बोन कैंसर की वैकल्पिक चिकित्सा

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Apr 02, 2012

bone cancer ki vaikalpic chikitsa

कुछ लोग बोन कैंसर की वैकल्पिक चिकित्सा का प्रयोग कहते हैं। वैकल्पिक चिकित्सा से तनाव, बोन कैंसर के ईलाज के दुष्प्रभावों व बोन कैंसर के दर्द को कम किया जा सकता है।

ज्यादातर मामलों में लोग कैंसर की मानक चिकित्सा( सर्जरी, कीमोथेरेपी व रेडिएशन थेरेपी) के साथ वैकल्पिक चिकित्सा भी लेते हैं। कैंसर में रोगी बहुत ही निराशाजनक हो जाता है जो उसकी सेहत के लिए ठीक नहीं है। वैकल्पिक चिकित्सा से रोगी तनावमुक्त रहता है और अच्छा महसूस करता है। कैंसर ट्रीटमेंट सेंटर्स ऑफ अमेरिका के जानकार कैंसर के इलाज के साथ वैकल्पिक औषधि का भी इस्तेमाल करते हैं।

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आइए जानें बोन कैंसर की वैकल्पिक चिकित्सा के बारे में

 

पोषण(न्यूट्रीशन) थेरेपी

 

बोन कैंसर के ईलाज में रोगी के आहार नियम का बहुत बड़ा रोल होता है। उसके खान पान का सीधा असर उसकी चिकित्सा पर होता है। शरीर में पोषण की कमी होना, वजन कम होने का नकारात्मक प्रभाव बोन कैंसर व उसकी चिकित्सा पर होता है। इसलिए न्यूट्रीशन थेरेपी में रोगी को बताया जाता है कि उसका खाना किस तरह का हो औऱ ईलाज के साथ उसके शरीर को कैसा पोषण चाहिए।

 

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पीड़ा प्रबंधन (पेन मेनैजमेंट)

 

कई रोगियों को बोन कैंसर की चिकित्सा के दौरन दर्द का सामना करना पड़ता है, ऐसे में पीड़ा प्रबंधन से यह पता लगाया जा सकता  है कि यह किस प्रकार का दर्द है और इससे रोगी के जीवन को कोई खतरा है या नहीं। इसके अलावा इसमें रोगी को इस दर्द से निजात भी दिलाई जाती है। हर रोगी को होने वाला दर्द अलग होता है। इसमें रोगी की दर्द की जगह, तीव्रता व दर्द के समय उसके व्यवहार के जरिए पता लगया जाता है दर्द कैसा है और कितना खतरनाक है।

 

प्राकृतिक चिकित्सा थेरेपी (नेचुरोपैथिक मेडिसीन)

 

नेचुरोपेथिक मेडिसीन में सबसे पहले कैंसर व अन्य किसी भी रोग से बचाव व ईलाज किया जाता है। इसके अलवा रोग के कारण को ढूंढकर उसका निवारण करते हैं। उसके बाद संभावित बीमारियों, चिकित्सा शर्तों, अंगो व ग्रंथियों की अपर्याप्त क्रिया का ईलाज किया जाता है। इन सबके लिए जरूरी हो रोगी का इम्‍यून सिस्टम मजबूत हो। नेचुरोपैथिक मेडिसीन में रोगी को कैंसर के ईलाज से होने वाले दुष्प्रभावों से बचाया जाता है जैसे भूख नहीं लगना, चक्कर आना और पाचन शक्ति बढाना।

 

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शारीरिक थेरेपी

 

कैंसर का इलाज शुरु करने से पहले इसके जरिए रोगी की शारीरिक क्षमता को जांचा जाता है। इसमें रोगी के रोजमर्रा के काम को देखा जाता है। इसमें एक्सरसाइज के जरिए रोगी के हृदय की गति व मांसपेशियों को लचीला बनाया जाता है जिससे रोगी को अपने शरीर पर नियंत्रण करने में मदद मिलती है।

 

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