनकर छुपाया। महान क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर जब सामने वाले के छक्के छुडाते हैं तो उनके छोटे कद या सामान्य आवाज पर ध्यान नहींजाता, महज उनके खेल पर जाता है। बच्चा हीन-भावना से ग्रस्त है, यह बात सबसे पहले माता-पिता समझ सकते हैं। इन लक्षणों के दिखने पर जितनी जल्दी हो सके, विशेषज्ञ की सलाह ली जानी चाहिए। माता-पिता, शिक्षकों और बडे-बुजुर्र्गो को कभी भी दो बच्चों के बीच तुलना नहीं करनी चाहिए, न उनकी इतनी आलोचना करनी चाहिए कि उनमें हीनता-बोध पनपने लगे। स्वस्थ आलोचना जिसमें प्रोत्साहन छिपा हो, बच्चे के स्वस्थ विकास में सहायक होती है।

व्यावहारिक उपाय

  • ऐसे माहौल, लोगों और स्थितियों से दूर रहने की कोशिश करें, जहां हीनता महसूस हो।
  • अपने सकारात्मक गुणों को एक डायरी में लिखें। उसे रोज पढें और अपनी सराहना करें।
  • अपनी सीमाएं पहचानें। जरूरी नहीं कि आप बडे अचीवर हों। जहां पर हैं, वहां पहुंचने में भी बरसों की मेहनत लगी है। इसका महत्व समझें और अपनी योग्यता को पहचानें।
  • अपने फ्रेंड सर्कल और सामाजिक परिवेश को देखें। कहीं उसमें हीन भावना के बीज तो नहीं छिपे हैं। अपने स्तर, समान रुचियों और स्थिति वाले लोगों से मेलजोल बढाएं।
  • यदि आपको लगता है कि लोग आपको नजरअंदाज करते हैं, या आप पर ध्यान नहीं देते तो इसका अर्थ है कि आप दूसरों से कुछ ज्यादा अपेक्षा रख रहे हैं। खुद से प्यार करें, खुद को महत्व दें और अपनी क्षमताओं पर भरोसा रखें। अपना सम्मान आप ही नहीं करेंगे तो फिर दूसरों से कैसे अपेक्षा रख सकते हैं!


कहीं यह हीन-भावना तो नहीं!

मेरा 13 साल का बेटा देखने में 16-17 का लगता है। उसे ओबेसिटी है। उसके दोस्त उसका मजाक बनाते हैं। वह बहुत इंट्रोवर्ड है और लोगों के बीच जाने से कतराता है।

उम्र से बडा दिखने के कारण वह हीन भावना से ग्रस्त हो, ऐसा नहीं लगता। यहां पेरेंट्स, टीचर्स के व्यवहार को भी देखना होगा। हो सकता है कि बचपन में उसकी आलोचना हुई हो। मेरा सुझाव है कि उसे मनोवैज्ञानिक या मनोविश्लेषक के पास ले जाएं।

हमारी शादी को तीन वर्ष हुए हैं। एमएनसी में काम करते हैं। पिछले साल मेरा प्रमोशन हुआ, सैलरी बढी। तबसे पति बहुत बदल गए हैं। कई बार बिना कारण चिल्लाते हैं, साथ में बाहर जाने से मना करते हैं, हावी होने की कोशिश करते हैं। उन्हें कैसे समझाऊं?

ऐसा लगता है कि आपके पति पहले से ही हीन-भावना से ग्रस्त हैं। आपके प्रमोशन या तनख्वाह ने इस भावना को बढा दिया है। स्थितियां आउट ऑफ कंट्रोल हो जाएं, इससे पहले उन्हें तुरंत किसी प्रोफेशनल को दिखाएं।

मैं इंजीनियरिंग द्वितीय वर्ष का छात्र हूं। मेरी समस्या यह है कि मैं जल्दी दोस्ती नहीं कर पाता। लडकियों के सामने जाने से मैं बहुत हिचकिचाता हूं। हालांकि मेरा एकेडमिक रिकॉर्ड अच्छा रहा है। क्या करूं?

हीन-भावना या अपराध-बोध के चलते आप अॅपोजिट सेक्स से बात करने में हिचकिचाते हैं। जरूरी नहीं कि लडकियों से अकेले या अलग मिलें। ऐसे ग्रुप में मूव करें, जहां लडके-लडकियां दोनों हों। सबसे मिलें-जुलें, सोशल गैदरिंग में शामिल हों, ताकि थोडा फ्री महसूस कर सकें। लडकियों के प्रति थोडा संवेदनशील रहें और जरूरत पडने पर उनकी मदद करें। इससे लडकियां आपकी सराहना करेंगी और आपका आत्मविश्वास बढेगा।

मैं परफेक्शनिस्ट हूं। घर-दफ्तर सब जगह अपने हिसाब से काम चाहता हूं। ऐसा न होने पर मैं नियंत्रण खो देता हूं, गुस्सा बढ जाता है। क्या यह हीन-भावना के कारण है?

परफेक्शनिस्ट होना सकारात्मक गुण है, लेकिन यदि हद से आगे बढ जाए, यानी आप हर काम में परफेक्शन ढूंढने लगें तो यह ऑब्सेसिव पर्सनैलिटी के लक्षण हैं। इसमें व्यक्ति अपनी किसी आदत को लेकर सनकी हो जाता है। आप प्रोफेशनल की मदद लें।

हम छोटे शहर से ट्रांसफर होकर महानगर में आए हैं। हमने अभी 12 वर्षीय बेटी का स्कूल बदला है। प्रतिष्ठित स्कूल में होने और घर में गाइडेंस देने के बावजूद वह अंग्रेजी में बात नहीं कर पाती। वह बेहद शर्मीली है। यहां उसका कोई फ्रेंड सर्कल नहींबन पा रहा है। समझ नहीं आता कि क्या करें?

उसके लिए अंग्रेजी की एक्स्ट्रा कोचिंग क्लासेज की व्यवस्था करें, ताकि वह स्कूल के माहौल में एडजस्ट कर सके। घर में उससे अंग्रेजी में बात करें, साथ ही अन्य भाषाएं भी सीखने को प्रेरित करें। उसके साथ बातचीत करें और उसक ी उम्र के अन्य बच्चों को घर में बुलाएं, ताकि वह सहजता से घुल-मिल सके।

 

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